शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व अपने पूरे उत्साह के साथ चल रहा है। आज, शनिवार 27 सितंबर को नवरात्रि का छठा दिन है, जिसे मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी (Maa Katyayani ki Puja) को समर्पित किया गया है। सुनहरे रंग की इस देवी के चार हाथ हैं, जिसमें अभय और वर मुद्रा, तलवार और कमल का फूल शामिल हैं। मान्यता है कि इस दिन मां की सच्चे मन से पूजा करने से जीवन से रोग, भय और दुख दूर होते हैं।
कात्यायनी माता की पूजा में रोली, अक्षत, पीले फूल और शहद का भोग लगाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से मां प्रसन्न हुईं और उनके घर पुत्री रूप में जन्म लिया। उन्होंने महिषासुर का वध कर तीनों लोकों को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया। इस प्रकार छठे दिन की पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शक्ति, भक्ति और उम्मीद का प्रतीक भी है।
मां कात्यायनी का रूप
मां कात्यायनी के चार हाथ हैं। उनके दाहिने हाथ अभय और वर मुद्रा में हैं, जबकि बाएं हाथ में तलवार और कमल का फूल हैं। मान्यता है कि इस दिन मां की सच्चे मन से पूजा करने से रोग, शोक और भय दूर होते हैं।
मां कात्यायनी की पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
मंदिर में मां कात्यायनी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
घी का दीपक जलाकर रोली, अक्षत, धूप और पीले फूल अर्पित करें।
मां को भोग लगाएं।
मां कात्यायनी के मंत्रों का जाप करें।
पूजा के बाद आरती उतारें और परिवार में प्रसाद बाटें।
मां कात्यायनी का मंत्र
मूल मंत्र:
“कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी।
नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः।।”
स्तुति मंत्र:
“या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
मां कात्यायनी का भोग
मां कात्यायनी को शहद या शहद से बनी खीर बहुत प्रिय है। उनका शुभ रंग पीला माना जाता है।
मां कात्यायनी की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि कात्यायन ने संतान प्राप्ति के लिए मां भगवती की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से मां भगवती प्रसन्न हुईं और उन्हें दर्शन दिए। महर्षि ने मां के सामने अपनी इच्छा प्रकट की, जिस पर मां ने वचन दिया कि वह उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेंगी।
उस समय महिषासुर नामक दैत्य का अत्याचार तीनों लोकों पर बढ़ रहा था। त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से माता का उत्पन्न होना तय हुआ और वे महर्षि कात्यायन के घर जन्मीं। इस कारण उन्हें कात्यायनी नाम दिया गया।
माता के पुत्री रूप में जन्म लेने के बाद महर्षि ने सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथि पर उनकी विधि-विधानपूर्वक पूजा की। अंत में दशमी के दिन मां कात्यायनी ने महिषासुर का वध किया और तीनों लोकों को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया।
मां कात्यायनी की आरती
जय जय अम्बे जय कात्यायनी.
जय जगमाता जग की महारानी.
बैजनाथ स्थान तुम्हारा.
वहां वरदाती नाम पुकारा.
कई नाम हैं कई धाम हैं.
यह स्थान भी तो सुखधाम है.
हर मन्दिर में ज्योत तुम्हारी.
कही योगेश्वरी महिमा न्यारी.
हर जगह उत्सव होते रहते.
हर मन्दिर में भगत हैं कहते.
कात्यायनी रक्षक काया की.
ग्रंथि काटे मोह माया की.
झूठे मोह से छुडाने वाली.
अपना नाम जपाने वाली.
बृहस्पतिवार को पूजा करिए.
ध्यान कात्यायनी का धरिये.
हर संकट को दूर करेगी.
भंडारे भरपूर करेगी.
जो भी मां को भक्त पुकारे.
कात्यायनी सब कष्ट निवारे.
NEWSANP के लिए रागिनी पांडेय की रिपोर्ट

