भारत के प्रजातंत्र के चार स्तंभों की वर्तमान स्थिति : एक यथार्थ चित्रण आलेख: आर पी सिंह, वरिष्ठ पत्रकार सह समाज शास्त्री…

भारत के प्रजातंत्र के चार स्तंभों की वर्तमान स्थिति : एक यथार्थ चित्रण आलेख: आर पी सिंह, वरिष्ठ पत्रकार सह समाज शास्त्री…

जामताड़ा(JAMTADA):भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां शासन की बुनियाद चार प्रमुख स्तंभों पर टिकी होती है — विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता। ये स्तंभ मिलकर एक ऐसे शासन तंत्र को मजबूत करते हैं, जहां जनता सर्वोपरि मानी जाती है। परंतु आज के परिप्रेक्ष्य में इन स्तंभों की स्थिति पर अगर हम गंभीरता से विचार करें, तो यह स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र के ये चार स्तंभ अब स्वयं ही संघर्ष कर रहे हैं।

इस लेख में हम इन चारों स्तंभों की वर्तमान स्थिति को विस्तार से समझेंगे और साथ ही सांसद डॉ. निशिकांत दुबे के विचारों के माध्यम से इस बहस को और व्यापक रूप देंगे।

1. विधायिका : भ्रष्टाचार की गिरफ्त में

विधायिका को लोकतंत्र की आत्मा माना जाता है। यह वह मंच है जहाँ जनता के प्रतिनिधि बैठते हैं और देश के लिए कानून बनाते हैं। लेकिन आज विधायिका की छवि गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।

भ्रष्टाचार और आपराधिक छवि के जनप्रतिनिधि

आज कई सांसद और विधायक ऐसे हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता भी जताई है। कई बार देखा गया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे प्रतिनिधि फिर से चुनाव जीत जाते हैं। यह न केवल लोकतंत्र की विफलता है, बल्कि जनता के विवेक पर भी सवाल खड़े करता है।

जनहित की जगह निजी स्वार्थ

बहस और चर्चा का मंच अब सत्ता की राजनीति और व्यक्तिगत हितों में उलझ चुका है। संसद के सत्र अब मुद्दों पर बहस के बजाय हंगामों और वाकयुद्ध में बीतते हैं। आम जनता से जुड़े मुद्दे जैसे — शिक्षा की गुणवत्ता, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं — अब घोषणाओं और जुमलों तक सीमित रह गए हैं।

पैसे और ताकत का प्रभाव

चुनावों में धनबल और बाहुबल का बोलबाला है। अमीर और प्रभावशाली लोग ही राजनीति में जगह बना पा रहे हैं। इससे एक आम नागरिक के लिए राजनीति एक दूर का सपना बन गई है। विधायिका में भागीदारी अब विशेष वर्गों तक सिमट गई है।

2. कार्यपालिका : षड्यंत्र और सत्ता की कठपुतली

कार्यपालिका का दायित्व होता है कि वह संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को ज़मीनी स्तर पर लागू करे। इसमें प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री और पूरी नौकरशाही शामिल होती है। परंतु आज कार्यपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों पर प्रश्नचिह्न लग चुके हैं।

राजनीतिक प्रभाव में नौकरशाही

नौकरशाहों से निष्पक्ष काम की उम्मीद की जाती है, परंतु अब अधिकांश अधिकारी राजनीतिक दबाव में काम कर रहे हैं। स्थानांतरण, पदोन्नति और पोस्टिंग जैसी बातें अब योग्यता से नहीं, बल्कि राजनीतिक संबद्धता से तय होती हैं।

नीतियों का ज़मीनी सच

नीतियों की घोषणा तो होती है, लेकिन उनका क्रियान्वयन वास्तविकता से कोसों दूर होता है। उदाहरण के तौर पर, गरीबों को मकान देने की योजनाएं हों या किसानों को सब्सिडी, इनके लाभार्थियों को कई बार योजनाओं की जानकारी ही नहीं मिलती।

संवेदनशीलता की कमी

एक आम आदमी जब किसी दफ्तर में जाता है, तो उसे घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है, बार-बार चक्कर काटने पड़ते हैं, और अंततः उसे ‘काम नहीं होगा’ कहकर लौटा दिया जाता है। यह कार्यपालिका की संवेदनहीनता को दर्शाता है। जब तक अधिकारी जनता की समस्याओं को दिल से नहीं समझेंगे, तब तक योजनाएं केवल कागज़ों पर ही सजी रहेंगी।

3. न्यायपालिका : उम्मीद और विरोधाभास का केंद्र

न्यायपालिका को लोकतंत्र का संरक्षक कहा जाता है। यही वह संस्था है जो संविधान की रक्षा करती है और सरकार के कार्यों पर निगरानी रखती है। परंतु हाल के वर्षों में न्यायपालिका की भी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

समानता पर संकट

जब एक ताकतवर व्यक्ति के लिए आधी रात को कोर्ट खुलता है, और वहीं एक गरीब महीनों जेल में सड़ता रहता है, तो यह न्याय की समानता पर चोट है। कानून की दृष्टि में सभी बराबर हैं, यह सिद्धांत व्यवहार में क्यों नहीं दिखता?

महंगा और देर से न्याय

देश में लाखों मुकदमे लंबित हैं। तारीख पर तारीख मिलती है, लेकिन फैसला नहीं। एक गरीब व्यक्ति के लिए वकील करना ही कठिन है, उस पर सालों तक अदालत में चक्कर काटना एक मानसिक और आर्थिक बोझ बन जाता है। “न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर” — यह कथन भारत की स्थिति को ठीक तरह से दर्शाता है।

न्यायिक हस्तक्षेप और सीमाएं

अक्सर देखा गया है कि न्यायपालिका उन क्षेत्रों में भी हस्तक्षेप करती है, जो विधायिका या कार्यपालिका के अधीन हैं। इससे संविधान का संतुलन प्रभावित होता है। यद्यपि कई बार यह हस्तक्षेप जनहित में होता है, परंतु इसकी सीमाएं तय होनी चाहिए।

4. पत्रकारिता : सोशल मीडिया और टेक्नोलॉजी की बलि चढ़ी अभिव्यक्ति

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है, क्योंकि यह जनता और सत्ता के बीच सेतु का कार्य करती है। लेकिन आज मीडिया अपनी भूमिका से भटक चुकी है।

राजनीतिक और कॉर्पोरेट नियंत्रण

अधिकांश बड़े मीडिया हाउस अब किसी न किसी उद्योगपति या राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हैं। इससे समाचारों की निष्पक्षता प्रभावित होती है। जो खबर जनता के हित में होनी चाहिए, वह TRP और विज्ञापन की दौड़ में पीछे रह जाती है।

स्वतंत्र पत्रकारिता का संकट

आज जो पत्रकार सच्चाई उजागर करने की कोशिश करते हैं, उन्हें धमकाया जाता है, झूठे मुकदमों में फंसाया जाता है या फिर हाशिए पर डाल दिया जाता है। नतीजा यह है कि अधिकांश पत्रकार अब ‘सेफ ज़ोन’ में काम करना पसंद करते हैं।

सोशल मीडिया की भूमिका

हालांकि सोशल मीडिया ने आम जनता को अपनी बात कहने का मंच दिया है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी खतरे में है। फेक न्यूज, ट्रोलिंग और सेंसरशिप ने सोशल मीडिया को अविश्वसनीय बना दिया है।

एआई और पत्रकारिता

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के उपयोग से पत्रकारिता में स्पीड तो बढ़ी है, लेकिन विश्लेषण और मानवीय दृष्टिकोण की कमी साफ झलकने लगी है। लेखों की मौलिकता और गहराई प्रभावित हो रही है। पत्रकार अब टेक्नोलॉजी के सहारे अधिक और विवेक के सहारे कम काम कर रहे हैं।

डॉ. निशिकांत दुबे के विचार : प्रासंगिक या प्रश्नास्पद?

सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने हाल ही में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका को आत्ममंथन करना चाहिए। उनके अनुसार:

  • न्यायपालिका को यह सोचने की ज़रूरत है कि क्या वह वाकई निष्पक्ष और समान रूप से न्याय दे रही है?
  • क्या न्यायिक सक्रियता की आड़ में संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ हो रही है?
  • क्या जनता का विश्वास न्यायपालिका में वैसे ही कायम है जैसा पहले हुआ करता था?

इन विचारों की प्रासंगिकता:

निष्कर्ष : लोकतंत्र की आत्मा को बचाना ज़रूरी

लोकतंत्र केवल संविधान की बातों से नहीं चलता, बल्कि उसकी आत्मा इन चार स्तंभों में बसती है। जब ये स्तंभ सही तरीके से काम करें, तभी लोकतंत्र फलता-फूलता है। आज इन स्तंभों की स्थिति चिंताजनक है, लेकिन निराशाजनक नहीं। आत्मचिंतन, सुधार और जनजागृति से हम इसे फिर से सशक्त बना सकते हैं।

  • विधायिका को चाहिए कि वह जनता के हितों को प्राथमिकता दे और ईमानदार राजनीति को बढ़ावा दे।
  • कार्यपालिका को जवाबदेह, पारदर्शी और संवेदनशील बनना होगा।
  • न्यायपालिका को निष्पक्ष, समयबद्ध और सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध न्याय देना चाहिए।
  • पत्रकारिता को सत्ता का भोंपू नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ बनना होगा।

डॉ. निशिकांत दुबे के विचार इसी दिशा में आत्ममंथन का आह्वान करते हैं। यह केवल एक सांसद की चिंता नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक की पुकार है। आइए, हम सब मिलकर लोकतंत्र की आत्मा को फिर से जीवित करें — ताकि हमारा संविधान कागज़ों पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर भी जीवित हो।

NEWSANP के लिए जामताड़ा से आर पी सिंह की रिपोर्ट

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