दिल्ली चुनाव : कट्टर ईमानदार केजरीवाल हारे! , मुफ्त की रेवड़ियां भी धरी की धरी रह गई …

दिल्ली चुनाव : कट्टर ईमानदार केजरीवाल हारे! , मुफ्त की रेवड़ियां भी धरी की धरी रह गई …

रांची(RANCHI):सियासत में जब तक किसी नेता की चक्कलस चलती है, तबतक ही उसकी पूछ -परख और पहुंच बरकरार रहती है. एक शिकस्त के बाद फिर मजारा भी बदल जाता है, फिर वापसी की जोर -आजमाइश होती है. ये सिलसिला और कारवा चलता रहता है, क्योंकि सियासत की लालसा में ये चिज़े एक सिस्टम की तरह चलते रहती, जो की एक ख़ालिस फितरत है.
किसी भी नेता का सियासत में सूरज उदय और अस्त भी होता रहता है. इतिहास के कई पन्ने में बड़े सलीके से ये चिज़े दफ़न है, जो एक रौशनी फैलाकर नसीहते देते रहती है.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविन्द केजरीवाल की पार्टी आप का भी ऐसा ही कुछ हुआ. पिछले दस साल तक सत्ता में हनक के साथ केजरीवाल काबिज रहें. अपनी मुफ्त की योजनाओं और अपनी बेबाकी से बेधड़क सत्तासीन रहें. ऐसा लगा दिल्ली जीतने का सपना भाजपा और कांग्रेस के लिए अब रेत से तेल निकालने वाली बात हो गई है. क्योंकि दिल्ली में केजरीवाल की किलेबंदी ही जबरदस्त रही. पिछले दो चुनाव में70 सीट वाले दिल्ली विधानसभा में आप ने एकबार 67 तो दूसरी बार 62 सीट लाकर अजेय रही.
लेकिन, इसबार चुनाव में भाजपा ने उनके किले में शानदार तरीके से सेंध लगाया और कौई मौका नहीं दिया और सत्तासीन हो गई. भाजपा को दिल्ली की सल्तनत पर आसीन होने में 27 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा. ऐसे में ये जीत वाकई बीजेपी की लाजवाब और दमदार है. दिल्ली का रिजल्ट एकबात को साबित भी करती है कि जनता ही असल इस लोकशाही की मालिक है और असली राजा है.

सवाल है मुफ्त की रेवाड़ीयां बाँटने वाले और खुद को कट्टर ईमानदार कहने वाले केजरीवाल अचानक क्यों हार गए?, उनका तिलस्म कैसे टूट गया?और आखिर क्या बात हो गई कि जनता ने नापसंद कर दिया?.

इन सवालों का जवाब ढूंढे तो कई बाते निकलती है जो दिल्ली चुनाव में आप की पराजय की पटकथा लिख गई. तमाम टॉप लीडर जो बोलते ही नहीं थे बल्कि बहुत कुछ अनाप -शनाप बे सिर -पैर बक जाते थे. आज ये नेता भी हारे हुए लश्कर में साथ है. जिनमे अरविन्द केजरीवाल समेत मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज, सोमनाथ भारती जैसे कद्दावर नेता शामिल हैं.

अगर आप की हार की वजहों को तलाशें तो सबसे बड़ी वजह कथित शारब घोटाले में भ्रष्टाचार की तोहमतो पर उनके नेताओं का जेल जाना रहा. जेल से छूटने के बाद केजरीवाल को सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी. खुद को कट्टर ईमानदार बोलने वाले केजरीवाल की ईमानदारी की सादी कमीज पर ये गहरा दाग लगा गया. भ्रष्टाचार का मुद्दा इस चुनाव में आप के लिए नुकसानदायक साबित हुआ, जिसने भरोसा तोड़ा . इसके साथ ही अनर्गल और आलतू -फालतू बयान जैसे की हरियाणा से जमुना में जहरीला पानी आ रहा हैं. और भाजपा लोगों को मरना चाहती हैं, जैसे बेवजह आरोप लगाए.
इधर केजरीवाल ने ही जब राजनीति में कदम रखा तो कहा था कि वे कोई सरकारी सुविधाए और सुरक्षा नहीं लेंगे. लेकिन उन्होंने ही शीश महल बनाया और z प्लस की सुरक्षा ली. यानि उनकी कथनी और करनी में फर्क दिखा.

जमुना में बहते गंदे पानी और उसकी सफाई का मसला भी चुनाव में छाया रहा. जबकि इसकी सफाई की जहमत आप सरकार ने नहीं दिखाई.जबकि एक दशक तक शासन दिल्ली का किया.
भाजपा ने आप सरकार की तमाम नाकामियों को सलीके से और तर्कपूर्वक जनता के सामने रखा और आप की मुफ्त योजनाओं के बदले इसकी काट भी लाई और 27 सालों बाद दिल्ली फतह कर ली.
इधर कांग्रेस को तो पहले से ही मालूम था कि रेस में वो हैं ही नहीं. मुकाबला शुरुआत से ही आप और भाजपा में ही थी.

आप की दिल्ली और पंजाब में दो जगह सरकार थी. जिसमे केजरीवाल की पार्टी आप दिल्ली का रण हार गई. जो उनके और उनकी पार्टी के लिए एक तगड़ा और करारा झटका हैं. पार्टी की एक तरह से कमर टूट गई हैं.जिससे उबरने के लिए लाजमी हैं कि आप को जमीन पर मशशकत और मेहनत करनी पड़ेगी.

NEWSANP के लिए रांची से शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट

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