एक पत्रकार की हत्या पर इतनी ख़ामोशी क्यों है?

एक पत्रकार की हत्या पर इतनी ख़ामोशी क्यों है?

रांची(RANCHI): कलम की ताकत के सामने बंदुके बौनी हो जाती हैं. इसकी धार के सामने तलवार की धार भोथरी हो जाती हैं. इसकी लिखावट से सत्ता बदल और हिल जाती है. इसके तेवर के सामने झूठ बेपर्दा हो जाता है, काल कोठरी में पाला -पोसा जा रहा भ्रष्टाचार का दीमक भी मर जाता है.इतिहास और आजदी की लड़ाई इसकी गवाह हैं कि एक पत्रकार, कवि और साहित्यकार की क्या भूमिका रही हैं?.कलम के इन सिपाहियों की जान हर वक्त जोखिम में ही हैं. इसलिए तो उनकी आवाज बंद करने की साजिश रची-बुनी जाती हैं.लेकिन, कलम के सिपाही की ये कुर्बानियां क्रांतियां ही पैदा की है. उस सत्ता, सियासत, दलालों, भ्रष्टाचारों और तिमारदारों के खिलाफ.

छत्तीसगढ़ के दिलेर, ईमानदार और जुझारु पत्रकार मुकेश चंद्राकर की निर्मम हत्या कर दी गई. उनकी लाश एक ठेकेदार के चबूतरे में बने सेप्टीक टैंक से बरामद हुई.बताया जाता हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ रिपोर्ट लिखने की कीमत जान देकर इस नौजवान को चुकानी पड़ी. इस 28 साल के लड़के ने तो जिंदगी जिया ही नहीं बल्कि अकाल मौत उनके दामन में आई. ये जिंदगी उसकी थी, जिसे जबरन छीना गया. उनके असमय मौत ने एक सवाल तो छोड़ा ही साथ ही इस वयवस्था और तंत्र पर गहरे निशान और तमाचा जड़ दिया.जो मनमानी करना चाहते हैं.

इस पत्रकार की कलम इतनी भारी पड़ी की बिचौलिए और तंत्र के तिमारदारों पर ऐसा प्रहार किया की उनकी जान लेने पर आमादा हो गए. और जान ले भी लिया, सोचिये कितना मन बढ़ा हुआ था.सवाल हैं इन भ्रष्टाचारियो के खिलाफ आवाज कौन उठयेगा? क्या हमारी वयवस्था में बैठे मुलाजिम -मुन्तज़िम अपना काम सही से कर रहें हैं? अगर करते तो पत्रकार मुकेश चंद्राकर को 120 करोड़ के सड़क घोटाले को क्यों उठाना और उजागर करना पड़ता .?बात गौर फरमाने कि हैं लोकतंत्र के चौथे खम्बा यानि पत्रकार ही हैं जो एक कड़ी और आइना का काम करते हैं. अगर ये न रहें तो सियासतदानों और हकीमो की करगुजारियां सामने नहीं आती.इनके चेहरे पर पेबंद मुखौटे और गठजोड़ सामने नहीं आती .

मुकेश ही थे की नक्सलियों के चंगुल से CRPF जवानों को छुड़ाने में अहम रोल अदा किया था. उन्होंने ने एक कड़ी की तरह काम किया और देश के उन जवानों की हिफाज़त की.याद रहें की पत्रकार कोई सरकारी मुलाजिम नहीं होते हैं. आज भी दूर -दराज में काम कर रहें ज्यादातर पत्रकारों की दायनीए स्थिति ही हैं. इसके बावजूद समाज के प्रहरी की भूमिका निभा रहें हैं. एक पत्रकार के पास सिवाय कलम और उसकी लेखनी के सिवा कुछ नहीं होता. वह अकेला रहता हैं हर जगह और इस वयवस्था से टकराता और चुनौती देता हैं.

उससे सवाल करता है.अगर इन बड़े -बड़े और ओहदेदारों को डर कहीं न कहीं हैं तो इस पत्रकार के चलते ही हैं.न तो ये क्या से क्या न कर दें!इसलिए इनके आँखों की किरकिरी पत्रकार बनते आए है.बस्तर के बहदुर पत्रकार मुकेश चंद्राकर को सलाम हैं, जिन्होंने इस छोटी सी जिंदगी में दिलेरी से जिया और सर उठा कर आखरी सांस ली.ये वक्त चुप रहने का नहीं बल्कि खड़ा होने का है और मुकेश चंद्रकार को इंसाफ दिलाने का है.

NEWSANP के लिये शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट

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