भारत को समझने के लिए बिहार को समझना जरूरी..08 बार राष्ट्रपति शासन से गुजरकर 18वीं बार आम चुनाव के दौर में उतरेगा बिहार….

भारत को समझने के लिए बिहार को समझना जरूरी..08 बार राष्ट्रपति शासन से गुजरकर 18वीं बार आम चुनाव के दौर में उतरेगा बिहार….

बिहार(BIHAR):लोहिया ने कहा था, राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालिक राजनीति। यह भी बताया कि धर्म का सच्चा अर्थ है, कर्तव्य। समाज व व्यक्ति का जो कर्तव्य है, वही धर्म है। वह आगे स्पष्ट करते हैं, धर्म का काम समाज को दूरगामी दृष्टि और स्थायी मूल्य देना है। इन मूल्यों को तत्कालीन परिस्थियों में उतारना, राजनीति का ध्येय है। राजनीति असल में अपने समय का धर्म है।

क्या बिहार की चुनावी चर्चा में राजनीति अपने समय के धर्म का (आज के सवालों के प्रति) निर्वाह कर रही है? शब्दों की मर्यादा है? विचार, सपने, लक्ष्य हैं? कभी राजेंद्र बाबू ने कहा था, यह बिहार का सौभाग्य है कि उसका अतीत, प्राचीन भारत के इतिहास की पृष्ठभूमि है। भारत के जीवन को समझने के लिए बिहार को समझना आवश्यक है। दरअसल, बिहार ने महज भारत को विशाल भौगोलिक आकार ही नहीं दिया, विद्वता, ज्ञान, कला की अद्भुत गहराई, गरिमा और ऊंचाई दी। वह भी तब, जब अधिसंख्य शेष संसार आदिम युग में था। दार्शनिक स्पिनोजा ने कहा था, अगर आप चाहते हैं कि आपका वर्तमान भिन्न हो, तो आप अपने अतीत (इतिहास) का अध्ययन करें।

क्या भाषा, ज्ञान, विचार, लोक अहंकार की जो ध्वनि आज चुनावी मैदान में है, वही बिहार है? या ‘बिहार के गौरव’ का पुनस्मरण जरूरी है, ताकि सामान्य लोग अपने अतीत के गौरव- कृति-उपलब्धि व सामर्थ्य को याद कर भविष्य गढ़ने का संकल्प ले सकें। चुनाव, सर्वश्रेष्ठ अवसर है, जब लोकमानस-लोकचर्चा से किसी नए सपने की नींव डाली जा सके।

क्या चुनाव महज पक्ष-विपक्ष का ही खेल है या सामान्य लोगों, युवाओं, महिलाओं, पीछे छूट गए गरीबों की हसरतों-सपनों को पंख देने, स्वर देने का भी अवसर है? पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने (22 जनवरी, 1957, ऑल इंडिया रेडियो) देश को संबोधित किया था। कहा था- सभी स्त्री-पुरुष, पढ़े-अनपढ़, शहरी-गंवई, ताकतवर व सामान्य, गरीब अमीर, आदिवासी-संभ्रात, पहाड़ी-मैदानी लोकतांत्रिक ढंग से स्त्रियों-पुरुषों को चुनेंगे, जो अगले पांच सालों तक सरकार बना कर देश की नियति को दिशा देंगे।

आज, दुनिया एक गांव है। यह नया संसार, देश और राज्य आज कहां खड़े हैं? दुनिया के श्रेष्ठ चिंतकों में से एक किशोर महबूबानी (सिंगापुर) ने पांच वर्ष पहले (19 नवंबर, 2020) कहा था, भारत आज ऐसी भू-राजनीति (जियोपॉलिटिकल) की आदर्श स्थिति में है, जब दुनिया एक मजबूत, स्वतंत्र, विवेक-संपन्न स्वर की तलाश में है, जो इस अशांत ग्रह (धरती) को नैतिक दिशा दे सके और इसका एकमात्र सही हकदार भारत है।

पर यह संभव कैसे है? यह सूत्र बिहार की धरती से ही ईसा से चार-पांच सौ साल पहले चाणक्य ने दिया था… ‘सुखस्य मूलम् धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः …।’ अतीत में बिहार इसी सूत्र पर चला। इसीलिए इतिहासकारों ने माना- बिहार का इतिहास, देश का इतिहास है।

आज चुनावों के संदर्भ में, बिहार के उस महान अतीत का लोक स्मरण-लोक चर्चा जरूरी है, ताकि हर बिहारी जाने, उसका गौरवपूर्ण अतीत क्या है? दूसरे विश्वयुद्ध के हताश क्षणों में चर्चिल ने ब्रिटेनवासियों का आवाहन किया, अपने अतीत को याद कर, गौरव से नया कामयाब ब्रिटेन बनाओ। इस आवाहन का जादुई परिणाम हुआ। बढ़ते जर्मनी की पराजय सुनिश्चित हुई।

आज बिहारी अपनी गरिमा, योगदान नहीं जानते। वे अपनी उपलब्धियों, धवल अतीत, योगदान-अवदान से अनभिज्ञ हैं। वे मिथिला, मगध, अंग, वज्जी, भोजपुर के गौरव को भूल चुके हैं। यह राजर्षि जनक, याज्ञवल्क्य, गार्गी से लेकर उदयनाचार्य, विद्यापति, अध्यात्म, चिंतन, कला की माटी है । लोकतंत्र, राजतंत्र, दर्शन व अध्यात्म की धरती। मिथिला या उत्तर बिहार-जनक-विदेह या महाभारत, मगध साम्राज्य, जरासंध की आबोहवा से पुष्पित- पल्लवित। सदी के चार-पांच सौ साल पहले अफगानिस्तान तक भारत का साम्राज्य (मौर्य साम्राज्य)। दक्षिण के कुछ राज्य जो नजराना देते थे, उन्हें छोड़कर शेष अखंड भारत। अलेक्जेंडर की सेना ने चंद्रगुप्त मौर्य की सेना से युद्ध करने से इनकार कर दिया। ग्रीक दूत सेल्यूकस ने अपनी बेटी चंद्रगुप्त मौर्य से ब्याही। मेगास्थनीज ने लिखा कि इस समृद्ध साम्राज्य में अमन-चैन, शांति, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा है। अत्यंत सभ्य-सुसंस्कृत सभ्यता है।..

आठ बार राष्ट्रपति शासन से गुजरकर 18वीं बार चुनाव के दौर में बिहार

बिहार, अपनी 18वीं विधानसभा की चयन प्रक्रिया में है. 1952 के पहले विधानसभा चुनाव से अब तक बिहार ने 17 बार विधानसभा का गठन देखा है. गुजरे सात दशकों में कुल 23 नेताओं ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली है. बदलते गठबंधनों और इस सियासी यात्रा में एक महिला, राबड़ी देवी, बिहार में मुख्यमंत्री बनीं.

आजादी के बाद बिहार की यात्रा श्रीकृष्ण सिंह से शुरू हुई. उन्होंने 15 अगस्त 1947 से लेकर 31 जनवरी 1961 तक नेतृत्व संभाला. 73 वर्ष की उम्र में उनके निधन तक वे करीब 13 साल और 169 दिनों तक सत्ता में रहे. इसमें 1947 में बनी अंतरिम सरकार से लेकर 1952 के पहले विधानसभा चुनाव तक वह अंतरिम मुख्यमंत्री रहे. उन दिनों यह पद ‘प्रीमियर’ कहा जाता था. 1952 के पहले विधानसभा चुनाव के बाद, वह निर्वाचित मुख्यमंत्री हुए. 1957 के दूसरे चुनाव तक उनका कार्यकाल रहा. उनके बाद, दीप नारायण सिंह ने फरवरी 1961 में मात्र 18 दिनों के लिए मुख्यमंत्री की गद्दी संभाली. फिर बिनोदानंद झा ने अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए राज्य को दिशा दी. फिर कृष्ण बल्लभ सहाय ने सत्ता संभाली. वह 3 साल 154 दिनों तक पद पर रहे.

लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल 1967 से शुरू हुई. महामाया प्रसाद सिन्हा का कार्यकाल 329 दिन ही चला. फिर तेजी से बदलाव का दौर आया. सतीश प्रसाद सिंह मात्र चार दिन, बीपी मंडल सिर्फ 50 दिन, और भोला पासवान शास्त्री 99 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे. इस तेज अदला-बदली ने संकेत दिया कि बिहार की राजनीति, एक अस्थिर दौर में प्रवेश कर चुकी है.

1960 दशक के आखिरी से 1970 के दशक तक बिहार की राजनीति, छोटे-छोटे कार्यकालों वाली सरकारों के नाम रहा. हरिहर सिंह महज 116 दिनों तक मुख्यमंत्री पद पर टिके. दारोगा प्रसाद राय का कार्यकाल भी 309 दिन ही रहा. वहीं, समाजवादी राजनीति के लिए मशहूर कर्पूरी ठाकुर ने दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. पहली बार 162 दिन (1970-71) और दूसरी बार 1977 के चुनावों के बाद लगभग एक साल 301 दिनों तक. भोला पासवान शास्त्री तीन बार मुख्यमंत्री बने. कुल मिलाकर उनका कार्यकाल मुश्किल से 11 महीने ही रहा. यह बिहार की अस्थिर गठबंधन राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है. इसके बाद केदार पांडेय ने एक साल 105 दिन तक सरकार चलायी. अब्दुल गफूर सत्ता में एक साल 283 दिन ही टिक पाए.

फिर जगनाथ मिश्र आए. जिनकी राजनीतिक यात्रा तीन अलग-अलग कार्यकाल में फैली रही. 1975 से शुरू होकर कुल मिलाकर 2000 दिनों से ज्यादा. 70 के दशक में दिखा कि बिहार की सत्ता में टिकना आसान नहीं.

1980 और 1990 का दशक बिहार की राजनीति में नए नेताओं की लहर लेकर आया. चंद्रशेखर सिंह ने एक साल 210 दिनों तक सत्ता संभाली. बिंदेश्वरी दुबे ने लगभग 3 साल, और भागवत झा आजाद ने एक साल से थोड़ा अधिक समय तक मुख्यमंत्री पद पर काम किया. सत्येंद्र नारायण सिन्हा का कार्यकाल 270 दिनों का ही रहा. इसके बाद जगत्राथ मिश्र की संक्षिप्त वापसी हुई, महज कुछ दिनों के लिए.

इसके बाद लालू प्रसाद का दौर शुरू हुआ. 1990 से 1997 तक वे दो कार्यकाल में मुख्यमंत्री रहे. वे बिहार के लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं में शामिल हो गए. चारा घोटाले के आरोपों के चलते लालू प्रसाद को कुर्सी छोड़नी पड़ी. जुलाई 1997 में उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने सत्ता संभाली. इस तरह लालू प्रसाद व राबड़ी देवी ने मार्च 2005 तक तीन कार्यकालों में लगभग 15 साल शासन किया.
सदी के मोड़ पर सत्ता की बागडोर नीतीश कुमार के पास पहुंची. मार्च 2000 में उनका पहला कार्यकाल महज सात दिनों का रहा. नवंबर 2005 से नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा का लंबा कार्यकाल चला. एक संक्षिप्त अंतराल के बाद, फरवरी 2015 से अब तक उनकी सत्ता का सिलसिला जारी है. यह बिहार के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री का सबसे लंबा रिकॉर्ड है. नीतीश कुमार के लंबे कार्यकालों के बीच, जीतन राम मांझी ने भी 2014-15 में 278 दिनों तक मुख्यमंत्री पद संभाला. नीतीश कुमार का सफर बिहार की राजनीति का सबसे निर्णायक अध्याय है. नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में राजनीतिक स्थिरता का पर्याय बने. अस्थिर सरकारों के दौर में राज्य के विकास पर गहरा असर पड़ा. अब तक आठ मुख्यमंत्री ऐसे रहे, जिन्होंने कई विधानसभाओं में वापसी की. मगर कहानी कुछ और भी है. इतिहास में सिर्फ तीन नेता, श्रीकृष्ण सिंह, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ही ऐसे रहे, जिन्होंने पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया.
1952 के पहले चुनाव से लेकर 17वीं विधानसभा तक, बिहार की राजनीति एक साथ निरंतरता और अस्थिरता के दौर से गुजरी है. कभी मजबूत नेताओं का उदय, कभी सरकारों का चंद दिनों में गिर जाना. इस सफर में राष्ट्रपति शासन के आठ दौर भी आए.

बिहार के प्रीमियर और अंतरिम मुख्यमंत्री

22 मार्च 1912 को वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1912 के तहत बिहार-उड़ीसा प्रांत की औपचारिक घोषणा की. इसके साथ ही लेफ्टिनेंट गवर्नर-इन-काउंसिल की स्थापना हुई. बिहार में एक नए प्रांत के लिए समाज और राजनीति के आधुनिकीकरण की राह खुली. अंततः 1936 में उड़ीसा से अलग होकर बिहार एक स्वतंत्र प्रांत बना. गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत बिहार उन प्रांतों में शामिल हुआ, जहां द्विसदनीय विधानमंडल बना. विधान सभा और विधान परिषद, जिसका नेतृत्व करता था एक प्रीमियर. आजादी से पहले प्रांतीय मुखिया को मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि ‘प्रीमियर’ कहा जाता था. 1936 में उड़ीसा से अलग होने के बाद, बिहार को दो प्रीमियर मिले. मोहम्मद यूनुस ने एक अप्रैल 1937 को बिहार के पहले प्रीमियर के रूप में कार्यभार संभाला. उनका कार्यकाल 19 जुलाई 1937 तक ही चला. इसके बाद बागडोर पहुंची श्रीकृष्ण सिंह के हाथों में, जिन्होंने 20 जुलाई 1937 से 31 अक्तूबर 1939 तक बिहार का एक प्रीमियर के तौर पर नेतृत्व किया. आजादी से ठीक पहले वे फिर लौटे और दो अप्रैल 1946 से आजादी की पूर्व संध्या 14 अगस्त 1947 तक बिहार को आजादी की दहलीज तक पहुंचाया. आजादी के बाद वही श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले अंतरिम मुख्यमंत्री बने. लगातार 1947 से 1952 तक सत्ता संभालकर, बिहार को स्थिरता और पहचान दी. अब राज्य अपनी 18वीं विधानसभा के चयन की तैयारी में है. बिहार की राजनीति, नदी की प्रवाहमान धारा है, अथक, अविरल.

NEWSANP के लिए बिहार से ब्यूरो रिपोर्ट

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