धनबाद कोयलांचल भारतीय जनता पार्टी की राजनीति भविष्य अब निर्णायक मोड़ पर खड़ी है…कृष्णा अग्रवाल…

धनबाद कोयलांचल भारतीय जनता पार्टी की राजनीति भविष्य अब निर्णायक मोड़ पर खड़ी है…कृष्णा अग्रवाल…

धनबाद (DHANBAD): झारखण्ड प्रान्तीय मारवाड़ी सम्मेल के प्रान्तीय उपाध्यक्ष और खुद को
भाजपा समर्थक और सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता कहने वाले कृष्णा अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया है..जिसको लेकर बीजेपी की अंदरूनी राजनीति पर चर्चा शुरू हो गई है…नए समीकरण, नया खिचड़ी पकने की ओर इशारा कर रही है…पढ़िए पूरा पोस्ट..उसके बाद समीक्षा कीजिए…

धनबाद नगर निगम चुनाव ने जो परिणाम दिया,उसने सिर्फ सत्ता का बदलाव नहीं किया,बल्कि भाजपा की अंदरूनी राजनीति की परतें भी खोल कर रख दी हैं।

निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में महापौर बने संजीव सिंह की ऐतिहासिक जीत ने यह साबित कर दिया कि जनता अब “थोपे गए नेतृत्व” को नहीं, बल्कि “स्वीकार्य और जमीनी नेतृत्व” को चुन रही है।

लेकिन असली सवाल भाजपा के अंदर है… एक ओर वर्तमान सांसद ढुल्लू महतो, दूसरी ओर पूर्व सांसद पशुपतिनाथ सिंह जिनके बीच वर्षों से दूरी रही,अचानक कार्यकर्ता सम्मान समारोह और पूर्व सांसद आवास पर सतुआनी कार्यक्रम में एक साथ दिखना… क्या यह केवल संयोग है? या फिर बढ़ते जनाधार से घबराहट का संकेत?

राजनीति में कोई भी गतिविधि बिना संदेश के नहीं होती। इन दोनों कार्यक्रमों में जिस तरह से पूर्व एवँ बर्तमान सांसदों के बीच नजदीकियाँ दिखाई गईं,उसने कार्यकर्ताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या यह “संगठन मजबूत करने” का प्रयास है या “किसी खास नेतृत्व को रोकने की रणनीति”?

और सबसे अहम बात झारखण्ड विधानसभा के सचेतक, राज्य के सर्वश्रेष्ठ,धनबाद के लोकप्रिय विधायक राज सिन्हा की इन महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में अनुपस्थिति ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह महज संयोग है या भाजपा के अंदर चल रहे गहरे मतभेदों का संकेत?

वहीं झारिया की विधायक रागिनी सिंह और धंनबाद नगर निगम के महापौर संजीव सिंह की बढ़ती लोकप्रियता ने पारंपरिक राजनीति को सीधी चुनौती दे दी है।

अब बात उस सच्चाई की,जिस पर खुलकर चर्चा नहीं होती…लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि धंनबाद सांसद ढुल्लू महतो की राजनीति “अगड़ा-पिछड़ा” के सामाजिक विभाजन पर आधारित रही है। लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, अब सांसद ढुल्लू महतो की सीधी राजनीतिक टक्कर महापौर संजीव सिंह से है, जो राजपूत समाज से आते हैं, और पूर्व सांसद पशुपतिनाथ सिंह भी उसी सामाजिक पृष्ठभूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं।

ऐसे में हाल के घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि कहीं न कहीं सामाजिक संतुलन साधने के लिए रणनीति बदली जा रही है और यही वजह है कि जो दूरी पहले दिखती थी,वह अब मजबूरन नजदीकी में बदलती नजर आ रही है। राजनीति में यह बदलाव संयोग नहीं, बल्कि परिस्थिति की मजबूरी भी हो सकता है।

दूसरी ओर, एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है,पूर्व सांसद पशुपतिनाथ सिंह को कभी राज सिन्हा का राजनीतिक मार्गदर्शक और संरक्षक माना जाता रहा है। लेकिन वर्तमान हालात यह संकेत दे रहे हैं कि समय के साथ दोनों के बीच दूरी बढ़ी है। आज की राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी “विश्वास” होती है और जब वही कमजोर पड़ने लगे,तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या यह दूरी व्यक्तिगत निर्णयों का परिणाम है या बदलते राजनीतिक समीकरणों का असर यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इसका प्रभाव संगठन पर भी पड़ रहा है।

आज कार्यकर्ता पूछ रहा है—
क्या भाजपा में अब भी सामूहिक नेतृत्व बचा है?
या फिर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ संगठन पर भारी पड़ रही हैं?

सच कड़वा है, लेकिन स्पष्ट है, धनबाद में भाजपा की स्थिति आज “बाहरी चुनौती” से ज्यादा “आंतरिक खींचतान” से प्रभावित है। अगर समय रहते आत्ममंथन नहीं हुआ, तो आने वाले चुनावों में ऐसे परिणाम और भी देखने को मिल सकते हैं।

जनता ने संकेत दे दिया है…
अब नेतृत्व को समझना है या नजरअंदाज करना है।

NEWSANP के लिए धनबाद से कुंवर अभिषेक सिंह की रिपोर्ट

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