रांची(RANCHI) बुधवार को राजधानी राँची के केन्द्रीय धुमकुडिया सभागार में झारखण्ड फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों और समस्त आदिवासी संगठनों द्वारा एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया जिसमें सरना सदान मूलवासी मंच के संस्थापक कुमोद वर्मा ,कार्यकारी अध्यक्ष सूरज टोप्पो जी, केन्द्रीय सरना समिति के केन्द्रीय अध्यक्ष बबलू मुंडा , देश विदेश में कई पुरस्कारों से पुरस्कृत फिल्म निर्देशक, युवा पत्रकार, चुनावी रणनीतिकार निरंजन भारती द्वारा कई महत्वपूर्व विषयों पर आयोजित की गई यह प्रेस वार्ता झारखण्ड का डीएनए जिसको खत्म करने की गहरी साजिश रची जा रही है. जिससे पूरा झारखण्ड आहत है. आक्रोशित है.पांच दिन पहले सरकार के सुचना एवं जनसंपर्क विभाग के विशेष सचिव के द्वारा एक अधिसुचना जारी किया गया था. अधिसूचना झारखण्ड में 24 सदस्यीय झारखण्ड फिल्म विकास परिषद् का गठन किया गया उसी को लेकर था.
वन्ही अध्यक्ष ने बतया की 24 सदस्यों में 5 सरकारी पदासीन अधिकारीयों के अतिरिक्त जिन 19 सदस्यों को मनोनीत किया गया है उसमें क्षेत्रीय लोगों को तवज्जो नहीं देकर ऐसे लोगों को सदस्य बनाया गया है जिन्हें सिनेमा का सी तक कि जानकारी नही है .कुछ तो ऐसे लोगों को भी सदस्य बनाया गया है जिसका सिनेमा से दूर दूर तक कोई रिश्ता वास्ता नहीं है. झारखंड फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग उन्हें जानते पहचानते तक नहीं है. वैसे लोगों को कौंसिल का सदस्य बनाया गया है.
19 सदस्यों वाली झारखंड फिल्म विकास परिषद् में न तो किसी जनजातीय समुदाय से किसी सदस्य को मनोनीत किया गया, न ही खोरठा सिनेमा जगत से किसी को मनोनीत किया गया और न ही संताली सिनेमा जगत से किसी को मनोनीत किया गया. जिससे यह प्रतीत होता है की झारखण्ड में अबुआ राज नहीं बबुआ राज चल रहा है. और झारखण्ड में हमेशा से ही झारखंडियों की उपेक्षा होती रही है.चाहे नव गठित परिषद् में जगह नहीं देना हो या फिर अन्य किसी क्षेत्र की बात हो. जब भी झारखंडियों के हक़ अधिकार की बात आती है तब तब उनके साथ छल हुआ है.और फिर एक बार हर बार की तरह झारखंडी कलाकारों के साथ ठगी हुई है. जो कही से भी झारखण्ड फिल्म इंडस्ट्री के हित में नहीं है.
ऐसे में जब अलग अलग ( संथाली, खोरठा, कुड़मालि, हो ) भाषाओं की फिल्मों को समीक्षा करने की बात होगी और परिषद में उस भाषा का जानकार अनुभवी व्यक्ति नही होंगे तो कभी भी यह परिकल्पना नही किया जा सकता कि फ़िल्म विकास परिषद से झारखंड फ़िल्म इंडस्ट्री और उनसे जुड़े लोगों का विकास होगा।15 नवम्बर 2000 को जिन आदिवासियों और मूलवासियों के संघर्ष, बलिदान, त्याग, समर्पण, और शहादत के बाद झारखण्ड राज्य का गठन का हुआ अगर उस राज्य में भी ऐसा परिषद् का गठन होता है तो उस राज्य के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता.
ऐसे में सरकारी बाबू लोग जो है जिसे हम IAS, IPS कहते हैं उनका झारखण्ड के प्रति मानसिकता, सोच और अदूरदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है. सवाल इसलिए भी खड़ा होता है क्योंकि जितने भी IAS, IPS बाहर से झारखण्ड में पोस्टिग होकर आते हैं उन्हें न तो जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक लोक संगीत, यंत्र, नृत्य, भाषा, पहनावा, ओढावा का ज्ञान होता है न ही जनजातीय कलाकृतियों की जानकारी होती है. ऐसे में यह लोग झारखंड की DNA यानी हमारी पहचान को ख़ाक संरक्षित करेंगे. इन्हें क्या पता की झारखंड का इतिहास क्या है.
झारखण्ड की कला और संस्कृति राज्य की समृद्ध विरासत है और इस विरासत को संरक्षित करने में, झारखंड फ़िल्म इंडस्ट्री को ज़िंदा रखने में सैकड़ों लोगों ने अपना ताउम्र लगा दिया और जी जान से काम किया. और अपने प्रतिभा, काबिलियत के दम पर राष्ट्रीय, अन्तराष्ट्रीय पटल पर अपने प्रतिभा का लोहा मनवाया और इस राज्य का नाम रौशन किया.आज वैसे लोगों के स्वाभिमान, सम्मान, स्मिता को भी कुचलने का काम किया गया है.
झारखण्ड में मूलतः नागपुरी, संताली, खोरठा, कुड्माली इत्यादि अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में भी फिल्म निर्माण का कार्य किया जाता है.वही नौ ( जनजातीय क्षेत्रीय भाषा को सरकारी मान्यता है.झारखंड एक आदिवासी बहुल्य राज्य है. इस प्रदेश में 24 ज़िले है. 263 ब्लॉक, 3451 पंचायत, 32 हज़ार से ज़्यादा गाँव. और हर गाँव में एक से बढ़कर एक प्रतिभा आपको देखने के लिए मिलेगा.
इस प्रेस वार्ता के माध्यम से समस्त आदिवासी मूलवासी संगठन के लोग और झारखण्ड फिल्म इंडस्ट्री से जुडा हर वह सख्स चाहे वह निर्माता हो, निर्देशक हो , तकनीशियन हो. संगीतकार हो, साहित्यकार हो, कलाकार हो, लेखक हो. यह मांग करता है की नव गठित फ़िल्म डेवलपमेंट ऑफ़ काउंसिल को सरकार अविलम्ब रद्द करे. और झारखण्ड में जिस भी भाषा में फिल्म बनायीं जाती है उससे जुड़े व्यक्तियों की एक बैठक बुलाये और उनसे सूचि मांगे तभी जाकर एक संतुलित परिषद् का गठन करने की परिकल्पना की जा सकती है . और तभी झारखण्ड की जन भावनाओं और यहाँ की जमीन हकीकत और सरकार का मकसद पूरा हो सकेगा.
झारखंड फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों के साथ आदिवासी मूलवासी संगठन के लोग सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने को बाध्य होंगे. झारखंड फ़िल्म इंडस्ट्री का गला घोटने हमलोग नहीं देंगे. इस विषय को लेकर बहुत जल्द हमारी टीम मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन और विभागीय मंत्री से मुलाकत करेगी और इस परिषद् को भंग / रद्द करने से संबंधित ज्ञापन सौपेगी.
सवाल
- फिल्म विकास परिषद् का गठन करने का उध्हेश्य का आधार क्या है ? आधार और उद्धेश्यों को सदस्य मनोनीत करते वक़्त इसका ख्याल रखा गया ?
- इस परिषद् में सिनेमा जगत से जुड़े किन लोगों को सदस्य बनाया जाना है ?
- क्या परिषद् का गठन करने में इस बात का ख्याल रखा गया की जिन लोगों को सदस्य बनाया जा रहा है वह फिल्म विकास परिषद् के सभी माप दंडों को पूरा करता है ?
झारखण्ड एक आदिवासी बाहुल्य राज्य है उसके बावजूद जनजातीय समुदाय से किसी को सदस्य मनोनीत क्यों नहीं गया ? - खोरठा में लगातार फिल्मों का निर्माण होता रहा है और एक बड़ी आबादी खोरठा बोलने वालों की है उसके बावजूद खोरठा भाषा से किसी को जगह नहीं दिया गया क्यों ?
- संथाली सिनेमा का झारखण्ड में अपना अलग पहचान है. उसके बावजूद इस इंडस्ट्री को भी इगनोर किया गया क्यों ?
प्रेस वार्ता में सरना सदान मूलवासी मंच के संस्थापक कुमोद वर्मा जी, कार्यकारी अध्यक्ष सूरज टोप्पो जी, केन्द्रीय सरना समिति के केन्द्रीय अध्यक्ष बबलू मुंडा जी, देश विदेश में कई पुरस्कारों से पुरस्कृत फिल्म निर्देशक, युवा पत्रकार, चुनावी रणनीतिकार भाई निरंजन भारती जी, अभय भुत कुंवर जी, अमित मुंडा जी, सोनू मुंडा जी, हात्मा मौजा के मुख्य पाहन जगलाल पाहन जी, जेसीए के अध्यक्ष भाई मोनू सिंह जी, भाई राज मौर्या जी उपस्थित थे.
NEWS ANP के लिए रांची से चंद्रप्रकाश रावत की रिपोर्ट…
