दिल्ली(NEW DELHI): यह शुभ नहीं है। यह नहीं होना चाहिए। मैं मानता हूं कि मंत्री होने या नहीं होने से किसी जाति – समाज के विकास पर प्रभाव नहीं पड़ता है। पड़ता भी होगा, तो न्यूनतम। पर यह मानता हूं कि इससे मानसिक दशा पर प्रभाव पड़ता है। मोरल टाइट है, नहीं है। सामाजिक होने न होने। लोकतंत्र – समाज का हिस्सा होने न होने के एहसास प्रभावित होते हैं। न्यूनतम ही सही।
मोदी ने अल्पसंख्यक समाज से पांच मंत्री बनाए। तीन सिख, दो ईसाई। पर मुस्लिम एक भी नहीं। एक प्रतिशत- दो प्रतिशत आबादी को जगह दी। अच्छी जगह दी। अच्छा किया। पर चौदह प्रतिशत को भूल गए। यह शुभ नहीं है।
यह वही देश है, जहां राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, गृह मंत्री, शिक्षा मंत्री, अनेक मुख्यमंत्री तक मुस्लिम रहे हैं। आज सन्नाटा है। उत्तर प्रदेश में एक। वह भी राज्य मंत्री। मध्य प्रदेश, राजस्थान शून्य। बिहार एक। ———- लंबी सूची है। क्या-क्या गिनाऊं?
यह सही है कि मुस्लिम बीजेपी को वोट नहीं करते। सर्वे वाले बताते हैं कि दो से तीन प्रतिशत। यानी वहां शून्य नहीं है। आपकी जो नीतियां हैं, शब्दावली है, उसमें कोई वोट करें भी तो कैसे? हम उन्हें दोषी ठहराएं भी तो कैसे?
यह सही है कि आप मिथक तोड़ रहे हैं। देश में मुसलमानों के बगैर सरकार नहीं बन सकती, आपने बना ली। उत्तर प्रदेश में नहीं बन सकती, आपने बना ली । लगातार तीसरी-दूसरी बार। बंगाल – केरल में नहीं बन सकती, आपका प्रयास जारी हैं। संभव है आप बना भी लें। इसलिए कि ईसाई अब आपके हो चले हैं। पर आप जो कर रहे हैं, उससे दिल टूटता है।
अगर आप पाकिस्तान, बांग्ला देश की राह पर हैं, तो अलग बात है। पर सवाल तो है कि क्या इन देशों का रास्ता सही है? क्या वे विकसित देश तो दूर, विकसित देश की राह पर भी हैं? नहीं, वहां गरीबी, ज़हालत, अराजकता है। अगर आप गुरू गोलवलकर की तरह हिंदू – मुसलमान को दो संस्कृति मानते हैं, उनके बीच टकराव स्वाभाविक मानते हैं, तब भी सवाल तो है कि क्या वे इसी माटी के नहीं हैं ?
उनके पूर्वज पाकिस्तान नहीं गए, तो यही सोचा होगा न कि यह मेरी माटी है ! नाम नहीं लूंगा। पर कहानी सुनिए – तब एक अखबार में रिपोर्टर था-राजनीतिक संवाददाता। बीजेपी-संघ कवर करता था। उस अखबार के पुस्तकालय में एक मुस्लिम नौजवान था। आडवाणी जी राम रथ यात्रा पर थे। उस रात ग्यारह बजे पुस्तकालय में हम दोनों थे। वह मेरे पास आया। आडवाणी जी पर बात की। तर्क किए। फिर देर तक रोया। कहा-मेरे पुरखे पाकिस्तान नहीं गए। अड़ोस-पड़ोस के अनेक लोग गए। पुरखे कहते रहे कि यह जमीन मेरी है। मैं अपनी माटी कैसे छोड़ दूं? और आडवाणी क्या कह रहे हैं ? निचोड़ तो यही है न कि हम देशद्रोही हैं, रामद्रोही हैं ? मेरी एक बीवी है, एक ही बच्चा है। जिनके चार बीवी, सोलह बच्चे होंगे, वैसे कितने होंगे? और होंगे तो क्यों? अशिक्षा और ग़रीबी। मजहब नहीं है वहां। वह देर तक रोता रहा। मैं सुनता – समझाता रहा। और क्या करता? कहा – यह धुआं है, देर तक नहीं रहेगा। अब लगता है, यह धुआं स्थायी है।
यही कहूंगा कि दिल टूटता है, तो आवाज नहीं होती। पर दिल के साथ बहुत कुछ टूटता है। फितरत, मिजाज—–कौन राष्ट्रवादी, कौन नहीं? शहनवाज हुसैन तो राष्ट्रवादी हैं। उन्हें ही रख लेते हैं ? रख लो। क्या कमी है उनमें?
सजग नागरिक की हैसियत से कहता हूं -किसी का दिल न तोड़ों। घर टूटे, नया बन जाएगा। गाड़ी टूटे, मरम्मत हो जाएगी। नई भी आ सकती है। पर टूटे दिल को जोड़ने वाला कोई जोड़क (फेवीकोल, फेवीक्विक) अब तक नहीं बना। हमने प्रेमचंद, रेणुजी की कहानियां पढ़ी है। दिल टूटता है, तो जुड़ता नहीं है। फिर डर भी खत्म हो जाता है। लापरवाह, बेचैन आत्मा। नाम याद नहीं, जिस कहानी में सिरचन है, वह पढ़ना। रेणुजी की कहानी है। जरूर पढ़ना। शायद आपकी सोच बदलें।
सांकेतिक ही सही, जो राष्ट्रवादी आपको लगे, वही सही। चुन लो।
और हां, बदलाव जरूरी है। दोनों बदलें। जिद अच्छी बात नहीं। आप पुरानी परंपराओं से निकलो। कोई परंपरा स्थायी नहीं होती। समय – काल के अनुसार नियम-परंपरा बनते-बिगड़ते – बदलते हैं। ये जो उपदेशक-मौलाना कहते हैं न कि होली-दीपावाली की बधाई देना धर्म विरूद्ध है, उन्हें जूते मारो। नहीं मार सकते, तो बहिष्कार करो। अपने धंधे के लिए आग पर धी यही लोग डालते हैं। आगे बढ़कर कहूंगा – कोई किताब आसमानी नहीं होती। कोई वाल्मीकि, कोई वेदव्यास, कोई तुलसीदास ही रचते हैं। रामचरित मानस की आधुनिक संदर्भ में खूब व्याख्या हुई है। नए संदर्भ में प्रभु राम को उकेरा गया, अनेक लेखकों-कथाकारों ने उकेरा। किसी ने विरोध नहीं किया। बावजूद इसके राम वही हैं। कहां बदले? पहले से ज्यादा जनप्रिय। ——-।
आप भी ढूंढ़ लो – अब्दुल हमीद, उस्मान अंसारी, अब्दुल कलाम मिल जाएंगे। मिल ही जाएंगे। बस चश्मे का नंबर देख-दिखवा लेना। हमीद, उस्मान, कलाम के भी राष्ट्रवादी होने पर शक हो, तो बात अलग है। पर याद रखना कलाम साहब को राष्ट्रपति आपने ही बनाया था।
मजहब से पहले मुल्क, यह याद रखना। पार्टी से पहले माटी, यह भी याद रखना। मेरी माटी, मेरा देश। हम हिंदुस्तानी। सारे जहां से अच्छा, हिंदुस्तां हमारा—
सोशल मीडिया साभार… संतोष मानव,वरिष्ठ पत्रकार