मौन पत्रकारिता का संकट: जब सच्चाई सड़क पर लहूलुहान पड़ी हो…

मौन पत्रकारिता का संकट: जब सच्चाई सड़क पर लहूलुहान पड़ी हो…

जामताड़ा(JAMTADA):होली जैसे रंगों और उत्सव के पर्व के बाद समाज सामान्य जीवन की ओर लौटने लगता है। लेकिन कई बार ऐसे अवसरों के बाद कुछ घटनाएँ ऐसी भी सामने आती हैं । जो समाज की संवेदनशीलता और संस्थाओं की जिम्मेदारी पर गंभीर प्रश्न खड़े कर देती हैं। हाल की एक घटना ने न केवल स्थानीय व्यवस्था बल्कि पत्रकारिता के चरित्र और उसकी प्राथमिकताओं को लेकर भी चिंताजनक स्थिति उजागर की है।

दरअसल, यह सवाल अब सिर्फ एक दुर्घटना या उसके बाद हुई हिंसा का नहीं है। बल्कि उस मौन का है । जो उन लोगों की ओर से दिखाई दे रहा है। जिनसे समाज सबसे अधिक उम्मीद करता है — पत्रकार।

जब पत्रकारिता की आँखों पर संबंधों की पट्टी बंध जाए

समाज में पत्रकारिता को हमेशा “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कहा गया है। यह वह शक्ति है। जो सत्ता, व्यवस्था और समाज के बीच सच को सामने लाने का काम करती है। लेकिन जब वही पत्रकारिता अपने निजी संबंधों, समीकरणों या सुविधा के कारण गंभीर घटनाओं को नज़रअंदाज़ करने लगे। तब स्थिति बेहद चिंताजनक हो जाती है।

आज प्रश्न यह उठ रहा है कि जब सड़क पर घायल लोगों के सिर पर खून से सनी पट्टियाँ बंधी हों। जब महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग विलाप कर रहे हों। तब क्या पत्रकार की कलम भी मौन हो सकती है?

दुखद रूप से, हालिया घटना में यही स्थिति देखने को मिली।

मिहिजाम के राष्ट्रीय राजमार्ग की घटना: एक दुर्घटना और उसके बाद की हिंसा

मिहिजाम स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग के पास एक मॉल के निकट बाइक सवार युवकों के साथ हुई दुर्घटना के बाद जो घटनाक्रम सामने आया। उसने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। दुर्घटना के बाद विवाद बढ़ा और स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पसीना बहाकर रोज़ी-रोटी कमाने वाले युवकों पर एक विशेष झुंड द्वारा बेरहमी से डंडों से हमला किया गया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, यह हमला अचानक और अत्यंत क्रूर था।
घटना के बाद कई युवक घायल हो गए। उनके सिर फट गए, शरीर से खून बहता रहा और परिवार के लोग रोते-बिलखते रहे।

लेकिन इस पूरी घटना का सबसे दर्दनाक पक्ष सिर्फ हिंसा नहीं था।

दर्दनाक पक्ष यह था कि इस पीड़ा को देखने और दिखाने वाले लोग ही खामोश रहे।

धूप और धूल में खड़े घायल युवकों की अनदेखी

घटना के बाद सुबह से लेकर शाम तक राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे कई युवक धूप और धूल में खड़े रहे। उनके चेहरे पर दर्द, अपमान और निराशा साफ दिखाई दे रही थी।

वे सिर्फ न्याय की उम्मीद में खड़े थे।

उनकी आँखों में एक सवाल था —
क्या उनकी पीड़ा भी खबर बनेगी?

लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि जिन पत्रकारों की पैनी नजर से समाज की छोटी से छोटी घटना भी बच नहीं पाती, उन्हीं की नजरों से उस दिन यह दृश्य जैसे ओझल हो गया।

उन युवकों के मुरझाए चेहरे, उनके फटे सिर, और उनके परिवारों का विलाप भी कुछ लोगों की संवेदनशीलता को जगा नहीं सका।

पत्रकारिता का बदलता चरित्र

यह भी एक विडंबना है कि जिन पत्रकारों से समाज को उम्मीद रहती है कि वे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगे। वही आजकल अपने सहकर्मियों की त्रुटि खोजने में अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं।

आजकल पत्रकारिता के कुछ वर्गों में समाचार की गंभीरता से अधिक “फुल और हाफ” जैसी चर्चाएँ प्रमुख हो गई हैं।
यह शब्दावली अब सिर्फ मज़ाक या हल्की टिप्पणी का हिस्सा नहीं रही। बल्कि कई बार यह पत्रकारिता के स्तर और प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े करती है।

जो लोग हर छोटी-बड़ी घटना को टटोलने और “टुनटुनाने” में माहिर माने जाते हैं। वे इस मुद्दे पर फूले हुए गुब्बारे की तरह अचानक पिचक गए।

मीडिया से अपेक्षा रखने वाला समाज

समाज हमेशा पत्रकारिता को भगवान की तरह देखता है —
यहाँ “भगवान” से तात्पर्य उस विश्वास से है जो पाठक, दर्शक और शुभचिंतक मीडिया पर रखते हैं।

लोग मानते हैं कि अगर कहीं अन्याय हुआ है। अगर किसी कमजोर के साथ अत्याचार हुआ है, तो मीडिया उसकी आवाज बनेगा।

लेकिन जब वही मीडिया खामोश हो जाए। तो उस विश्वास पर गहरी चोट लगती है।

जिन्हें मीडिया की जरूरत नहीं, और जिन्हें सबसे ज्यादा है

समाज का एक वर्ग ऐसा है जिसके पास संसाधन, शक्ति और प्रभाव है।
उन्हें मीडिया की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है क्योंकि उनकी आवाज़ पहले से ही मजबूत होती है।

लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो रोज़ सुबह घर से निकलता है और दरवाजे-दरवाजे जाकर मेहनत करके अपने परिवार का पेट भरता है।

ऐसे लोग जब किसी अन्याय का शिकार होते हैं। तब उनके पास अपनी आवाज उठाने के लिए मीडिया ही सबसे बड़ा माध्यम होता है।

यदि वही माध्यम मौन हो जा। तो उनकी पीड़ा और भी गहरी हो जाती है।

पत्रकारिता का मूल धर्म

पत्रकारिता का मूल धर्म सिर्फ समाचार लिखना नहीं है, बल्कि सच के साथ खड़े होना है।

यह जरूरी नहीं कि हर घटना को सनसनी बनाकर प्रस्तुत किया जाए। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी पीड़ित की आवाज को सिर्फ इसलिए दबा दिया जाए क्योंकि वह शक्तिशाली नहीं है या किसी समीकरण में फिट नहीं बैठता।

पत्रकारिता की विश्वसनीयता इसी पर निर्भर करती है कि वह सुविधा की नहीं, बल्कि सत्य की पत्रकारिता करे।

एक आत्ममंथन की आवश्यकता

आज जरूरत इस बात की है कि मीडिया जगत स्वयं से यह प्रश्न पूछे—

क्या पत्रकारिता का उद्देश्य सिर्फ खबरों का व्यापार रह गया है?

क्या निजी संबंध और समीकरण सच से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं?

क्या कमजोर की आवाज उठाना अब जोखिम भरा काम माना जाने लगा है?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर ईमानदारी से दिया जाए, तो शायद पत्रकारिता फिर से अपनी मूल संवेदनशीलता को पा सकती है।

कलम की जिम्मेदारी

समाज में हर पेशे की अपनी जिम्मेदारी होती है, लेकिन पत्रकारिता की जिम्मेदारी कुछ अधिक होती है क्योंकि यह जनमत और न्याय की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

जब सड़क पर घायल लोग खड़े हों। जब उनके परिवार रो रहे हों और जब न्याय की उम्मीद सिर्फ कुछ शब्दों पर टिकी हो — तब पत्रकार की कलम का मौन सबसे बड़ा अन्याय बन सकता है।

इसलिए आज आवश्यकता है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल मंत्र को याद करे —

“सत्ता से सवाल, पीड़ित के साथ और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता।”

क्योंकि यदि कलम सच के लिए नहीं उठेगी। तो समाज का विश्वास भी धीरे-धीरे मौन में बदल जाएगा।

NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

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