‘आप’ का आंदोलन से जन्म और विजय से पराजय तक का सफर…

‘आप’ का आंदोलन से जन्म और विजय से पराजय तक का सफर…

दिल्ली(DELHI):रेत पर उकेरी गई तस्वीर की उम्र लंबी नहीं होती. ठीक उसी तरह बगैर मूल्य और सिद्धांतो के बिना सियासत में नेता और पार्टी भी लड़खड़ा कर गिर जाती है.
दिल्ली में करारी शिकस्त खाये आम आदमी पार्टी का भी कुछ ऐसा ही हाल ए हश्र हुआ. इस हार के बाद वैकल्पिक राजनीति का दम्भ भरने वाले केजरीवाल ने एक ख्वाब का भी अंत ही कर दिया. जिनसे आम आदमी की बड़ी उम्मीदें लगी हुई थी कि कुछ तो बदलेगा, कुछ तो अच्छा होगा, कुछ तो अरमान पूरे होंगे . लेकिन, इस पराजय ने ढेरों सवाल छोड़ दिए और आज आम आदमी खुद को कहीं न कहीं ठगा और अफ़सोस महसूस कर रहा है.

आन्ना हजारे के आंदोलन से जन्मी पार्टी ‘आप ‘ तो बनी थी. उस भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने और नेस्तनाबूत करने के लिए जिससे आम जन त्रस्त और पस्त थी . 26 नवम्बर 2012 को जन्म ली इस पार्टी पर ऐतबार लोगों ने जताया कि सियासत के रास्ते ही केजरीवाल आम आदमी के इंसाफ और हक़ हकूक के लिए लड़ेंगे और एक बदलाव की बयार बहेगी.
अफ़सोस जिस भ्रष्टाचार के दीमक को मारने के लिए पार्टी ने कसमे खाई थी, यही दीमक इनके दामन में भी चिपक गए और 2025 में सारा बेड़ा गर्क कर दिया.
दिल्ली की हार सिर्फ आप के लिए हार ही नहीं है, बल्कि एक ख्वाब और एक सपनों का भी मर जाना है.
दरअसल, अन्ना हजारे के आंदोलन के दरमियान पूरा देश तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ थी. हर तरफ बुजुर्ग अन्ना हजारे के उपवास की चर्चा और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जंग छिड़ी थी. इसी आंदोलन में केजरीवाल की सादगी और आम आदमी की झलक दिखी. लोगों ने उनकी बातों और सफगोई ने मुरीद बना डाला था. उस दरमियान हर चिज़ पर केजरीवाल का नज़रिया और तीखे अंदाज से अवाम सीधे जुड़ते चले गए थे .
अन्ना हजारे तो केजरीवाल के सियासत में कदम रखने के बाद किनारे हो गए और फिर केजरीवाल ने भी उन्हें अपने साथ लाने की जरुरत नहीं समझी, क्योंकि खुद के पैर राजनीति में जमाना चाहते थे, वो मकसद आम आदमी पार्टी बनाकर पूरा कर लिया. अन्ना हजारे ने केजरीवाल की नीतियों और नैतिकता पर समय -समय पर सवाल उठाया, आगाह किया और विरोध करते रहे.
आम आदमी पार्टी ने जब पहला चुनाव लड़ा तो बहुमत से दूर थी. बावज़ूद इसके, उन्होंने कांग्रेस के सहारे सत्ता में आ गई और केजरीवाल पहली बार मुख्यमंत्री बने , जबकि कांग्रेस के साथ नहीं जाने के उस वादे को भूला दिया था.

हालांकि,आवाम ने फिर भी उन्हें मौका दिया और 2015 के चुनाव में बम्पर 70 में से 67 सीट जितवा दी. इस दरमियान बहुत कुछ बदलने लगा था. सादगी का राग अलापने वाले सत्ता के लिए रंगीनयत में रमने लगे थे. नैतिकता भी गुजरे ज़माने की बात लगने लगी थी. मफलर बांधकर आम आदमी वाला अंदाज केजरीवाल का पीछे छूट गया था. इसके साथ ही कई करीबी भी पार्टी के अंदर मचे कोहराम, उपेक्षा और घुटन से एक- एक कर किनारे होते गए.
हालांकि, केजरीवाल सत्ता की चाबी कैसे अपने पास रखनी है, कौन से सियासी दांव -पेंच कब चलने है, कैसे मुफ्त की योजनाओं के जरिए लोगों को बांधे रखना है. इस कला और कालाबाजी में माहिर हो चुके थे और सफलता भी उनके हाथ आई और राष्ट्रीय राजनीति में भी अपने चेहरे को स्थापित किया.
2020 के दिल्ली चुनाव में भी ‘आप ‘जनता का समर्थन हासिल करने में कामयाब हुई और 70 में 62 सीट जीत लिया. भाजपा और कांग्रेस को फिर पास फटकने नहीं दिया, जबकि देश में मोदी मैजिक परवान पर था.
आप तो सत्ता में आई, लेकिन, अपने वसूल, नीति -सिद्धांत से भटकती चली गई. आम आदमी वाला अक्स धुंधलाने लगा था और केजरीवाल अब सियासी बिसात पर कुछ तेजी से दौड़ना नहीं बल्कि उड़ान भरना चाहते थे. वैसे उनकी पार्टी को पंजाब में सत्ता भी मिली और गुजरात चुनाव में भी अपनी पहचान छोड़ी और आप को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी मिला.

इस तेजी को झटका यकायक शराब घोटाले में नाम आने के बाद लगा फिर ‘आप’ का रंग उतरने लगा. इसके चलते मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और खुद अरविन्द केजरीवाल को मुख्यमंत्री रहते जेल जाना पड़ा. सलाखों से बाहर आए तो सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी. पार्टी को काफ़ी परेशानी, फ़जीहत और तोहमते झेलनी पड़ी.
इसके साथ ही रही -सही कसर उनके बांग्ले में करोड़ों रूपये झोकने की चर्चा ने पूरा कर दिया. उनके शीशमहल बनाना भी चुनावी चर्चा का केंद्र में रहा. चुनाव के दौरान ही पार्टी के आठ विधायक टूटकर बीजेपी में शामिल हो गए. इसके बाद भी सच -झूठ और वादे -इरादों का ऐसा फ़साना और खेल देखने को मिला की आम आवाम का पार्टी से मोह भंग हो गया और नतीजा ये हुआ कि ‘आप’ दिल्ली चुनाव में हारकर 22 सीट पर सिमट गई.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की पराजय ने कई सवालों को जन्म दिया और देश में आंदोलन से जन्मी पार्टी और वैकल्पिक राजनीति पर भी एक सवाल और बहस छेड़ दिया है . यह हार सिर्फ ‘आप ‘की ही नहीं है बल्कि एक भरोसे का टूटना और एक सपने का बिखर जाने जैसा भी है.जिसे फिर से कायम करने और विश्वास को जीतने में शायद काफ़ी समय लग जाए.

NEWSANP के लिए दिल्ली से शिवपुजन सिंह की रिपोर्ट

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