
जामताड़ा(JAMTARA): आज का दिन—चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या—अपने आप में एक रहस्यमयी, साधनापूर्ण और शक्ति-आराधना का अद्वितीय संगम है। इस पावन तिथि पर चित्तरंजन के गांधी कुमार स्थित श्रीं श्रीं 108 राज राजेश्वरी महाकाली का दरबार एक विशेष दिव्य आभा से आलोकित हो उठता है। आइए, इस अवसर पर एक आलौकिक कथा के माध्यम से उस अदृश्य शक्ति का अनुभव करें—
“अमावस्या की रात: महाकाली का आह्वान”
चित्तरंजन की शांत वादियों में बसा गांधी कुमार क्षेत्र, जहां दिनभर सामान्य जीवन की हलचल रहती है, वहीं अमावस्या की इस गहन रात्रि में एक अद्भुत परिवर्तन होने लगता है। जैसे-जैसे सूर्य अस्त होता है, वातावरण में एक अलौकिक निस्तब्धता पसरने लगती है।
श्रीं श्रीं 108 राज राजेश्वरी महाकाली का दरबार दीपों की मृदुल ज्योति से सुसज्जित हो उठता है। हर दीपक मानो अपने भीतर एक कथा समेटे हुए हो—श्रद्धा, विश्वास और भक्ति की कथा।
मंदिर प्रांगण में प्रवेश करते ही साधक और श्रद्धालु एक अनजानी ऊर्जा का अनुभव करते हैं। कोई ध्यान में लीन है, कोई मंत्रोच्चारण में, तो कोई मां के चरणों में अपने जीवन का भार सौंप रहा है।
रात्रि का दूसरा प्रहर… आकाश में चंद्रमा का कहीं नामोनिशान नहीं, परन्तु महाकाली के दरबार में एक अदृश्य चंद्रप्रकाश फैलने लगता है।
उसी समय, एक वृद्ध साधक—जिनका नाम कोई नहीं जानता—धीरे-धीरे मंदिर के गर्भगृह की ओर बढ़ते हैं। उनके चेहरे पर तपस्या की रेखाएं स्पष्ट हैं, और आंखों में अद्भुत तेज।
वे मौन होकर माता के समक्ष बैठ जाते हैं और धीरे-धीरे “श्रीं… श्रीं…” बीज मंत्र का जाप प्रारंभ करते हैं।
जैसे-जैसे मंत्र की ध्वनि गूंजती है, वातावरण में एक कंपन उत्पन्न होता है। दीपक की लौ स्थिर हो जाती है, हवा थम जाती है, और ऐसा प्रतीत होता है मानो समय स्वयं रुक गया हो।
अचानक— मंदिर के गर्भगृह से एक गहरी, करुणामयी, परंतु अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा का प्रस्फुटन होता है।
वह ऊर्जा किसी प्रकाश की तरह नहीं, बल्कि अनुभूति की तरह थी—जो हर हृदय को छू रही थी।
साधक की आंखें बंद थीं, पर उनके चेहरे पर एक दिव्य मुस्कान उभर आई।
तभी, ऐसा लगा मानो स्वयं राज राजेश्वरी महाकाली उस दरबार में प्रकट होकर अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही हों—
“जो मुझे सच्चे मन से पुकारता है, मैं उसकी हर अंधकारमय राह को प्रकाशित कर देती हूं…”
मंदिर में उपस्थित हर व्यक्ति के मन में एक अद्भुत शांति और शक्ति का संचार होने लगा। जिनकी आंखों में आंसू थे, वे अब मुस्कुरा रहे थे। जिनके हृदय में भय था, वह अब साहस में परिवर्तित हो चुका था।
धीरे-धीरे रात्रि का अंतिम प्रहर आया… और जैसे ही भोर की पहली किरण धरती पर पड़ी, वह वृद्ध साधक वहां से अदृश्य हो चुके थे।
लोगों ने उन्हें बहुत खोजा, पर वे कहीं नहीं मिले।
कुछ ने कहा—वह कोई सिद्ध पुरुष थे… कुछ ने कहा—स्वयं मां का रूप थे…
पर सत्य क्या था, यह आज भी एक रहस्य है।
“भक्ति का संदेश”
इस अमावस्या की कथा हमें यह सिखाती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, यदि आस्था की एक ज्योति जलती रहे, तो महाकाली स्वयं उस अंधकार को प्रकाश में परिवर्तित कर देती हैं।
चित्तरंजन का यह दरबार केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि विश्वास, साधना और दिव्य अनुभूति का जीवंत केंद्र है—जहां हर अमावस्या को अदृश्य शक्तियां जागृत होती हैं और भक्तों के जीवन में नया प्रकाश भरती हैं।
NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

