बागमती में 85 किमी मे तीन बराज:पानी की गारंटी कौन करेगा?

बागमती में 85 किमी मे तीन बराज:पानी की गारंटी कौन करेगा?

बिहार(BIHAR): बिहार में अभी बाढ नियंत्रण,सिंचाई के नाम पर नदियों में बराज निर्माण की चर्चा जोरों पर है। सिंचाई मंत्री ने पूर्वी चम्पारण के अरेराज के समीप गंडक में,पश्चिम चम्पारण में मसान नदी पर,सुपौल में कोशी नदी पर डगमारा में तथा सीतामढी में बागमती नदी में ढेंग तथा कटौंझा में बराज निर्माण की घोषणा की है।बराज के डीपीआर बनाने की भी खबरें आ चुकी हैं।इधर आमजन में बराज के लाभ-हानि पर भी प्रदेश में चर्चा शुरु है।सीतामढी जिले में पहले ढेंग में एक बराज बनाने का ऐलान हुआ था अब दो बराज ढेंग के अलावे कटौंझा में भी बनाने का सरकार ऐलान कर चुकी है।बराज को बाढ नियंत्रण तथा सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण बताया जा रहा है..

जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि बराज जहां कहीं भी बनी है तबाही बढी है।वैसेआमजन को भ्रमित करने का सरकार का यह 2025 का चुनावी सगूफा भी हो सकता है?

बराज जब बाढ नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है तब बिहार में पूर्व से बने बराज का अध्ययन जरुरी है।कोशी के बीरपुर में1965में बने बराज को देखा जा सकता हैं।जहां बराज से नेपाली क्षेत्र के लाखों एकड में गाद तथा जल जमाव हो चुका है तथा बराज के पूर्वी नहर में बालू भरने से बिजली उत्पादन केन्द्र भी फेल है।प्रत्येक वर्ष बालू हटाने के बाद कुछ महीने विधुत उत्पादन केन्द्र चलता है और लक्ष्य के 20% हीं विद्युत उत्पादन होता है। नहरों के अगल-बगल में निकाले गये बालू का अम्बार भी देखा जा सकता है। जहांतक नहरों से सिंचाई की बात है उस पानी के साथ बालू खेतों में पहुंचकर खेतों को खडाब बना रहा है जिससे किसान चिंतित हैं।अगर बराज से बाढ नियंत्रण होता तो कोशी में बाढ नियंत्रण हो गया होता।कुशहा जैसी त्रासदी नही होती तथा अन्य जगहों पर भी तटबंध नही टूटते।बराज बनने से उल्टे तबाही बढती हीं जा रही है।साढे नौ लाख क्यूसेक पानी की क्षमता बाले बीरपुर बराज के उपर से 6•8क्यूसेक पानी आने पर हीं पानी बराज के उपर से बह गया।क्योंकि बराज से उतर का क्षेत्र गाद से भर चुका है।
फरक्का बराज से कितनी तबाही है इस संबंध में स्वंय मुख्य मंत्री नीतीश कुमार तथा उनके सिंचाई मंत्री फरक्का बराज को तोडने तथा डिकमीशनिंग करने तक की बात कह चुके है भले हीं आज एन डी ए गठबंधन का हिस्सा बन जाने पर चुप हैं।विशेषज्ञ भी फरक्का बराज को बडी तबाही बता रहा है।फरक्का बराज के चलते पटना से फरक्का तक गंगा में गाद जमा होने से पटना सहित गंगा के अगल-बगल के दर्जन भर जिलों में तबाही बढी है।इस वर्ष 2024में भी गंगा के अगल-बगल के जिलों में जान-माल की बडी क्षति हुई है..

बराज अगर वरदान होता या बाढ की समस्याओ का निदान करता तो बिहार में बाढ प्रभावित क्षेत्र घटना चाहिए उल्टे बढता हीं जा रहा है।बाढ प्रभावित क्षेत्र 1954में 25लाख हेक्टेयर था जो अब 72.95लाख हेक्टेयर हो गया है..

बागमती नदी के ढेंग तथा कटौंझा में बराज बनाने से पूर्व सरकार को सीतामढी तथा शिवहर जिलावासियों को बताना चाहिए कि 1970-80 के दशक में बागमती नदी के ढेंग में बराज बनाने की योजना का क्या हुआ? 2900वर्ग किमी मे बाढ से सुरक्षा तथा तीन लाख एकड जमीन में सिंचाई के वायदे का क्या हुआ?उस बराज परियोजना को क्यों स्थगित किया गया?वह बराज कहां चला गया?योजना की विफलता तथा अरबों रुपए की बर्बादी की कोई जबाबदेही तय हुई?

सरकार को बताना चाहिए कि भारतीय क्षेत्र से पहले किसकी विफलता से नेपाल सरकार बागमती नदी के ढेंग से 35 कि मी उतर करमहिया (नेपाल)में बराज निर्माण करा लिया और सिंचाई के मौके पर पानी घेरकर अपना सिंचाई करता है और वर्षा ऋतु में पानी छोड़कर भारतीय क्षेत्र को तबाह करता है..

वैसे अब तो जलवायु परिवर्तन का ऐसा बुडा असर है कि बागमती नदी की स्थिति इतनी दयनीय है कि फरबरी माह में बराज स्थल पर लखनदेई बचाओ संघर्ष समिति, सीतामढी के साथियों तथा नदी यात्री गोआ निवासी कलानन्द मणी के साथ लखनदेई बचाओ संघर्ष समिति तथा जलवायु परिवर्तन नदी विमर्श मंच के सदस्य के रुप में मैं स्वंय करमहिया बराज तथा नूनथर का स्थल निरीक्षण किया और पाया कि नदी की धारा नूनथर पहाड के बगल से करीब 40फीट से कम में बह रही थी।नदी की धारा में पत्थर-बालू भरा पाया।करमहिया बराज के सभी फाटक खुले थे पर पानी नदारद था क्योंकि हिमालय क्षेत्र से हीं पानी के श्रोत में पानी का अभाव होता जा रहा है..

सरकार को बताना चाहिए कि नेपाल के करमहिया बराज से भारत को कितना पानी मिलेगा?
बिहार सरकार को बागमती क्षेत्रवासियों को यह भी बताना चाहिए कि बागमती नदी में किस माह में कितना क्यूसेक जलप्रवाह होता है? और किस माह में बराज को कितना पानी मिलेगा जिससे सिंचाई हो सकेगी।
बागमती क्षेत्र के लोग बताते है कि विगत एक दशक से अधिक से बागमती में बाढ नही आ रहा है कभी-कभार जो थोडा पानी आया भी उससे नदी के पेट स्थित खेत भी नही पट सका।इस वर्ष भी लगातार वर्षा का अभाव हीं था।अंतिम सीजन में जलवायु परिवर्तन का हीं असर था कि अंतिम सीजन अगस्त के अंत में एकाएक भारी वर्षा हुई और बाढ आया, तटबंध टूटा और भारी बर्बादी हुई..

बराज निर्माण से अगर पानी मिलता है तो जिले के बैरगनिया,मेजरगंज, सुप्पी, पीपराही, वेलसंड तथा रून्नीसैदपुर प्रखंड के दर्जनो गांव जो बागमती तटबंध के भीतर हीं रच-बस गयें हैं ..

बागमती परियोजनान्तर्गत उनका विस्थापन नही हो सका था उनके विस्थापन का भी सवाल उठेगा।बराज बनने पर बैरगनिया तथा मेजरगंज प्रखंड के साथ नेपाल के गौर रौतहट सहित अन्य गांवों पर भी पानी का दबाव बनेगा उस क्षेत्र की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है।इतना हीं नही नेपाल के करमहिया बराज के बाद नेपाल बागमती के दोनो ओर तटबंध बनाकर नो मैन्स लैंड से पहले अपने तटबंध को खुला छोड दिया है बराज बनने के समय नेपाल के तटबंध के नोज से बागमती तटबंध को जोडने हेतू नेपाल से समझौता भी आवश्यक होगा..
सरकार को सभी समस्याओं पर जनता को विश्वास में लेकर बराज की बात करनी चाहिए..
पहले गाद निकालने की बात होनी चाहिए थी।बागमती नदी लगातार गाद से भरता जा रहा है।अगर दो बराज बनता है तो रून्नीसैदपुर से रूसुलपुर बैरगनिया भारत-नेपाल सीमा तक दोनो तटबंध के बीच सीतामढी तथा शिवहर जिला के हजारों एकड खेतों में जलजमाव तथा गाद भरने से कोशी के बीरपुर बराज की तरह पूरा खेत खडाब हो जायेगा।इसलिए सरकार को बराज बनाने के वजाए नदियों को अविरल बहने देना चाहिए जिससे गाद स्वंय बहता रहेगा।सरकार को बागमती का उपजाऊ पानी किसानो के खेत तक पहुंचाने के लिए तटबंध में जहां गांव नही है तटबंध में लचका बनाकर या बडा-बडा स्लूईश गेट बनाकर बाढ का पानी खेतों को देना चाहिए।बागमती का पानी जबतक खेत को मिलता था इस क्षेत्र के किसानो को उर्वरकों की जरूरत नही होती थी। नदी से पानी निकलने से खेत भी उपजाऊ बनेगा दूसरी ओर तटबंध पर पानी का दबाव घटने से तटबंध टूटने का खतरा भी घटेगा..

सरकार अगर बराज निर्माण पर दृढ प्रतिज्ञ होती है तो उसे आमजन के विरोध का सामना करना पडेगा क्योंकि सुनने मे बराज आकर्षक तथा लाभदायक भले हीं दिखता हो परन्तु परिणाम भयावह हीं होगा जैसा कि बिहार के अन्य बराजों में देखा जा रहा है जहां खेतो की बर्बादी तथा आमजन के गाढी कमाई की लूट हुई है..

NEWSANP के लिए बिहार से ब्यूरो रिपोर्ट


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