
जामताड़ा (JAMTADA):आज सम्पूर्ण भारतवर्ष में परशुराम जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। ब्रह्मक्षत्र स्वरूप भगवान परशुराम को भारतीय संस्कृति में न्याय, शौर्य और धर्म रक्षण के प्रतीक रूप में स्मरण किया जाता है। इसी क्रम में झारखंड के जामताड़ा जिले के मिहिजाम चित्तरंजन स्टेशन रोड स्थित शिवालय परिसर में भव्य आयोजन हुआ, जिसमें भगवान परशुराम की पूजा-अर्चना, वैदिक मंत्रोच्चार, विचार गोष्ठी और राष्ट्रीय विषयों पर उद्बोधन प्रमुख रूप से सम्मिलित रहे।
तीर्थ पुरोहित आचार्य सुरेन्द्र नाथ तिवारी का मार्गदर्शन
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक विधि से तीर्थ पुरोहित आचार्य सुरेन्द्र नाथ तिवारी के नेतृत्व में हुआ। उन्होंने परशुराम के जीवन से जुड़ी गाथाओं को उद्धृत करते हुए कहा कि वे मात्र एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं बल्कि भारतीय सनातन चेतना के प्रतिनिधि हैं। आचार्य तिवारी ने भगवान परशुराम को “संघर्षशील तपस्वी” बताया जिन्होंने अन्याय के विरुद्ध तलवार और तप दोनों का संतुलित प्रयोग किया।
उन्होंने कहा—
“परशुराम केवल क्षत्रियों के वध तक सीमित नहीं थे, उन्होंने समाज में अन्याय, दंभ और अहंकार के विरुद्ध प्रतिरोध की संस्कृति स्थापित की। आज भारत में हमें फिर उसी परशुरामी संकल्प की आवश्यकता है—न्यायपूर्ण राष्ट्र निर्माण के लिए।”
निखिलेश्वर भगवान के शिष्यों का उद्बोधन: पाकिस्तान को चेतावनी
कार्यक्रम में विशेष आकर्षण का केंद्र रहे निखिलेश्वर भगवान के शिष्यगण, जिन्होंने परशुराम की कर्मभूमि को वर्तमान भारत के भू-राजनीतिक संदर्भ से जोड़ते हुए पाकिस्तान द्वारा भारत की सीमाओं पर फैलाए जा रहे आतंकवाद, घुसपैठ और जल संसाधनों पर हो रहे विवादों का प्रखर उल्लेख किया।
उनके वक्तव्यों का प्रमुख बिंदु यह रहा कि—
“आज का भारत यदि भगवान परशुराम की परंपरा में स्वयं को जागृत करे, तो किसी भी पाकिस्तान या अन्य बाह्य शत्रु की मजाल नहीं कि हमारी एकता और अखंडता को चुनौती दे सके।”
उन्होंने परशुराम को ‘राष्ट्रीय स्वाभिमान’ का प्रतीक बताया और कहा कि भारत को अब संयम से अधिक साहस और निर्णायकता का परिचय देना चाहिए। “पाकिस्तान ने यदि अपनी हरकतें नहीं रोकीं, तो परशुरामी चेतना के वाहक भारतवासियों को उसे उसी की भाषा में जवाब देना होगा।”
समकालीन संदर्भों में परशुराम की प्रासंगिकता
परशुराम की गाथा, उनकी दृढ़ता और न्यायप्रियता को आधुनिक भारत के संदर्भ में जोड़ते हुए वक्ताओं ने कहा कि—
- सामाजिक न्याय का प्रतीक — उन्होंने जातिगत विषमता को तोड़ा। एक ब्राह्मण होते हुए भी उन्होंने क्षत्रिय धर्म निभाया, जो सामाजिक समरसता का संदेश है।
- सैन्य बल और तप का संतुलन — आज जब भारत की सीमाएं अस्थिर हैं, तो परशुराम जैसे संत-योद्धा के आदर्श आवश्यक हो जाते हैं।
- राष्ट्र की रक्षा सर्वोपरि — देशभक्ति उनके आचरण में अंतर्निहित थी। यही कारण है कि वे हर बार अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए।
कार्यक्रम की अन्य झलकियाँ
- वैदिक अनुष्ठान: सुबह से आरंभ हुए यज्ञ, मंत्रजाप और हवन के साथ शिवालय परिसर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ।
- सांस्कृतिक कार्यक्रम: स्थानीय विद्यालयों के छात्रों द्वारा परशुराम पर आधारित नाट्य प्रस्तुति और भजन ने कार्यक्रम को प्रभावशाली बनाया।
- राष्ट्रीय विषयों पर संवाद: वक्ताओं ने भारत की जल नीति, सीमाओं की सुरक्षा, आतंकवाद पर कठोर रुख और आत्मनिर्भरता पर भी चर्चा की।
जनजागरण की दिशा में परशुराम जयंती का महत्व
कार्यक्रम के अंत में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि परशुराम जयंती केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजागरण और राष्ट्रनिष्ठा का पर्व बनना चाहिए। इसके माध्यम से युवा पीढ़ी में शौर्य, अनुशासन और धर्म के प्रति आदर जागृत किया जा सकता है।

कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह ने भारत के दुश्मनों को सख्त संदेश देने की माँग का समर्थन किया। प्रस्ताव पारित हुआ कि—
“भारत सरकार आतंकवाद और सीमाई अतिक्रमण के प्रति और अधिक कठोर नीति अपनाए और यदि आवश्यकता हो तो कूटनीति की बजाय निर्णायक कार्रवाई करे।”
निष्कर्ष: परशुराम चेतना की पुनर्स्थापना आवश्यक
भारत जैसे राष्ट्र की रक्षा केवल सैन्य शक्ति से नहीं, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना से भी होती है। भगवान परशुराम उस संतुलन का प्रतीक हैं—जो एक ओर ब्रह्मतेज रखते हैं तो दूसरी ओर क्षात्रबल भी। मिहिजाम के शिवालय परिसर से उठी यह स्वर–लहरि न केवल एक धार्मिक आयोजन का हिस्सा थी, बल्कि भारत की राष्ट्रचेतना का उद्घोष थी।
आज जब हमारी सीमाएं असुरक्षित हैं, जब हमारे जल संसाधनों पर विवाद हैं, जब आतंकवाद की छाया अभी भी हमारे आंतरिक संतुलन को चुनौती देती है—ऐसे समय में परशुराम का स्मरण केवल अर्चना नहीं, एक आह्वान है। यह आह्वान है जागने का, संगठित होने का और राष्ट्ररक्षा को सर्वोपरि मानने का।

NEWSANP के लिए जामताड़ा से आर पी सिंह की रिपोर्ट

