बिहार(BIHAR): बिहार में अपराध, विशेषकर अपहरण उद्योग, लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय रहा है। लेकिन जब राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक स्वयं यह कहें कि “पैसे वालों को पकड़कर छोड़ने” का खेल किसी आईपीएस अधिकारी के समय शुरू हुआ, तो यह केवल एक बयान नहीं रह जाता—यह पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा हो जाता है। पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय का यह दावा बिहार के पुलिस इतिहास के उस दौर की ओर इशारा करता है, जहां अपराध और कानून-व्यवस्था के बीच की रेखा धुंधली पड़ती दिखाई देती है।
पांडेय ने बेतिया (पश्चिम चंपारण) में तैनात एक तत्कालीन एसपी का नाम लिए बिना आरोप लगाया कि अपराधियों के साथ समझौते का दौर वहीं से शुरू हुआ। कथित तौर पर पैसे वाले लोगों को पकड़ना, फिर सौदेबाजी के बाद छोड़ देना—इस प्रवृत्ति ने अपहरण को संगठित अपराध का रूप दे दिया। यदि यह दावा सही है, तो यह केवल किसी एक अधिकारी की विफलता नहीं, बल्कि संस्थागत कमजोरी का संकेत है। यह भी संकेत देता है कि अपराध रोकने वाली मशीनरी का एक हिस्सा ही अपराध को संरक्षित करने लगा था।
बिहार में 1990 के दशक की शुरुआत में अपहरण उद्योग का खुला विस्तार देशभर में चर्चा का विषय बना। व्यवसायी, डॉक्टर, इंजीनियर, यहां तक कि छात्रों तक को निशाना बनाया गया। इस दौर ने बिहार की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया। फिल्म, साहित्य और मीडिया में भी “किडनैपिंग इंडस्ट्री” बिहार की पहचान के रूप में प्रस्तुत होने लगी। राजनीतिक स्तर पर भी इस पर बहस हुई, लेकिन ठोस जवाबदेही शायद ही तय हो सकी।
दिलचस्प बात यह है कि इसी क्षेत्र में कुछ अधिकारियों ने सख्ती से अपराधियों के खिलाफ अभियान भी चलाए। पूर्व डीजीपी अभयानंद के बेतिया कार्यकाल का अक्सर उल्लेख किया जाता है, जब कुख्यात अपराधियों और डकैतों के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि समस्या केवल भौगोलिक नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और नेतृत्व पर निर्भर थी।
चंपारण क्षेत्र का प्रशासनिक पुनर्गठन भी कानून-व्यवस्था सुधार के उद्देश्य से किया गया था। मोतिहारी को पूर्वी चंपारण और बेतिया को पश्चिम चंपारण के रूप में मजबूत प्रशासनिक इकाइयों में बांटा गया। इसके बावजूद यदि अपराध-पुलिस गठजोड़ के आरोप सामने आते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संरचनात्मक बदलाव पर्याप्त क्यों नहीं रहे।
पूर्व डीजीपी का बयान कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, यह पुलिस तंत्र के भीतर आत्ममंथन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। दूसरा, यह बताता है कि अपराध का संस्थानीकरण तभी संभव होता है जब उसे कहीं न कहीं संरक्षण मिले। तीसरा, यह सवाल उठाता है कि क्या आज भी ऐसे तंत्र के अवशेष मौजूद हैं, जैसा कि “दबी जुबान” में अक्सर कहा जाता है।
ऐसे दावों की गंभीरता को देखते हुए आवश्यक है कि इतिहास की इन परतों को केवल राजनीतिक बयानबाजी के रूप में न देखा जाए, बल्कि शोध, दस्तावेजीकरण और जवाबदेही के साथ समझा जाए। क्योंकि जब कानून लागू करने वाली संस्था पर ही संदेह खड़ा हो, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव कमजोर होती है। बिहार ने लंबे समय में कानून-व्यवस्था में सुधार के दावे किए हैं, लेकिन अतीत के ऐसे आरोप याद दिलाते हैं कि पारदर्शिता और जवाबदेही की प्रक्रिया लगातार चलती रहनी चाहिए।
अंततः, यह मामला केवल किसी व्यक्ति या दौर का नहीं, बल्कि उस चेतावनी का है कि जब सत्ता और अपराध के बीच दूरी कम होती है, तो समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। बिहार के इतिहास के इस कथित “काले पन्ने” पर गंभीर चर्चा ही भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति को रोकने का मार्ग दिखा सकती है।
NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

