मौत तो महबूबा और जिंदगी एक दिन सबको ठुकरायगी…ये गाना सब पर लागू होता हैं. इसमे कोई टर्म और कंडीशन नहीं होती . क्या पाया और क्या खोया सबकुछ यहीं यादों में सिमटा रहता हैं. जिंदगी का यहीं फलसफा और हकीकत हैं. इसके रंग जीते जी तो तमाम रंग बिखेरती हैं. लेकिन एक दिन ऐसा आता हैं जहां सिर्फ इसकी यादें ही बचती हैं.
कोयलांचल धनबाद को अपनी कर्मभूमि और यहां की मिट्टी से बेपनाह मुहब्बत करने वाले कांग्रेस नेता ददई दुबे अब इस दुनिया को छोड़कर चले गए. गिरता स्वास्थ्य और शरीर में लगी बीमारी के चलते आखिरकार उनका निधन दिल्ली में हो गया.
बाबा के नाम से पुकारे जाने वाले दादई दुबे एक अलग ही हस्ती और शख्शियत के मालिक थे. सियासत में उनकी हुंकार, बेबाक बोल को भला कौन भूला और बिसरा सकता हैं.
2 जनवरी 1946 को जन्मे ददई दुबे का सियासी सफऱ जमीन से शुरू होकर इस सियासत की बिसात पर दूर तक गया. जो मजबूती से अपने ही अंदाज, अकड़ और अंगड़ाई में ताउम्र चलते रहें. जहां एक मतवालापन और लोगों के बीच अपनापन साफ -साफ झलकता था. सोचिये यह शख्स गांव के मुखिया से लेकर मंत्री तक का सफऱ तय किया.ये उनकी काबिलियत, लोगों का भरोसा और एक ऊंचा कद ही दिखाता हैं.
धोती -कुर्ता पहनकर एक आम आदमी की बानगी और बेबाक बोल उनको एक अलग पहचान ही दिखाती थी . ददई दुबे चार बार विश्रामपुर से विधायक चुने गए, दो बार झारखण्ड की सरकार में मंत्री, एकबार संयुक्त बिहार में मंत्री और एक बार धनबाद से सांसद रहें.
उनका मन हमेशा जन समस्याओं को सुलझाने और आम आवाम और कोयला मजदूरों के हक़ की आवाज बुलंद करने के लिए जीवन भर लगा रहा . इससे वह कभी पीछे नहीं हटे, क्योंकि लोगों का प्यार और ऐतबार इसी राजनीति के जरिए ही उन्होंने कमाया था.
धनबाद से भी ददई दुबे का पुराना रिश्ता रहा और देश की कोयला राजधानी में एकबार यहां की जनता ने 2004 में सांसद भी बनाकर दिल्ली भेजा. उन्होंने दो दशक के भाजपा के किले को कांग्रेस की टिकट पर ध्वस्त किया और रीता वर्मा को शिकस्त दी. पिछले करीब तीन दशक में गैर भाजपा सांसद इकलौते दादई दुबे ही बने. इसबार भी लोकसभा में टिकट की उनकी दावेदारी थी.
मजदूर यूनियन की सियासत में भी ददई दुबे की धाक और धमक अपनी ही थी. स्वर्गीय राजेंद्र सिंह के खिलाफ रहना उनका अक्सर सुर्खियों में रहता था. उनका इंटक ददई गुट के नाम से फेमस था. अंतिम समय तक इसके अध्यक्ष रहें.
सियासत में समझौते अपने फायदे -नुकसान के लिए होते रहते हैं. इसके लिए एक से एक सियासतदान किसी हद तक भी जाने से समझौता कर लेते हैं. लेकिन ददई दुबे अलग ही मिट्टी के थे, आन पर अगर आंच आई तो बागवत का झंडा भी उठाने से बाज नहीं आये. इसकी एक झलक तब दिखी थी, जब कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर तृणमूल की टिकट पर धनबाद लोकसभा का चुनाव लड़ गए थे. बेशक हार गए पर अपनी जुबान, आन-बान और शान बरकरार रखी.
बाबा ने इस जिंदगी को भी देखी और सियासत के तमाम करवटों को भी करीब से देखा -समझा. लेकिन एक बात जो उनमे थी कि वह करते अपने मन की ही थे. चाहे कोई कितना भी कहे-बोले.
झारखण्ड का जनमानस उन्हें हमेशा एक ऐसे राजनेता के रूप याद रखेगी , जो हमेशा आम अवाम की फ़िक्र को समझा और एक नेता का फ़र्ज अदा किया.
NEWSANP के लिए शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट

