DESK:सच्चाई है कि सियासत सत्ता के लिए होती है, जहां सारी हदे भी पार करनी पड़े तो सियासतदान कुछ भी करने से न हिचकते है और न ही हिचकोले खाने से परहेज करते है.
हुकूमत हासिल करने की ख्वाहिश में मजबूरियों की माला पहननी पड़े या फिर इसके लिए किसी के साथ गलबहियां करनी पड़े या फिर तिकड़म के साथ तिमारदारी करनी पड़े. इससे न तो गुरेज है और न ही परहेज है. दरअसल, यही राजनय हैं, जिसका अंत -ठोर कोई नहीं ले सकता .इसका चाल, चरित्र और चेहरा ही जुदा है.
बिहार विधानसभा चुनाव के वोट डालने के गिनती भर दिन बचे है. भाजपा चुनावी मैदान में एकबार फिर कमर कसकर कूद चुकी है. लेकिन देश की इस सबसे बड़ी पार्टी और केंद्र में सत्तासीन यह पार्टी बिहार में सबकुछ होते हुए भी लाचार, बेबस और बेजार हो जाती है. जबकि बिहार में भाजपा का अपना जनाधार और मजबूत संगठन है. लेकिन सुशासन बाबू नीतीश की छत्रछाया और सरपरस्ती में रहने की ऐसी मज़बूरी और जरुरी हालात है कि इससे बाहर वह न सोच और खुलकर बोल ही सकती है . सत्ता में बने रहना है तो नीतीश बाबू को साथ लेकर चलना ही होगा, नहीं तो फिर विपक्ष में बैठकर ही हल्ला करना होगा.
L2005 में जब लालू -राबड़ी के शासन के बाद भाजपा -जेडीयू का शासन आया तो आज तक बीजेपी समझौता और समर्पण ही करती आई है, पिछले दो दशक में यही दिखलाई पड़ा है . अकेले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही सब पर भारी दिखलाई पड़ते हैं. विडंबना देखिए या इतिहास के दर्रीचो को झाकिये तो पिछले दो दशक में जितन राम मांझी को छोड़ दिया जाए तो मुख्यमंत्री सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार ही बने. चाहे नीतीश बाबू या कहे पलटू चाचा गठबंधन तोड़कर राजद से हाथ मिलाये या फिर लौटकर भाजपा से गले लगा ले. सीएम की कुर्सी पर तो उनके नाम पर ही मुहर लगी रहती है. आज भी उनका ही दावा राजग में पुरजोर है.
2015 में नीतीश राजद के गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, तब उनकी पार्टी राजद से भी कम सीट लाई थी , लेकिन बिहार की सियासत में किंगमेकर यह फिर कहे नीतीश कुमार को साथ लेना एक मज़बूरी है, क्योंकि उनके बिना राजद या फिर कहे भाजपा की सरकार नहीं बन सकती. यानि सत्ता के बाजीगर तो पलटू चाचा ही है, चाहे कोई कितना जोर -आजमाश कर ले.
सबसे सोचने और समझने वाली बात ये है कि भारतीय जनता पार्टी बिहार में ऐसा कोई नेता भी इस दरमियान खड़ा नहीं कर सकी और न इस दौरान ऐसा कोई उभर सका. जबकि प्रदेश में पार्टी अपना संगठन है.इसके अपने कैडर और एक अपनी विचारधारा है. बदकिस्मती कहिये कि आज भी बिहार में भाजपा का कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं दिखता. एक खाली पन,एक उदासी और एक अंधेरा ही चारोंतरफ दिखलाई पड़ता है. यह सूनापन और सन्नाटा कब हटेगा. इसका इंतजार आज भी बेसब्री से है.
इसबार बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा और जेडीयू 101-101 सीट पर चुनाव लड़ी रही है.यानि बराबरी में दोनों चल रहे है, जबकि सच तो ये है कि जेडीयू से ज्यादा सीट पर चुनाव लड़ने की अहमियत और ताकत बीजेपी रखती है. लेकिन यहां भी मज़बूरी और गठबंधन टूटने का डर है. लाजमी है कि अगर सत्ता में एनडीए आती है तो फिर जेडीयू और नीतीश कुमार ही सामने नजर आएंगे. ऐसे में भाजपा के हाथ सत्ता तो आएगी, लेकिन मुख्यमंत्री उनकी पार्टी से शायद ही कोई बने. यानि हालात और हाल वही होंगे, जो अभी तक होते आए है और जों तजुर्बे ने अभी तक बताया है.
हालंकि हल्ला तो हो रहा है कि इसबार नीतीश बाबू का पत्ता कटने वाला है.पर सच्चाई तो ये भी कि ऐसी खबरें पहले भी फिजा में गाहे-बगाहे पसरती रही है.
खैर ये तो 14 नवंबर के बाद मालूम पड़ेगा कि सत्ता किसके हाथ आती है. लेकिन अगर हकीकत पर गौर करें तो अगर बिहार में राजग की सरकार बनी तो नीतीश कुमार का ही सीएम की कुर्सी का दावा सबसे ज्यादा रहेगा. इसके पीछे वजह ये भी है कि केंद्र में भी जेडीयू मोदी सरकार की अहम सहयोगी है. ऐसे में संभव नहीं लगता कि भाजपा सुशासन बाबू को बेदखल या दरकिनार करें.ऐसा कोई भी जोखिम शायद ही मोल ले.
राजग सत्ता में आती है तो देखना यही दिलचस्प होगा कि आखिर भाजपा के लिए क्या कुछ बदलता है.? क्या कुछ उसके लिए नयापन आता है?, क्योंकि सौ बात कि एक बात तो यही है कि अभी तक बिहार में भाजपा शासन में रहकर भी ऐसा लगता है कि वह सत्ता से दूर हैं. नीतीश कुमार की मौजूदगी में उसका वजूद उतना नहीं दिखता. उनकी राहों में सुशासन बाबू ही आड़े आ जाते है और फिर मानो पार्टी के लिए सबकुछ खत्म या ब्रेक लग जाता है.सारी सुर्खियां नीतीश कुमार ही बटोर ले जाते हैं, और उनके इर्द -गिर्द ही सबकुछ घूमता रहता है.
जरा बिहार में अब तक राजग के शासन को गौर से देखिएगा, आपको अपने तजुर्बे से सब मालूम पड़ेगा कि आखिर बिहार में किस कदर मजबूरियों के जाल में भाजपा उलझी हुई है?.
NEWSANP के लिए शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट.

