इतिहास बनता धनबाद का रोपवे: विरासत से खतरे तक, और अंततः विदाई….

इतिहास बनता धनबाद का रोपवे: विरासत से खतरे तक, और अंततः विदाई….

धनबाद(DHANBAD): कभी तकनीक, उद्योग और श्रम का गौरव रही धनबाद की ऐतिहासिक रोपवे प्रणाली अब इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है। दशकों तक कोयला और बालू ढुलाई को आसान बनाने वाली यह व्यवस्था अब जर्जर होकर खतरे का रूप ले चुकी थी, जिसे प्रशासन द्वारा हटाया जा रहा है।

झरिया–सिंदरी मुख्य मार्ग पर नुनुडीह दुर्गा मंदिर के समीप सड़क के ऊपर से गुजर रही जर्जर रोपवे संरचना को जिला प्रशासन ने सुरक्षित तरीके से हटवा दिया। लंबे समय से यह ढांचा हादसे को न्योता दे रहा था और किसी भी समय जानलेवा साबित हो सकता था। कार्रवाई के बाद स्थानीय लोगों और राहगीरों ने राहत की सांस ली है।

करीब तीन से चार दशक से अनुपयोगी पड़ी यह रोपवे कभी ब्रिटिश रोपवेज कंपनी द्वारा खनन क्षेत्र में सेंड फिलिंग के लिए उपयोग की जाती थी। बाद में बीसीसीएल ने भी इसका इस्तेमाल किया, लेकिन समय के साथ यह पूरी तरह जंग खाकर कमजोर हो गई। सड़क के ऊपर से गुजरते लोहे के पिलर और ढांचे से हर गुजरने वाला वाहन चालक और राहगीर भयभीत रहता था।

यह मार्ग जिले के प्रमुख संपर्क मार्गों में शामिल है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों छोटे-बड़े वाहन, स्कूली बसें, दोपहिया और भारी वाहन गुजरते हैं। यह सड़क सिंदरी, बलियापुर, चंदनकियारी होते हुए बोकारो, पुरुलिया, रांची और जमशेदपुर को जोड़ती है। ऐसे में जर्जर रोपवे के बने रहने से बड़े हादसे की आशंका बनी हुई थी।

प्रशासन ने सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पहले गैस कटर से ढांचे को काटा और फिर क्रेन की मदद से पूरी संरचना को डिस्मेंटल किया। कार्रवाई के दौरान यातायात पूरी तरह बाधित नहीं हुआ और कोई अप्रिय घटना नहीं घटी।

नुनुडीह में हटाई गई रोपवे केवल एक ढांचा नहीं, बल्कि धनबाद की रोपवे विरासत के अंत का प्रतीक भी है। कभी जीतपुर कोलियरी से चासनाला कोल वॉशरी तक कोयला पहुंचाने के लिए करीब 15 किलोमीटर लंबा रोपवे ही एकमात्र माध्यम था। इसी मॉडल से प्रेरित होकर इस्को ने चासनाला से पश्चिम बंगाल के बर्नपुर स्टील प्लांट तक लगभग 75 किलोमीटर लंबा रोपवे विकसित किया था, जो बाद में सAIL के अधिग्रहण के बाद धीरे-धीरे बंद हो गया।

109 साल पुरानी जीतपुर कोलियरी का इतिहास भी रोपवे से जुड़ा रहा—1916 में स्थापना, 1920 में उत्पादन की शुरुआत और अपने स्वर्णकाल में करीब 10 हजार मजदूरों को रोजगार देने वाली यह खदान आज इतिहास बन चुकी है।

जर्जर रोपवे हटने के बाद झरिया–सिंदरी मार्ग पर यातायात अब पहले से अधिक सुरक्षित और सुगम हो गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से वे इस ढांचे को लेकर भयभीत रहते थे, लेकिन अब बड़ा खतरा टल गया है।
वहीं उपायुक्त आदित्य रंजन ने बताया कि सड़क और भीड़भाड़ वाले इलाकों में ऊपर से गुजरने वाली रोपवे संरचनाओं को हटाने के निर्देश दिए गए हैं। लोगों की सुरक्षा को देखते हुए इन्हें चरणबद्ध तरीके से हटाया जा रहा है।

NEWSANP के लिए धनबाद से कुंवर अभिषेक सिंह की रिपोर्ट

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