शहीद कामरेड गुरुदास चटर्जी शहादत दिवस 14 अप्रैल पर विशेष…

शहीद कामरेड गुरुदास चटर्जी शहादत दिवस 14 अप्रैल पर विशेष…

धनबाद(DHANBAD):गुरुदास चटर्जी का जन्म एक जमींदार परिवार में 20 मार्च 1950 को हुआ था हालांकि स्वर्गीय गुरुदास चटर्जी के रिश्तेदार सुशांतो मुखर्जी का कहना है.गुरुदास का मूल पैतृक निवास रांची के राहे प्रखंड के राहे गांव में था.उनके पूर्वज चारपेटिया पुरुलिया जिला ननिहाल में जाकर बस गए थे
पिता का नाम था राधिका नाथ चटर्जी उनके बड़े रामदास चटर्जी ई सी एल मुगमा एरिया में नौकरी करते थे.

ऐसे तो छात्र जीवन से ही गुरदास चटर्जी का तेवर एक विद्रोही के रूप में था.मैट्रिक पास करने के बाद बड़े भाई के साथ निरसा आ गए उस समय कोलियारियों का राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ था.निजी कंपनी के लायकडीह सेलेक्टेड खदान में बतौर जेनरल मजदूर काम करने लगे
बहुत दिन काम करने के बाद जैसे ही राष्ट्रीयकरण हुआ ई सी एल मुगमा एरिया ऑफिस में वह बतौर कलर्क कार्यरत रहे.बाद में राजपुरा कोलियरी में स्थानांतरण क्लर्क के रूप में ही हुआ.इसी दौरान इंडियन पीपुल्स फ्रंट (IPF) बना जो बाद में जाकर भाकपा माले बना
तत्कालीन महासचिव विनोद मिश्र जब भूमिगत थे तो उस समय गुरुदास चटर्जी के आवास में आकर रहते थे इससे उनकी निकटता बढ़ी.विनोद मिश्र से ही उन्हें वामपंथ की शिक्षा मिली एक जुझारू व्यक्तित्व के रूप में अपनी पहचान बनाना शुरू किया.

उस दौरान एके राय के पक्का सहयोगी रहे कृपाशंकर चटर्जी निरसा के मासस से विधायक हुआ करते थे एके राय के नेतृत्व वाली सीटू से संबध बिहार कोलियरी कामगार यूनियन का एक लड़ाकू यूनियन के रूप में मजदूरों के बीच पहचान बन चुकी थी
मजदूरों के बीच सूदखोरों का आतंक था
सूदखोर ,प्रबंधन ,यूनियन नेता का गठबंधन हुआ करता था
उससे मुक्ति के लिए बिहार कोलियरी कामगार यूनियन ने कई संघर्ष किया तो ई सी एल के ग्रामीण क्षेत्र के मजदूर जुड़ते गए उन्हें हक भी यूनियन दिलाती रही
मजदूरों को हक दिलाने के बिहार कोलियरी कामगार यूनियन से जुड़े नेता के रूप में गुरुदास चटर्जी की पहचान होने लगी.क्योंकि अधिकतर मजदूर गांव के ही थे.गुरुदास चटर्जी एके राय के ईमानदारी और व्यक्तित्व से काफी प्रभावित थे.जुझारू व्यक्तित्व के कारण लोगों में बहुत जल्द लोकप्रिय भी होने लगे.1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर में एके राय वर्ष 1984 का लोकसभा चुनाव हार गए कांग्रेस का वोलवाला चढ़ने लगा.उसके बाद 1985 में बिहार विधानसभा का चुनाव आया निरसा क्षेत्र से एके राय के बाद सबसे दिग्गज नेता हुआ करते थे केएस चटर्जी
लेकिन उन्होंने 1985 के चुनाव के समय पार्टी बदल ली
बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र व तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी से केएस चटर्जी की निकटता बढ़ी वह कांग्रेस में चले गए.
फल यह हुआ कि 1985 में केएस चटर्जी कांग्रेस से निरसा से विधायक चुने गए.बाम दलों के संयुक्त उम्मीदवार एस के बख्शी को हार का सामना करना पड़ा.केएस चटर्जी ने केवल चुनाव में जीत हासिल नहीं की बल्कि मासस और बीसीकेयू के तमाम कार्यकर्ताओं को भी साथ ले गए।मासस के समक्ष संकट की स्थिति आ गई
इस समय निरसा में डॉक्टर रहमतुल्लाह ,मास्टर आगम राम की जोड़ी फिर से पार्टी को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई।इस दौरान 1990 में फिर बिहार विधानसभा का चुनाव आया तब के समानांतर नेता मास्टर आगम राम, डॉक्टर रहमतुल्ला ,दिलीप मंडल, तारापद् धीबर आदि कई थे जो गुरुदास के समकक्ष थे।पार्टी के समक्ष परेशानी खड़ी हो गई कि आखिर टिकट किसे दिया जाए।लगभग सभी ने दावा पेश किया लेकिन सर्वसम्मति से गुरुदास चटर्जी को मासस ने टिकट दिया
जिसमें गुरुदास चटर्जी को जीत मिली और यही नहीं लगातार तीन बार निरसा का प्रतिनिधित्व किया
निरसा में खोई प्रतिष्ठा तो पाया ही आंदोलन को बढ़ाने वाला एक संघर्षशील साथी भी पार्टी को मिला
इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा
गरीबों के सामने एक हितैषी नेता के रूप में उभर कर सामने आए।एके राय के बाद सबसे तेज तर्रार नेता के रूप में अपनी छाप बनाई।उस समय बिहार में लालू यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा बाम मोर्चा की सरकार बनी झारखंड मुक्ति मोर्चा समेत मासस ने सामाजिक न्याय के सवाल पर लालू यादव को समर्थन किया था।

लालू से उनकी काफी निकटता बढ़ी
लालू यादव के सबसे नजदीकी नेता के रूप में लोग जानने लगे लालू यादव ने बिहार सरकार में मंत्री बनने का ऑफर दिया।लेकिन एके राय ,आनंद महतो जैसे सैद्धांतिक नेताओं के संसर्ग के कारण उन्होंने मंत्री बनने से इनकार कर दिया
वह कहते थे कि मंत्री बन जाने से उनका सर्वहारा वर्ग या उत्पादक वर्ग के लोगों से संपर्क टूट जाएगा
गरीबों से जो सीधा लगाब है वह नहीं रह पाएगा
इसकी हानि संगठन को होगी भले ही उनका व्यक्तिगत विकास हो जाएगा।
दरअसल जमींदार परिवार में जन्म लेने के बाद भी उनका लगाव जमींदारी के खिलाफ हुए संघर्ष में शामिल लोगों के साथ रहा।जहां तक कि उन्हें जो जमीन अपने बंटवारे में मिली थी उसे उस गांव के गरीबों में बांट दिया था, कहते थे
जो खुद खेती नहीं करते उन्हें जमीन रखने का हक नहीं है उसके बाद वह कोयलांचल में छा गए।
हर समय सुर्खियों में रहने लगे ,जन गोलबंदी की राजनीति करने के कारण निरसा से इतर इन्होंने अपनी पहचान बनाई
बोकारो, धनबाद ,चंदन कियारी, गिरिडीह, बाघमारा ,सिंदरी सभी जगह एक क्रांतिकारी नेता के रूप में लोग जानने लगे
इसके कारण गांव के शोषित पीड़ित व शहरी क्षेत्र के श्रमिकों के बीच में काफी लोकप्रिय होने लगे
जीटी रोड के किनारे चिरकुंडा से लेकर राजगंज तक जितनी भी औद्योगिक कइयां रही सभी मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी, पीएफ ,ईएसआई का लाभ दिलाने के संघर्ष में खुद को समाहित कर लिया
इसके कारण शहर के पूंजीपत्तियों का गांव के जमींदारों के अलावा प्रतिक्रियावादी ताकतों की आंखों की वह किरकिरी भी बनने लगे

समाजमुखी राजनीति करने के कारण कभी व्यक्तिमुखी नहीं हुए
ना घर बनाया और न जमीन खरीदी न सुरक्षा गार्ड रखा और नहीं दिखावा के लिए मंडली साथ लेकर चलते
खुद अपनी बुलेट चला कर घटनास्थल हो या सभा स्थल पहुंच जाते और लोगों की वाह वाही लूट कर मैदान मार लेते

उस समय मोबाइल का भी जमाना नहीं था
निरसा कोयलांचल की काली धरती में खुद को बेदाग रखा यही उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी
अलग राज्य के हिमायती बेसहारों का सहारा के रूप में लोग उन्हें जानने लगे
सुबह 6:00 से उनके दरवाजे पर लोगों की भीड़ लगती थी लगता था कि यह सरकारी दफ्तर है
वह भी निःसंकोच बिना आलस किए लोगों की बात सुनते और अधिकारियों से संपर्क कर पीड़ितों को हक दिलवाते यह उनके दिनचर्या में शामिल हो गया था
हालात इस कदर हो गई थी कि निरसा विधानसभा क्षेत्र में किसी भी थाना में बिना गुरुदास चटर्जी से परामर्श किए पुलिस अधिकारी प्राथमिकी तक दर्ज नहीं करते
यदि कर भी देते तो मुकदमों को कोर्ट तक नहीं भेजते
इस मामले में उनके दखलअंदाजी होती रही भले ही पुलिस के नजर में यह परेशानी भरा काम था
लेकिन जनता की नजर वह मसीहा के रूप में उभर चुके थे
वह स्वयं थाना ,प्रखंड कार्यालय हो या समाहरणालय पीड़ित को लेकर जाते और सामने बैठकर अधिकारी के समक्ष रूबरू कराते
गुरुदास चटर्जी जैसे लोकप्रिय विधायक की हत्या के बाद लगा निरसा में मासस एक बार फिर उखड़ जाएगी
लेकिन

जीवित गुरदास से मृत गुरदास अधिक ताकतवर साबित हुए

उनके बाद कोलकाता में एमवीए की पढ़ाई कर रहे अरूप चटर्जी को मासस ने टिकट दिया
लोगों ने गुरुदास की शहादत का मान वोट के रूप में दिया
गुरुदास अंतिम बार मामूली अंतर से जीते थे
लेकिन उनकी हत्या के बाद उनके बेटे
अरूप ने काफी अंतर से चुनाव में जीत हासिल की निरसा के मतदाताओं ने अरूप को नहीं बल्कि गुरुदास के बेटे को भारी मतों से जीत दिलाई।
आज भी अरूप चटर्जी वहां जीतते ,हारते रहे हैं
अभी भी 4थी बार विधायक हैं।
लेकिन जो मत उन्हें मिलता है उसमें काफी संख्या में वैसे वोट भी शामिल रहते हैं जो बतौर गुरुदास पुत्र के रूप में उन्हें मिलते हैं।निरसा के गांव गांव में आज भी गुरुदास की गूंज विद्यमान है

हर साल 14 अप्रैल को निरसा के अलावा धनबाद झारखंड के विभिन्न जिले और गांव कस्बों में शहादत दिवस पर शानदार श्रद्धांजलि सभा की जाती है
हजारों की भीड़ अभी भी अपने प्रिय नेता को क्रांतिकारी सलाम पेश करने आते हैं

NEWSANP के लिए धनबाद से कुंवर अभिषेक सिंह की रिपोर्ट

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *