“मगर ये देश रहना चाहिए” — जब कविता ने राजनीति को राष्ट्रधर्म सिखाया….

“मगर ये देश रहना चाहिए” — जब कविता ने राजनीति को राष्ट्रधर्म सिखाया….

सरकारें आएंगी, जाएंगी,
पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी,
मगर ये देश रहना चाहिए।
यह पंक्तियाँ किसी कवि का भावुक आवेग नहीं थीं।
यह उस राजनेता की प्रतिज्ञा थीं
जिसने सत्ता से पहले संविधान को
और राजनीति से पहले राष्ट्र को रखा।
अटल बिहारी वाजपेयी जी के लिए
कविता मंच की शोभा नहीं थी—
वह संकट के समय लिया गया निर्णय थी।

1991 : जब भारत केवल आर्थिक नहीं, नैतिक परीक्षा में था
साल 1991।

स्वतंत्र भारत का सबसे कठिन मोड़।
देश के पास विदेशी मुद्रा इतनी कम थी
कि कुछ दिनों का आयात भी असंभव हो गया था।
सोना गिरवी रखने की नौबत आ चुकी थी।
भारत केवल आर्थिक दिवालियापन के नहीं,
राष्ट्रीय आत्मसम्मान के पतन के मुहाने पर खड़ा था।
प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव ने
वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से पूछा—
“देश कितने दिन और चल सकता है?”
उत्तर किसी बजट रिपोर्ट की पंक्ति नहीं था,

वह इतिहास की चेतावनी थी—
“अधिकतम नौ दिन।”

नौ दिन।
इतिहास जानता है—
सभ्यताएँ इतनी ही अवधि में ढह जाती हैं।
आर्थिक विवेक बनाम राजनीतिक भय
समाधान स्पष्ट था—
रुपये का अवमूल्यन।
डॉ. मनमोहन सिंह ने साफ कहा—
“कम से कम 20 प्रतिशत।”
यह अर्थशास्त्र की मांग थी।
लेकिन राजनीति इसे
सत्ता की आत्महत्या मान रही थी।
कैबिनेट में घबराहट थी।
पार्टी नेताओं के चेहरों पर
चुनाव, विरोध, सत्ता—सब तैर रहे थे।
किसी ने कहा—
“विपक्ष सड़क पर उतर आएगा।”
किसी ने चेताया—
“सरकार गिर जाएगी।”
डॉ. मनमोहन सिंह ने पूछा—
“क्या बैठक टाल दी जाए?”
नरसिंह राव ने कहा—
“मुझे 20 मिनट दीजिए।”

वे 20 मिनट : जब कविता ने इतिहास की दिशा बदली
उन 20 मिनटों में

न कोई सौदा हुआ,
न कोई गणित बैठाया गया।
बस एक फोन किया गया—
अटल बिहारी वाजपेयी जी को।
देश की वास्तविक स्थिति बताई गई।
खतरे की गहराई समझाई गई।
अटल जी ने न विपक्ष देखा,
न सरकार की कमजोरी।
क्योंकि वे पहले ही कह चुके थे—
“मैं राजनीति का नहीं, राष्ट्रनीति का पक्षधर हूँ।”
संभवतः संवाद ऐसा ही रहा होगा…

नरसिंह राव बोले होंगे—
“अटल जी, अगर यह फैसला नहीं लिया,
तो भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर
अपमानित होगा।”
अटल जी ने शायद बस इतना पूछा होगा—
“देश बचेगा?”
उत्तर मिला होगा—
“हाँ, लेकिन राजनीतिक कीमत चुकानी होगी।”
यहीं राजनीति समाप्त हुई।
और राष्ट्र आरंभ हुआ।

अटल जी ने संभवतः कहा होगा—
“अगर यह फैसला भारत को बचाता है,
तो विपक्ष का धर्म है
कि वह सरकार के साथ खड़ा हो।”
मौन हस्तक्षेप, निर्णायक प्रभाव
अटल जी ने न भाषण दिया,
न श्रेय लिया।
उन्होंने उन नेताओं से बात की
जो विरोध कर रहे थे।
और उनसे यह नहीं कहा—
“सरकार बचाओ।”


उन्होंने कहा—
इतिहास यह नहीं पूछेगा
कि सत्ता में कौन था।
इतिहास यह पूछेगा—
क्या भारत बचा था?
यह तर्क नहीं था।
यह नैतिक आदेश था।
फैसला हुआ, देश बचा
कैबिनेट मीटिंग हुई।
कोई शोर नहीं।
कोई विरोध नहीं।
रुपये के अवमूल्यन का निर्णय
सर्वसम्मति से पारित हुआ।
भारत दिवालिया होने से बच गया।
बाद में जब डॉ. मनमोहन सिंह ने पूछा—
“उन 20 मिनटों में ऐसा क्या हुआ?”

नरसिंह राव ने कहा
“मैंने अटल जी से बात की थी।”
यह वाक्य केवल स्मृति नहीं,
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है।
यही थे अटल बिहारी वाजपेयी
जो विपक्ष में रहकर भी
देश के साथ खड़े रहे।
जो जानते थे—
“छोटे मन से कोई बड़ा काम नहीं होता।”
बहुत लोग सत्ता के लिए राजनीति करते हैं,
लेकिन बहुत कम ऐसे होते हैं
जो राष्ट्र के लिए
राजनीति त्याग देते हैं।
अटल जी उन्हीं में थे।
उनकी कविता
काग़ज़ पर नहीं,
संकट में जीवित होती थी।
और इसलिए आज भी
जब भारत आगे बढ़ता है,
इतिहास के उस मोड़ से
एक पंक्ति गूंजती है—
“मगर ये देश रहना चाहिए।”

NEWSANP के लिए रांची आर पी सिंह की रिपोर्ट

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