सीता, गीता और मीरा ने किया निराश और भाजपा का परिवारवाद भी नहीं चला!, पढ़िए बीजेपी के हार के इस पन्ने को…

सीता, गीता और मीरा ने किया निराश और भाजपा का परिवारवाद भी नहीं चला!, पढ़िए बीजेपी के हार के इस पन्ने को…

रांची(RANCHI): सियासत के भीतर की धुंध को झांकना मुश्किल है. यहां सत्ता की ख्वाहिश में सबकुछ ताक पर रह जाता है, विचारधारा चौरहे पर नजर आती है और अवसरवाद अपनी रंग बिखेरता है.दरअसल, हकीकत में कहे तो यही सियासत हैं.जो गड़बड़ और दिक्क़त पैदा करती हैं.

झारखण्ड विधानसभा में कांग्रेस और जेएमएम से आए नेता अपनी तकदीर या कहे पॉलटिकल करियर संवराने आए थे, लेकिन उनके मन के मुताबिक तो नहीं हुआ.
शिबू सोरेन की बड़ी पुत्र वधू सीता सोरेन जेएमएम छोड़कर भाजपा में आई, अपने परिवार के दिए दर्द और अनदेखी को साझा किया. लेकिन, जनता के मन में ये जगह नहीं बना सकी. पहले दुमका से लोकसभा चुनाव हारी और अब जामताड़ा से विधानसभा चुनाव में भी शिकास्त खा गई.
इधर, पूर्व सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की वाइफ गीता कोड़ा कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामी . लेकिन, उनकी ख्वाहिशे फरेबी ही साबित हुई. पहले चाईबासा से लोकसभा और फिर जगरनाथपुर से विधानसभा चुनाव भी हार गई, जबकि गीता कोड़ा एक कद्दावर नेत्री अपने इलाके की मानी जाती हैं .

भाजपा का परिवारवाद वाला दाव भी इस चुनाव में नहीं चला. पूर्व मुख्यमंत्री और अभी भाजपा में शामिल हुए चंपाई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन बड़ी उम्मीद से पहली -पहली बार विधानसभा चुनाव घाटशिला से लड़े थे, लेकिन उनकी मुराद धाराशाई हो गई और पटखनी खा गए.
यही हाल तीन बार के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा मुंडा का रहा. पोटका विधानसभा से उन्हें करारी शिकास्त देखनी पड़ी.
हालांकि, भाजपा के लिए खुशनुमा बात ये रही कि पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास की पुत्र वधू पूर्णिमा दास जमशेदपुर पूर्वी से चुनाव जीतकर बड़ी राहत दी.
देखा जाए भाजपा ने जिन नेताओं के परिवार वाले को टिकट दिया. उनके जीत का स्ट्राइक रेट अच्छा नहीं रहा यानि जनता ने उन्हें सिरे से नकार दिया. जबकि भाजपा परिवारवाद का मसला लेकर मुद्दा और हल्ला मचाते रही है.
झारखण्ड में भाजपा के हार के कई पन्ने हैं, जिसमे शायद ये भी एक था. भारतीय जनता पार्टी को अगर समझिए तो ये एक ऐसी पार्टी हैं. जहां कोई फैसले बेहद ही सामूहिक और सोच समझ के लिए जाते हैं, पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र मजबूत दिखलाई पड़ता रहा हैं. उदाहरण के तौर पर लोकसभा चुनाव से पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनाव को लीजिये. इन तीनों प्रदेश के मुख्यमंत्री बदल दिए गए. बड़े नामों को किनारा करके नये और ऊर्जावान चेहरे को मौका दिया.
सवाल ये हैं झारखण्ड में भाजपा क्यों चूक जा रही. नेता भी उनके पास बड़े हैं और एक जनसमर्थन भी दिखलाई पड़ता.बावजूद जीत एक सपना दिखलाई पड़ रही है.

आप माने या न माने झारखण्ड भाजपा में कुछ न कुछ आपसी गड़बड़, कलह और किचकिच तो थी. आप देखिए असम के मुख्यमंत्री हेमंता विश्वा शर्मा के इर्द -गिर्द ही चुनाव आख़री लम्हों में घूमता-फिरता रह गया. जबकि, झारखण्ड की जमीनी हकीकत को वो नहीं जानते. जितना बाबूलाल मरांडी , चंपाई सोरेन और अर्जुन मुंडा जानते हैं.

इस चुनाव में भाजपा के हार के पन्ने में कही न कही ये चिज़े शामिल थी. जो इस करारी हारगाथा में कही न कही दिखलाई पड़ती हैं.

NEWSANP के लिए रांची से शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *