“इतिहास के स्वर्णपृष्ठों की यात्रा गाथा:मिहिजाम में गुप्तकाल के वैभव पर ज्ञान वर्धक परिचर्चा”…

“इतिहास के स्वर्णपृष्ठों की यात्रा गाथा:मिहिजाम में गुप्तकाल के वैभव पर ज्ञान वर्धक परिचर्चा”…

जामताड़ा(JAMTADA):इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवनदृष्टि है जो हमें अपने अतीत से जुड़कर वर्तमान को समझने और भविष्य के निर्माण की दिशा देने में सक्षम बनाती है।

इतिहास विभाग की संगोष्ठी में गुप्तकाल के स्वर्णयुग पर विद्वत्तापूर्ण विमर्श, ज्ञान के विविध पक्षों पर गहराई से चर्चा

मिहिजाम (जामताड़ा), 10 मई।
डिग्री महाविद्यालय, मिहिजाम के इतिहास विभाग द्वारा शनिवार को ‘गुप्तकाल का स्वर्णयुग’ विषय पर आयोजित विभागीय संगोष्ठी में इतिहास, गणित, साहित्य, कला, संस्कृति एवं सामाजिक जीवन के आयामों पर व्यापक चर्चा हुआ। इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर कृष्ण मोहन साह की अध्यक्षता में आयोजित संगोष्ठी ने न केवल अकादमिक गहराई को दर्शाया, बल्कि इतिहास को वर्तमान से जोड़ने का प्रयास भी किया।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता डॉ. मोहम्मद रिजवान (विभागाध्यक्ष, इतिहास, जामताड़ा कॉलेज) ने गुप्तकालीन भारत की वैज्ञानिक चेतना, सांस्कृतिक समृद्धि, तथा सामाजिक समरसता पर विस्तार से प्रकाश डाला। अपने ओजस्वी वक्तव्य में उन्होंने गुप्तकाल को भारत के इतिहास का ऐसा चरण बताया जो न केवल ‘स्वर्णयुग’ की संज्ञा का अधिकारी है, बल्कि जिसकी समकालीन व्याख्या आज के भारत के पुनर्निर्माण में भी सहायक हो सकती है।

डॉ. रिजवान ने “इतिहास, गणित और संस्कृति का त्रिवेणी बताया”

डॉ. रिजवान ने आर्यभट्ट और कालिदास जैसे गुप्तकालीन विभूतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह काल केवल राजनीतिक स्थायित्व या सैन्य विजय का नहीं था। बल्कि बौद्धिक उत्कर्ष, शैक्षणिक नवाचार, और सांस्कृतिक वैश्विकता का काल था। उन्होंने कहा:

“शून्य और दशमलव का आविष्कार गुप्तकाल की वह अमिट देन है। जिस पर आज विश्व गणित टिका है। लेकिन इस क्षेत्र में आज भी नवाचार और शोध की अपार संभावनाएँ हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास का उद्देश्य केवल बीती घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं। बल्कि उनके माध्यम से वर्तमान की गहराई को समझना और भविष्य के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करना है। उनके अनुसार, “इतिहास पढ़ना मतलब एक दर्पण में अतीत को देखकर वर्तमान का विश्लेषण करना है।”

प्रोफेसर अमिता सिंह ने गुप्तकालीन समाज की बहुआयामी समीक्षा प्रस्तुत की

कार्यक्रम का संचालन करते हुए इतिहास विभाग की प्राध्यापिका प्रो. अमिता सिंह ने गुप्तकाल के साहित्य, कलात्मक अभिव्यक्ति, वास्तुकला, धार्मिक सहिष्णुता, आर्थिक नीतियाँ और मुद्रा प्रणाली पर अत्यंत तथ्यपरक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि कालिदास की रचनाएँ केवल काव्यात्मक सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि उस युग की सामाजिक मनोवृत्ति और सांस्कृतिक चेतना का भी प्रतिबिंब हैं। उनके अनुसार:

“गुप्तकाल में कला और स्थापत्य को आध्यात्मिकता और विज्ञान के साथ जोड़ा गया था। चाहे नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय हों या अजंता-एलोरा की गुफाएँ—हर एक रचना में ज्ञान और सौंदर्य की युति है।”

छात्राओं की प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ : नयी पीढ़ी की ऐतिहासिक समझ का परिचय

इस संगोष्ठी की विशेषता थी छात्राओं की ऐतिहासिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण प्रस्तुतियाँ। सेबी खातून, रिमसा खातून, और रिंकी कुमारी ने गुप्तकाल की उपलब्धियों को समसामयिक संदर्भों से जोड़ते हुए अपने विचार व्यक्त किए। उनकी प्रस्तुतियाँ ज्ञानवर्धक होने के साथ-साथ भावनात्मक भी रहीं। जिनमें उन्होंने गुप्तकालीन शिक्षा प्रणाली, नारी की स्थिति और व्यापार के वैश्विक स्वरूप पर प्रकाश डाला।

सेबी खातून ने अपने वक्तव्य में गुप्तकाल की शिक्षा प्रणाली को भारतीय ज्ञान परंपरा की रीढ़ बताते हुए कहा:

“तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को गुरुकुल और अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिकता का प्रारंभिक स्वरूप प्रदान किया।”

धन्यवाद ज्ञापन में ऐतिहासिक विवेक और समालोचना की आवश्यकता पर बल

इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अरविंद कुमार सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि गुप्तकाल को स्वर्णयुग कहना उचित है। लेकिन यह भी आवश्यक है कि हम अन्य समकालीन और पश्चातवर्ती राजवंशों जैसे राजपूत, चोल, पल्लव और मौर्य काल से इसकी तुलना करके निष्पक्ष ऐतिहासिक विवेचना करें।

उन्होंने कहा:

“हमें इतिहास को केवल महिमामंडन का साधन नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण विश्लेषण का माध्यम मानना चाहिए। गुप्तकाल के मूल्यांकन में उसकी सीमाओं और उपलब्धियों—दोनों को समझना आवश्यक है।”

प्राचार्य प्रो. साह ने विद्वत्ता को दिया सम्मान, भविष्य की गतिविधियों की रूपरेखा स्पष्ट की

संगोष्ठी के अध्यक्ष प्राचार्य प्रो. कृष्ण मोहन साह ने मुख्य वक्ता डॉ. रिजवान को प्रशंसा पत्र भेंट करते हुए उनके योगदान को महाविद्यालय के लिए प्रेरणास्पद बताया। उन्होंने कहा:

“हम चाहते हैं कि ऐसे विद्वान वक्ताओं का सहयोग आगे भी प्राप्त होता रहे। इतिहास जैसे विषय में नवाचार और नई पीढ़ी की भागीदारी आवश्यक है।”

उन्होंने भविष्य में अन्य ऐतिहासिक युगों जैसे मौर्यकाल, मुगलकाल और स्वतंत्रता संग्राम पर भी संगोष्ठियाँ आयोजित करने की योजना की घोषणा की।

कार्यक्रम में विद्वानों और विद्यार्थियों की गरिमामयी उपस्थिति

इस अवसर पर महाविद्यालय की आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन समिति (IQAC) के समन्वयक डॉ. सोमेन सरकार, NEC समन्वयक डॉ. राकेश रंजन, एवं वरिष्ठ शिक्षकगण—शंभू सिंह, बी. पी. गुप्ता, दिनेश किस्कू, बी. एन. प्रसाद, जयश्री, पुष्पा टोप्पो, पूनम कुमारी, एवं डॉ. के. के. बरनवाल समेत अनेक विशिष्टजन उपस्थित थे।

अन्य गणमान्य उपस्थित लोगों में शबनम खातून, देवकी पंजियारा, उपेंद्र पाण्डेय, रेखा कुमारी, संतोषनी सोरेन, राज कुमार मिस्त्री, अभिजीत सिंह ख़रतौल, दिनेश रजक आदि प्रमुख रहे। सभी उपस्थितजनों ने संगोष्ठी के विभिन्न पक्षों की सराहना करते हुए इसे अत्यंत ज्ञानवर्धक और प्रेरक बताया।

बिंदुवार रूपरेखा : संगोष्ठी में प्रमुख चर्चित बिंदु

  1. गुप्तकाल का ऐतिहासिक महत्व – राजनीतिक स्थायित्व, साम्राज्य विस्तार एवं प्रशासनिक संगठन।
  2. शैक्षणिक उत्कृष्टता – नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों की स्थापना।
  3. गणित एवं खगोलशास्त्र – आर्यभट्ट के सिद्धांत, दशमलव, शून्य और कालगणना प्रणाली।
  4. साहित्यिक उत्कर्ष – कालिदास, विष्णु शर्मा, भास, सुधाकर आदि की काव्य एवं नाट्य कृतियाँ।
  5. कला एवं स्थापत्य – गुप्तकालीन मंदिर, मूर्तिकला, चित्रकला और वास्तुकला का विकास।
  6. धार्मिक सहिष्णुता – हिंदू धर्म के साथ बौद्ध एवं जैन धर्म के प्रति सम्मान की नीति।
  7. अर्थव्यवस्था और व्यापार – सिक्कों की प्रणाली, आंतरिक एवं समुद्री व्यापार का विस्तार।
  8. समाज व्यवस्था – वर्ण व्यवस्था, स्त्री की स्थिति और शहरी-ग्रामीण जीवन की संरचना।
  9. इतिहास का वर्तमान से संबंध – इतिहास को केवल स्मृति नहीं, बल्कि आधुनिकता से जोड़ने का माध्यम।
  10. छात्रों की सहभागिता – भावी इतिहासकारों की समझ और प्रस्तुतियों ने आयोजन को जीवंत बनाया।

निष्कर्ष : अतीत से वर्तमान की ओर एक बौद्धिक सेतु

इस संगोष्ठी ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवनदृष्टि है जो हमें अपने अतीत से जुड़कर वर्तमान को समझने और भविष्य के निर्माण की दिशा देने में सक्षम बनाती है। ‘गुप्तकाल का स्वर्णयुग’ विषय पर हुई यह संगोष्ठी न केवल एक शैक्षणिक आयोजन थी, बल्कि एक बौद्धिक जागरण की प्रक्रिया थी, जिसमें ज्ञान, संस्कार और शोध की त्रिवेणी प्रवाहित हुई।

NEWSANP के लिए धनबाद से आर पी सिंह की रिपोर्ट

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