रांची(RANCHI):आज से ज्यादा नहीं सात -आठ साल पहले फेसबुक, यूट्यूब और वाट्सअप जैसे सोशल मीडिया की उतनी धमक, चमक और पहुंच नहीं थी. वजह इंटरनेट का प्रसार न होना और महंगा होना था. साथ ही एनरोइड फ़ोन सस्ते नहीं थे.लेकिन, जैसे -जैसे आधुनिकता ने समय के साथ रंग भरा और बाजारवाद ने सरहदे लंघी तो चीज़े सस्ती और सुचारु रूप से आम लोगों के हाथों में आई. सोशल मीडिया भी तेजी से पाँव गली-गली में पसारा. लोगों के जिंदगी की तरक्की में अहम हिस्सा बनता गया. आज सारा काम बस फोन से ऑनलाइन हो रहा हैं.जिसने जिंदगी को आसन बनाने के साथ अवसरों के अनगिनत दरवाजे खोले.
इसकी ताकत से तो रातों -रात किसी को भी नामचीन शख्शियत से नवाज़ डाला. सितारे यहां खुद पैदा होने लगे और अपने हुनर से अपनी पहचान दुनिया के कोने -कोने में बनाई. हकीकत ये भी थी कि इसका दायरा किसी एक जगह सिकुड़ा नहीं बल्कि इसका अहता सारी दुनिया हो गई. खासकर युवाओं के बीच एक सनक और साथी की तरह फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर हिस्सा बन गए.
इसकी आमद और अहिमयत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता हैं कि पडोसी नेपाल की सरकार को इसकी खिलाफत का खामियाजा तख़्तपलट के तौर पर देखना पड़ा.प्रधानमंत्री समेत मंत्रियों को फ़जीहत के साथ-साथ पिटाई और अपने वतन छोड़ने की नौबत आ गई.
आज तक कभी गुलाम नहीं रहने वाला देश नेपाल की आबादी हिन्दू बहुल हैं. लेकिन चीन परस्त ओली सरकार को सोशल मीडिया पर पाबन्दी लगानी की कीमत सत्ता गवा कर चुकानी पड़ी.हालांकि, आंदोलन की यह आग पराई नहीं बल्कि नेपाल के युवाओं की आवाज थी, जिसके शोर में नेपाल की लोकशाही और सियासतदानों के लिए मुश्किल खड़ी कर दी.
वैसे विद्रोह की आग तो पहले ही बहुत सारे मसले को लेकर सुलग रही थी. सोशल मीडिया पर बैन एक हथियार युवाओं को सरकार के विरोध के लिए मिल गया.इसकी आग की लपटे ऐसी तेज फैली की सबकुछ झुलस गया. नेताओं और मंत्रियों के पिटाते हुए वाइरल वीडियों इसके सबूत हैं
सड़क पर आंदोलन की वजह सिर्फ सोशल मीडिया पर रोक नहीं थी. बल्कि नेपाल सरकार की नीतियों के साथ ही अस्थिरता का भी एक बड़ा किरदार था, जिससे जनमानस अंदर ही अंदर खुन्नस और खार खाये हुए था.
हजारों करोड़ के घोटाले, भ्रष्टाचार का लगातार उजागर होना और राजनीतिक सौदेबाजी और अस्थिरता भी एक बड़ी वजह थी. अंदाजा लगाया ज सकता हैं कि पिछले पांच साल में तीन प्रधानमंत्री नेपाल की आवाम ने देखा और 2008 के बाद आए लोकतंत्र में 14 बार प्रधानमंत्री के बदलाव का गवाह गरीब मुल्क नेपाल बना. यहां पहले से ही गरीबी और गुरबत का साया हैं.एशिया में अफगानिस्तान के बाद नेपाल दूसरा सबसे गरीब देश हैं.
बेलगाम बेरोजगारी, महंगाई और अमीरी-गरीबी के बीच चौड़ी होती दरारों से भी नेपालवासी मर्माहत थे.
यहां के सियासतदानों, मंत्रियों और नौकरशाहों में भाई -भतीजावाद की जड़े गहरी हो गई थी. इनके बच्चे भी चांदी का चम्मच लेकर पैदा होने साथ ही एक लग्जरी लाइफस्टाइल जीते थे.जो जनमानस को चिढ़ाती थी.
इन बातों के अलावा लगातार चीन की नेपाल में परछाई और उसके कर्ज जाल में यह मुल्क फंसता जा रहा था.जिसकी भी समय -समय पर मुखाल्फ़त देखने को मिलती थी.नेपाल की विदेश नीति भी चीन के ही इर्द -गिर्द घूम रही थी. वही रोटी -बेटी का रिश्ता रखने वाले हिंदुस्तान से फासले लगातार बढ़ते ही जा रहे थे .भारत और नेपाल के बीच सीमा पर लिपुलेख का विवाद अभी तक नहीं सुलझा था .
नेपाल में 2008 तक राजशाही थी, इसके बाद लोकतान्त्र का लोकार्पण हुआ.लेकिन नेपाल के सियासतदानों ने एक बेहतर शासन का वादा कर अपना ही विकास पर ध्यान केंद्रित किया. इसी का नतीजा आज है कि यहां के नेताओं को जलवतनी की नौबत आन पड़ी .
आगे नेपाल का भविष्य क्या होगा? कैसे वहां की नई सरकार बनेगी? क्या युवा नेता बलेन शह नेपाल के नये पीएम बनेंगे और कब माहौल शांत होगा? यह देखने वाली बात होगी.
अपने देश भारत के लिए भी पड़ोसी देश में लगी यह आग चिंता का सबब है. क्योंकि नेपाल सिर्फ पडोसी देश ही नहीं बल्कि एक हमवतन जैसा ताल्लुकात रखता हैं.इसकी कला, संस्कृति की साझी विरासत हिंदुस्तान से मिलती है.
तख्तापलट और विद्रोह के हालात नेपाल से पहले बांग्लादेश में भी हुआ था. वहां के आवाम के आंदोलन ने भी खालिद जिया की सरकार को उखाड़ फेंका था. इन दोनों के अलावा अफगानिस्तान में भी तालिबानियों ने विद्रोह कर सत्ता पर फिर से कब्ज़ा जमाया. वही मयंमार, श्रीलंका में भी गृह युद्ध और आंदोलन की आग सुलग चुकी हैं. मयंमार में तो अभी भी हालात जस के तस हैं.
भारत के लिए यह वक्त सावधान रहने का हैं, क्योंकि लाजमी हैं की पडोसी के घर की आग की लपटों की तपिश और गर्माहट यहां भी महसूस होगी.
NEWSANP के लिए शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट

