बिहार में बढ़ रहें अपराध सेे चिंतित हुए बुद्धिजीवी…क्या नीतीश का सुशासन फेल हो रहा है..? अपराधियों के निशाने पर आम आदमी के साथ पुलिस भी…योगी मॉडल अपनाने की उठी मांग…

बिहार में बढ़ रहें अपराध सेे चिंतित हुए बुद्धिजीवी…क्या नीतीश का सुशासन फेल हो रहा है..? अपराधियों के निशाने पर आम आदमी के साथ पुलिस भी…योगी मॉडल अपनाने की उठी मांग…

पटना(PATNA): बिहार में एक समय था जब एक लाल टोपी वाले लाठीधारी पुलिस जवान को देखकर ही अपराधी भाग खड़े होते थे। एक आज का समय है जब अपराधी हथियार बंद पुलिस वालों को न सिर्फ दौड़ा रहे हैं बल्कि उनकी जान तक ले ले रहे हैं।
बिहार में होली के मौके पर पुलिस पर कई जगह हमले हुए। इसमें दो एएसआई को अपनी जान गवानी पड़ी। अनेक अस्पताल में इलाज करवा रहे हैं। बिहार में यह रोजमर्रा की घटना हो गई हैं।
यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि 360 डिग्री का यह बदलाव कैसे हो गया?
पुलिसवाले न पहले पहलवान होते थे न अब होते हैं कि उनके डर से अपराधी भागते थे। अपराधी इसलिए पुलिस से डरते थे क्योंकि वे जानते थे कि इसके पीछे राज्य सत्ता की ताकत है। अगर पुलिसवाले के साथ कुछ किया तो पूरी सरकार उसके पीछे पड़ जाएगी और उसे कहीं छिपने की भी जगह नहीं मिलेगी। पुलिस सरकार की ताकत से बलशाली थी। सरकार का इकबाल था, जिससे अपराधी डरते थे, भागते थे।

लेकिन जब राज्य सत्ता ही लुंजपुंज और निस्तेज हो जाए तो सरकार से जुड़ी सभी संस्थाएं अपनी आभा और प्रभाव खो बैठती हैं। जब सरकार का इकबाल खत्म हो जाता है तो राज्य की जो दुर्दशा होती है, वही बिहार आज भोग रहा है।

पुलिस पर हमले उसकी कमजोरी के कारण नहीं बल्कि सरकार की कमजोरी के कारण हो रहे हैं। 2005 से 2010 तक के नीतीश सरकार के कार्यकाल को याद कीजिए। यही बिहार पुलिस थी जिसके डर से अपराधी भागे भागे फिरते थे। क्यों? क्योंकि तब सरकार का इकबाल था। अपराध खत्म करने की उसकी मजबूत इच्छाशक्ति थी। आज दोनों नहीं है। फिर पुलिस को तो पिटना ही होगा!
2005 के पहले का कार्यकाल भी याद करें। उस काल में भी पुलिस निष्प्रभावी हो गई थी। क्योंकि तब अनेक अपराधी गिरोहों को राज्य सत्ता का संरक्षण प्राप्त था। ऐसे में पुलिस को पंगु होना ही था।
पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की परिस्थितियां भी बिहार से मिलती जुलती है। मौजूदा सीएम योगी आदित्यनाथ और उनके पूर्व के सीएम अखिलेश यादव के कार्यकाल की तुलना करें तो बिहार जैसी ही तस्वीर वहां भी दिखेगी।

मेरी राय में बिहार में पुलिस पर हो रहे लगातार हमले बिहार सरकार की नाकामी है, बिहार पुलिस की नहीं। पुलिस का इसमें आंशिक योगदान भर ही है।

हमले की घटनाओं के बाद हुई राष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी के बीच एक बड़े पुलिस अधिकारी का बयान आया कि पुलिस गोली का जवाब गोली से देगी। ऊपरी तौर से लगता है कि अब अपराधियों की खैर नहीं। लेकिन ऐसा कुछ होता दिखता नहीं।

यह बयान देखकर मुझे सन 2000 से पहले के चुनाव याद आ गए। चुनाव के ठीक पहले राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक प्रेस कांफ्रेंस कर घोषणा करते थे कि शांतिपूर्ण चुनाव की तैयारी पूरी कर ली गई है। बूथ लुटेरों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए हैं। लेकिन बूथ जम कर लूटे जाते, खूब हिंसा होती और पुलिस की तरफ से एक भी गोली नहीं चलती थी।

इसमें दो राय नहीं कि पुलिस की कार्य प्रणाली और उसके भ्रष्ट आचरण से आम आदमी आक्रोशित है। शराबबंदी ने पुलिस को और भ्रष्ट किया है, इसे पुलिसवाले भी स्वीकार करते हैं। काम के अत्यधिक बोझ और पुलिस लाइनों की अमानवीय व्यवस्था, पुलिसवालों को भी अमानवीय बना रही है। इन पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

NEWSANP के लिए पटना से ब्यूरो रिपोर्ट

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