होली के मौके पर बंगाल मे धूमधाम से निकाली गई दोल यात्रा

आसनसोल(ASANSOL) पश्चिम बंगाल बिरभूम के शांतिनेकेतन सहित, आसनसोल, बांकूड़ा, पुरुलिया के साथ -साथ राज्य के कई जिलों मे सोमवार को रंग और गुलालों के त्योहार होली के मौके पर धूमधाम से दोल यात्रा निकाली गई, जिस दोल यात्रा मे महिलाओं को बंगाल की सांसकुर्तिक गानो व सांसकुर्तिक नृत्य के साथ एक दूसरे को रंग बिरंगे ग़ुलाल लगाते हुए देखा गया, रंगों के इस त्योहार मे दोल यात्रा मे शामिल सभी महिलाएं पिले रंग की सड़ियां पहनी देखी गई.

जिन सड़ियों का बॉडर लाल व गुलाबी रंग के साथ -साथ आसमानी रंग के थे, इसके अलावा महिलाएं प्लाश के फूल के विभिन्न प्रकार के आभूषण बनाकर पहनी दिखीं, बंगाली समाज आज के इस दिन को दोल पूर्णिमा के तौर पर इस त्योहार को मनाते हैं, उनकी अगर माने तो दोल पूर्णिमा राधा-कृष्ण की प्रेम कथा से जुड़ा है.

इस लिए यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को समर्पित है, डोल और होली एक ही त्यौहार हैं, लेकिन वे अलग-अलग हिंदू पौराणिक कहानियों पर आधारित हैं. बंगाली डोल कृष्ण और राधा पर केंद्रित है, वहीं होली विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद की कहानी पर आधारित है, बंगाल, असम और ओडिशा में धूमधाम से मनाए जाने वाले डोल पूर्णिमा पर्व के दौरान डोल यात्रा निकाली जाती है.

इस दिन राधा कृष्ण की प्रतिमा डोली में स्थापित करके भक्त भजन-कीर्तन करते यात्रा निकालते हैं. जुलूस शंखनाद, तुरही बजाने, जीत या खुशी के नारे और “होरी बोला” की आवाज के साथ आगे बढ़ता है. पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने राधा के प्रति अपना स्नेह व्यक्त किया था. इसलिए लोग कृष्ण और राधा के पुनर्मिलन का जश्न उनकी सजी हुई मूर्तियों को झूलती हुई पालकी में घुमाकर मनाते हैं, दोल याता को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी देखा जाता है.

NEWS ANP के लिए आसनसोल से अमरदेव की रिपोर्ट…

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