धनबाद(DHANBAD): मातृ पूजा और शक्ति आराधना के महापर्व नवरात्रि के छठे दिन जगतजननी मा दुर्गा के छठे स्वरूप देवी कात्यायनी की उपासना का विधान है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, दुर्गा पूजा की षष्ठी तिथि को मां कात्यायनी की पूजा करने से भक्तों और साधकों को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, शारीरिक-मानसिक कष्ट दूर होते हैं, घर-परिवार के रोग-शोक दूर होते हैं और सुख-समृद्धि में सदैव बढ़ोतरी होती है।
आज मंगलवार 8 अक्टूबर, 2024 को नवरात्रि की षष्ठी तिथि है। आज दिन मां दुर्गा के षष्ठम स्वरूप देवी कात्यायनी की पूरे विधि-विधान और धूमधाम से पूजा हो रही है। आइए जानते हैं, मां दुर्गा के यह छठा दिया स्वरूप कैसा है और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई? साथ ही जानेंगे कि उनका उपासना मंत्र, आरती, प्रिय रंग और भोग क्या है?
षष्ठी तिथि-
षष्ठी तिथि आरंभ: 8 अक्तूबर, मंगलवार प्रातः 11:17 पर
षष्ठी तिथि समाप्त: 9 अक्तूबर, बुधवार दोपहर12:14 पर

मां कात्यायनी का स्वरूप
मां दुर्गा का कात्यायनी स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है । वे ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। मां सिंह पर सवार हैं और इनकी चार भुजाएं हैं, इनमें से दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है वहीं नीचे वाला हाथ वरमुद्रा में है। जबकि, बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प है। ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह का सम्बन्ध इनसे माना जाता है।
मां कात्यायनी की पूजा विधि
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा करने के लिए सुबह उठकर स्नान करने के बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करें. इसके बाद कलश की पूजा करने के बाद हाथ में पुष्प लेकर मां दुर्गा और मां कात्यायनी की ध्यान कर पुष्प मां के चरणों में अर्पित करें. इसके बाद माता को अक्षत, कुमकुम, पुष्प और सोलह श्रृंगार अर्पित करें. उसके बाद मां कात्यायनी को उनका प्रिय भोग शहद, मिठाई अर्पित करें. मां को जल अर्पित कर दुर्गा चलिसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें.

मां कात्यायनी भोग
मां कात्यायनी को शहद या मीठे पान का भोग लगाना बेहद शुभ माना गया है। माना जाता है कि इससे व्यक्ति को किसी प्रकार का भय नहीं सताता।

प्रिय फूल और रंग
देवी कात्यायनी का प्रिय रंग लाल है। पूजा में आप मां कात्यायनी को लाल रंग के गुलाब या गुड़हल का फूल अर्पित करें इससे मां कात्यायनी प्रसन्न होंगी।
मां कात्यायनी की कथा
प्राचीन काल में कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में महर्षि कात्यायन पैदा हुए थे। उन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी शक्ति-स्वरूपा मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और उन्होंने महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप जन्म लिया और कात्यायनी कहलाईं। समय के साथ महिषासुर दानव का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ता ही गया. तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों देवों ने अपने-अपने तेज का दिव्या अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। कहते हैं कि सबसे पहले महर्षि कात्यायन ने इनकी पूजा की थी, इसलिए वे मां कात्यायनी के रूप में पूजी जाती हैं।
मां कात्यायनी उपासना मंत्र
1. चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।
2. या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
3. मां कात्यायनी का वंदना मंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः
मां कात्यायनी की आरती (Maa Katyayni Aarti)
जय जय अम्बे जय कात्यायनी।
जय जग माता जग की महारानी॥
बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहावर दाती नाम पुकारा॥
कई नाम है कई धाम है। यह स्थान भी तो सुखधाम है॥
हर मन्दिर में ज्योत तुम्हारी। कही योगेश्वरी महिमा न्यारी॥
हर जगह उत्सव होते रहते। हर मन्दिर में भगत है कहते॥
कत्यानी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की॥
झूठे मोह से छुडाने वाली। अपना नाम जपाने वाली॥
बृहस्पतिवार को पूजा करिए। ध्यान कात्यानी का धरिये॥
हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी॥
जो भी माँ को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे॥
NEWSANP के लिए धनबाद से रागिनी पाण्डेय की रिपोर्ट

