अयोध्या(AYODHYA): अयोध्या में 25 नवंबर का दिन इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज होने जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस दिन न सिर्फ राम मंदिर के शिखर पर ध्वज पताका फहराएंगे, बल्कि वह उस लंबे संघर्ष, आंदोलन और तपस्या के भी साक्षी बनेंगे, जिनकी परिणति आज भव्य राम मंदिर के रूप में सामने खड़ी है. राम मंदिर आंदोलन की पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. 80 के दशक में वह आरएसएस के प्रचारक के रूप में सक्रिय थे और भव्य राम मंदिर निर्माण के संकल्प को साकार करने के लिए लगातार संगठनात्मक बैठकों, अभियानों और रणनीतियों में हिस्सा लेते रहे.
1987 से 1989 के बीच आंदोलन ने जब नई गति पकड़ी, तब मोदी ने कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं. उनका योगदान उस दौर में आंदोलन को मजबूत बनाने के लिए बेहद अहम माना जाता है. 1990 में पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की ऐतिहासिक रामरथ यात्रा ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया था. इस यात्रा में नरेंद्र मोदी मुख्य प्रबंधक और रूट समन्वयक की भूमिका में थे. रूट तय करना, जनसमर्थन जुटाना, यात्रा को सुचारू चलाना.. इन सभी जिम्मेदारियों को उन्होंने खुद संभाला. यह वह दौर था जब मोदी विपक्षी माहौल, प्रशासनिक अड़चनों और विरोध प्रदर्शनों के बीच आंदोलन को संगठित ढंग से आगे बढ़ाने में प्रमुख चेहरा बनकर उभरे.
राम मंदिर के संघर्ष की कहानी सदियों पुरानी है और इस संघर्ष को पूर्णता तक पहुंचाने का सपना देखने वालों में वर्तमान प्रधानमंत्री भी शामिल थे. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या को उसकी गरिमा के अनुरूप संवारने में पीएम मोदी ने व्यक्तिगत रुचि लेकर कामों की निगरानी की.
NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

