
सुधार की आड़ में गहराता संकट
धनबाद(DHANBAD): भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में “समानता” और “समावेशन” के नाम पर प्रस्तावित यूजीसी विनियम 2026 वर्तमान में एक व्यापक विमर्श का केंद्र बन गया है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में भेदभाव का अंत और न्याय की स्थापना सर्वोपरि है। किंतु, जब न्याय के नाम पर लाया गया कानून स्पष्टता के बजाय अस्पष्टता, और सुरक्षा के बजाय भय पैदा करने लगे, तो वह सुधार नहीं, बल्कि समाज के आंतरिक ढांचे पर प्रहार बन जाता है। एक समाजसेवी विचारक के रूप में जब हम इस नीति की परतों को खोलते हैं, तो इसके भीतर से एक ऐसी भयावह तस्वीर उभरती है, जो भारत के उच्च वर्ग (सवर्ण समाज) को एक ऐसे कोने में धकेल सकती है जहाँ से केवल दो ही रास्ते निकलते हैं बौद्धिक पलायन या धार्मिक धर्मांतरण।
इतिहास केवल युद्धों का संकलन नहीं है, बल्कि इस बात का गवाह है कि कैसे प्रशासनिक नीतियों ने जनसांख्यिकी को बदल दिया। भारत में धर्मांतरण के पीछे केवल आध्यात्मिक झुकाव नहीं, बल्कि अक्सर ‘राज्य-प्रायोजित अलगाव’ जिम्मेदार
जब राज्य और समाज ने एक वर्ग को प्रताड़ित किया, तो उन्होंने अपनी जड़ों को त्याग दिया (जैसे दलितों का बौद्ध या ईसाई बनना)। विनियम 2026 इसी चक्र को उल्टा घुमाने की क्षमता रखता है, जहाँ अब उच्च वर्ग को प्रताड़ना का केंद्र बनाया जा रहा है।
विनियम 2026: कानूनी असुरक्षा और ‘सामूहिक अपराधी’ का भाव
इस विनियम की सबसे बड़ी समस्या इसकी अस्पष्ट परिभाषाएं हैं। ‘उत्पीड़न’ और ‘भेदभाव’ जैसे शब्दों को इतना लचीला रखा गया है कि किसी भी उच्च वर्गीय शिक्षक या छात्र की छोटी सी असहमति या शैक्षणिक अनुशासन को ‘जातिगत प्रहार’ घोषित किया जा सकता है।
न्याय का सार्वभौमिक सिद्धांत है “निर्दोष तब तक, जब तक दोष सिद्ध न हो जाए।” लेकिन इस विनियम के तहत आरोप लगते ही जो सामाजिक और प्रशासनिक कार्यवाही (जैसे तत्काल निलंबन या जांच के दौरान बहिष्कार) का प्रावधान है, वह व्यक्ति को दोषी सिद्ध होने से पहले ही मानसिक और सामाजिक रूप से मार देता है।
अपराधबोध का बीजारोपण: शिक्षण संस्थानों में यदि सवर्ण मेधा को निरंतर यह सिखाया जाएगा कि उनका अस्तित्व ही ‘शोषक’ का है, तो नई पीढ़ी में एक ‘गिल्ट कॉम्प्लेक्स’ (सेल्फ गिल्ट) पैदा होगा। यह मानसिक दबाव उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान से नफरत करने और विदेशी विचारधाराओं या अन्य धर्मों की ओर जाने के लिए प्रेरित करेगा।
धर्मांतरण का ‘सेफ पैसेज’: एक नई चुनौती
भारत में अल्पसंख्यक संस्थानों (ईसाई, मुस्लिम आदि) को अनुच्छेद 29 और 30 के तहत विशेष सुरक्षा प्राप्त है। वे अपने नियम बनाने और प्रशासनिक स्वायत्तता रखने में स्वतंत्र हैं।
यदि यूजीसी के विनियम सवर्णों द्वारा संचालित हिंदू संस्थानों या व्यक्तियों पर कठोरता से लागू होते हैं, तो यह वर्ग खुद को बचाने के लिए उन पंथों या धर्मों की शरण लेगा जहाँ ये नियम शिथिल हैं।
विदेशी फंडेड एनजीओ और मिशनरी संस्थाएं अक्सर ऐसी ही सामाजिक दरारों का लाभ उठाती हैं। जब उच्च वर्ग का एक मेधावी प्रोफेसर या छात्र खुद को राज्य द्वारा प्रताड़ित और समाज द्वारा उपेक्षित पाएगा, तो ये संस्थाएं उन्हें ‘कानूनी सुरक्षा’ और ‘सम्मान’ का प्रलोभन देकर धर्मांतरित कर सकती हैं। यह “बौद्धिक धर्मांतरण” राष्ट्र की आत्मा के लिए घातक होगा।
सवर्ण समाज पारंपरिक रूप से शिक्षा और ज्ञान का नेतृत्व करता रहा है। यदि कैंपस ‘शिकायत बनाम शिकायत’ का अखाड़ा बन गए, तो:
प्रतिभा का देशत्याग: सक्षम और धनी उच्च वर्ग भारत के विश्वविद्यालयों को असुरक्षित मानकर विदेशों की ओर पलायन (फ्लाइट ऑफ़ कैपिटल एंड टैलेंट) तेज कर देगा।
वैचारिक आत्मसमर्पण: जो यहाँ रहेंगे, वे डर के मारे बोलना, पढ़ाना और नेतृत्व करना छोड़ देंगे। यह ‘बौद्धिक रिक्तता’ अंततः राष्ट्र को कमजोर करेगी।
यूजीसी विनियम 2026 समाज में ‘अविश्वास की दीवार’ खड़ी कर रहा है। यह छात्र को छात्र के विरुद्ध और शिक्षक को छात्र के विरुद्ध खड़ा कर रहा है।
यदि एक वर्ग (अनु:जा:/अनु.सू.जनजाति/ओबीसी) को यह सिखाया जाए कि दूसरा वर्ग (सवर्ण) उनका स्थायी दुश्मन है, और सवर्ण वर्ग को यह महसूस कराया जाए कि राज्य उनके खिलाफ है,
वर्तमान राजनीति में ‘वोट बैंक’ के लिए समाज को श्रेणियों में बांटना एक आसान हथियार बन गया है। कुछ समूह इस विनियम को ‘ऐतिहासिक न्याय’ कह रहे हैं, लेकिन न्याय कभी भी ‘प्रतिशोध’ (रिवेंज) पर आधारित नहीं होना चाहिए।
यदि न्याय का आधार ‘तथ्य’ न होकर ‘पहचान’ बन जाए, तो वह न्याय नहीं, बल्कि ‘राज्य-प्रायोजित प्रतिशोध’ है।
इतिहास गवाह है कि प्रतिशोध की राजनीति ने हमेशा गृहयुद्ध या बड़े पैमाने पर सामाजिक रूपांतरण को जन्म दिया है।
सुधार अनिवार्य है, लेकिन वह संतुलन के साथ होना चाहिए। विनियम 2026 में निम्नलिखित सुधार तुरंत आवश्यक हैं:
झूठी शिकायतों पर कड़ी कार्यवाही: व्यवस्था की साख तभी बचेगी जब दुरुपयोग करने वालों को भी दंड मिले।
स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ परिभाषाएं: भेदभाव क्या है, इसके साक्ष्य क्या होने चाहिए, यह स्पष्ट हो।
द्विपक्षीय सुनवाई: आरोपी को अपराधी मानने से पहले उसे अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिले।
न्याय का आधार ‘व्यक्ति’ हो, ‘जाति’ नहीं: दंड कर्म के आधार पर मिलना चाहिए, जन्म के आधार पर नहीं
यूजीसी विनियम 2026 एक दोधारी तलवार है। यदि इसका उद्देश्य वास्तव में समानता है, तो इसका स्वागत है। लेकिन यदि इसके पीछे का छिपा हुआ एजेंडा समाज के एक मेधावी वर्ग को मानसिक रूप से तोड़कर उसे अपनी जड़ों से विमुख करना है, तो यह ‘सभ्यतागत आत्मघात’ (सिविलिजेशनल सुसाइड) का मार्ग है।
भारत को आज मेधा, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की जरूरत है। कैंपस में भय का वातावरण केवल ‘शिकायतकर्ता’ और ‘अपराधी’ पैदा करेगा, ‘विद्वान’ नहीं। राज्य को याद रखना चाहिए कि जब नागरिक अपने ही देश के कानूनों से डरने लगते हैं, तो वे या तो विद्रोही बन जाते हैं या फिर पराये। भारत को खंडित होने से बचाने के लिए हमें ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो जोड़ने का काम करें, न कि उन्हें धर्म बदलने या देश छोड़ने पर मजबूर करें।
मेरा प्रश्न: क्या हम समानता की वेदी पर अपनी सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान की बलि देने को तैयार हैं? इस प्रश्न का उत्तर ही भारत का भविष्य तय करेगा।
सामाजिक विस्फोट की चेतावनी है जो समय रहते सजग होना ही राष्ट्रहित में है।
यूजीसी 13 जनवरी को देश में लागू हो गया है फिर भी सरकार, विपक्ष, मंत्रालय पीएमओ और मीडिया सब चुप है इतना बड़ा निर्णय पर चारों ओर शांति छाई हुई है डर से कोई बोलने को तैयार नहीं, कहां जा रहा है राष्ट्र। बीपी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन लागू करके समाज को बांटा था उनके पदचिनों पर लगता है केंद्र की सरकार चल रही है।
NEWSANP के लिए धनबाद से कुंवर अभिषेक सिंह की रिपोर्ट

