बिहार में निशांत कुमार संभालेंगे नीतीश की कुर्सी,”बैरम खान” बने RCP सिंह ने कर दिया खेला,बिहार से दिल्ली तक हड़कंप …

बिहार में निशांत कुमार संभालेंगे नीतीश की कुर्सी,”बैरम खान” बने RCP सिंह ने कर दिया खेला,बिहार से दिल्ली तक हड़कंप …

बिहार(BIHAR): आख़िर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को क्या हो गया कि अचानक उन्हें एक ‘बैरम ख़ान’ की तलाश होने लगी… इस पर भी बात होगी कि आख़िर आरसीपी सिंह ही क्यों बार-बार इस भूमिका के लिए सामने आ रहे हैं…और यह भी जानेंगे कि निशांत कुमार की एंट्री सिर्फ पारिवारिक निर्णय है या बिहार की राजनीति का अगला अध्याय…बिहार की राजनीति में कुछ भी अचानक नहीं होता। यहाँ हर मुलाक़ात, हर मंच, हर नारा और हर चुप्पी के पीछे एक लंबी तैयारी छुपी होती है। नीतीश कुमार जैसे नेता के मामले में तो यह बात और भी सच है। तीन दशक से ज़्यादा समय से सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार जिसमे कभी मंत्री, कभी मुख्यमंत्री,कभी किंगमेकर.कभी गठबंधन का निर्णायक की भुमिका निभाए नीतीश ने कभी कोई कदम बिना सोचे नहीं उठाया। फिर सवाल उठता है—अचानक नीतीश को “बैरम ख़ान” कहा से याद आ गया . इसके पीछे भी कोई गहरी वजह ज़रूर होगी…

नीतीश कुमार अब उस दौर में हैं, जहाँ राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि विरासत को सुरक्षित करने की चिंता भी उतनी ही बड़ी हो जाती है। बिहार ने उन्हें लंबे समय तक देखा है—एक आंदोलनकारी के रूप में, एक सुधारक मुख्यमंत्री के रूप में, और एक ऐसे नेता के रूप में जिसने गठबंधनों को अपनी सुविधा के हिसाब से बदला। लेकिन पहली बार ऐसा लग रहा है कि नीतीश कुमार अपनी राजनीति से ज़्यादा अपने बाद की राजनीति को लेकर गंभीर हैं। और यहीं से निशांत कुमार का नाम सामने आता है। लेकिन बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को बहुत प्यार दिया क्या निशांत कुमार को भी इतना प्यार मिलेगा. निशांत कुमार अब तक राजनीति से दूर रहे। न कोई बड़ा भाषण, न कोई चुनावी मंच, न कोई संगठनात्मक पद। लेकिन बिहार की राजनीति में कभी-कभी चुप्पी ही सबसे बड़ा संकेत होती है। जिस तरह से हाल के महीनों में निशांत कुमार सार्वजनिक आयोजनों में दिखे, जिस तरह से जदयू के भीतर उनके नाम की चर्चा बढ़ी, और जिस तरह से समर्थकों ने “नीतीश के बाद निशांत” की बात कहनी शुरू की—यह सब इत्तेफाक़ तो नहीं हो सकता। नीतीश कुमार जानते हैं कि बिहार की राजनीति भावनाओं से नहीं, समीकरणों से चलती है। सिर्फ बेटा होना सत्ता का टिकट नहीं होता। उसके लिए स्वीकार्यता चाहिए, संगठन चाहिए, और सबसे ज़रूरी—एक ऐसा संरक्षक चाहिए जो राजनीति की पहली और सबसे कठिन लड़ाई लड़े।

क्या निशांत को बैरम ख़ान चाहिए ?

अब सवाल यह उठता है कि बिहार के चाणक्य को बैरम ख़ान क्यों चाहिए इतिहास में झाँके तो बैरम ख़ान कोई साधारण नाम नहीं था। वह सिर्फ एक सेनापति नहीं था, वह सत्ता का संरक्षक था। अकबर जब नाबालिग थे, तब मुगल साम्राज्य चारों ओर से दुश्मनों से घिरा हुआ था। हेमू जैसा ताक़तवर शासक दिल्ली की गद्दी पर दावा कर रहा था। ऐसे समय में बैरम ख़ान ने न सिर्फ युद्ध लड़ा, बल्कि सत्ता को स्थिर किया। उन्होंने अकबर को राजा बनाया, लेकिन स्वयं परदे के पीछे रहे। यही वह मॉडल है, जिसे आज की राजनीति में “किंगमेकर” कहा जाता है। और बिहार में अगर किसी को यह भूमिका निभाने का अनुभव है, तो वह आरसीपी सिंह हैं। आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार का रिश्ता सिर्फ राजनीति का नहीं, भरोसे का रहा है। यह रिश्ता फाइलों, फैसलों और दिल्ली-पटना के सत्ता गलियारों में पला-बढ़ा। जब नीतीश कुमार बिहार में सुशासन का चेहरा गढ़ रहे थे, तब आरसीपी सिंह उस सिस्टम की रीढ़ थे। कौन-सा अफसर कहाँ बैठेगा, केंद्र से कैसे बात होगी, नीति कैसे बनेगी—इन सबमें आरसीपी की पकड़ थी। यही वजह थी कि एक समय जदयू में यह कहा जाने लगा कि पार्टी पर नहीं, बल्कि आरसीपी सिस्टम पर चल रही है। और यही बात नीतीश कुमार को खटक गई।….नीतीश कुमार का स्वभाव रहा है—जो बहुत बड़ा हो जाए, उसे काट दो।..राजनीति में यह क्रूर लगता है, लेकिन यही उनकी ताक़त भी रही है। आरसीपी सिंह का पतन इसी सिद्धांत का परिणाम था। लेकिन राजनीति में स्थायी दुश्मनी नहीं होती, सिर्फ स्थायी ज़रूरतें होती हैं। आज जब निशांत कुमार की चर्चा तेज़ है, तब नीतीश कुमार को किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जो—संगठन को संभाल सके जो दिल्ली को साध सके जो विरोधियों को मैनेज कर सके और सबसे अहम— जो परदे के पीछे रहकर काम कर सके और यह भूमिका कोई नया चेहरा नहीं निभा सकता। और यहीं आरसीपी सिंह फिर से प्रासंगिक हो जाते हैं।

पटेल सेवा संघ का मंच इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा संकेत बनकर उभरा। नीतीश कुमार का 1993 के बाद वहाँ जाना, आरसीपी सिंह की लगातार मौजूदगी, और फिर “नीतीश-आरसीपी एक हों” के नारे—यह सब सिर्फ सामाजिक कार्यक्रम नहीं था। यह बिहार की राजनीति में एक टेस्ट रन था। आरसीपी सिंह का बयान—“हम दो नहीं हैं, हम एक ही हैं”—सिर्फ भावनात्मक नहीं था, वह राजनीतिक पुनःस्थापना का संकेत था। यह कहना कि “हम 25 साल साथ रहे हैं”—दरअसल यह याद दिलाना था कि विश्वास टूटा हो सकता है, लेकिन मिटा नहीं है।

क्या आरसीपी सिंह बैरम ख़ान बनना चाहेंगे?

अब सवाल उठता है—क्या आरसीपी सिंह बैरम ख़ान बनना चाहेंगे.इतिहास बताता है कि बैरम ख़ान का अंत सत्ता से टकराव में हुआ था। जब अकबर बड़े हुए, तो बैरम ख़ान को किनारे कर दिया गया। यह जोखिम हर संरक्षक जानता है। शायद यही वजह है कि आरसीपी सिंह भी इस भूमिका को बेहद सावधानी से देख रहे होंगे। लेकिन राजनीति में दूसरा मौका इतिहास बदल देता है। अगर आरसीपी सिंह इस बार सत्ता नहीं, बल्कि विरासत का हिस्सा बनते हैं—तो यह उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक वापसी होगी। और अंत में सवाल निशांत कुमार पर आता है। क्या निशांत कुमार अकबर बन पाएंगे? क्या वे जनता, संगठन और विरोधियों की राजनीति समझ पाएंगे? क्या वे अपने पिता की छाया से बाहर निकल पाएंगे? इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इतना तय है—अगर बैरम ख़ान मॉडल सच हुआ, तो बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर तय है। क्योंकि जब सत्ता पिता से पुत्र की ओर बढ़ती है, तो इतिहास सिर्फ दोहराया नहीं जाता—वह नए तरीके से लिखा जाता है।

आरसीपी निशांत के कंधे से चलाएंगे सरकार

फिर से वही सवाल दोहराएंगे आख़िर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को क्या हो गया कि अचानक उन्हें एक ‘बैरम ख़ान’ की तलाश होने लगी…यह सवाल जितना सरल दिखता है, जवाब उतना ही जटिल है। क्योंकि यह सवाल सिर्फ आरसीपी सिंह की वापसी से जुड़ा नहीं है,यह सवाल नीतीश कुमार की पूरी राजनीतिक यात्रा, उनके डर, उनकी मजबूरी और उनकी सबसे बड़ी ताक़त—रणनीति—से जुड़ा है। नीतीश कुमार को अगर भारतीय राजनीति के सबसे धैर्यवान नेताओं में गिना जाता है, तो उसकी वजह यह है कि उन्होंने समय के साथ खुद को बदला है, लेकिन अपनी सत्ता की पकड़ कभी ढीली नहीं छोड़ी। जेपी आंदोलन से निकले नेता, समाजवादी प्रयोगों से गुज़रे मुख्यमंत्री और गठबंधन की राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी—नीतीश कुमार ने राजनीति को भावना नहीं, गणित की तरह पढ़ा। लेकिन अब वही गणित एक नए सवाल पर आकर अटक गया है— अब नीतीश के बाद कौन?

वंशवाद की राजनीति में उलझेंगे नीतीश

यहाँ से कहानी और गहरी होती है। नीतीश कुमार कभी भी वंशवाद की राजनीति के समर्थक नहीं रहे। लालू प्रसाद यादव की राजनीति के सबसे बड़े आलोचक वही रहे, जिन्होंने बार-बार कहा कि बिहार को परिवारवाद से मुक्त होना चाहिए। यही वजह है कि निशांत कुमार का नाम जब पहली बार राजनीतिक गलियारों में गूंजा, तो सबसे ज़्यादा असहजता खुद जदयू के भीतर देखी गई। लेकिन राजनीति में सिद्धांत तब तक ही चलते हैं, जब तक परिस्थितियाँ अनुमति देती हैं। आज नीतीश कुमार जिस दौर में हैं, वहाँ सिर्फ चुनाव जीतना मक़सद नहीं है। अब मक़सद है—राजनीतिक धरोहर को सुरक्षित रखना । और यही वह बिंदु है, जहाँ आरसीपी सिंह फिर से तस्वीर में आते हैं। आरसीपी सिंह को सिर्फ एक नेता के तौर पर देखना, उनके कद को कम करके आंकना होगा। वे नीतीश कुमार की राजनीति के वह अध्याय हैं, जिसे जानबूझकर भुलाया गया, लेकिन मिटाया नहीं जा सका। आईएएस की ट्रेनिंग, केंद्र सरकार की कार्यशैली, और दिल्ली की सत्ता से संवाद—आरसीपी सिंह जानते हैं कि सत्ता सिर्फ विधानसभा में नहीं चलती, वह फाइलों, notesheets और बंद कमरों में चलती है। यही वजह थी कि नीतीश कुमार ने उन्हें सिर्फ पार्टी का चेहरा नहीं, बल्कि सिस्टम का ऑपरेटर बनाया। एक समय ऐसा भी आया, जब जदयू के कई बड़े नेता यह मानने लगे थे कि पार्टी अध्यक्ष नहीं, बल्कि आरसीपी सिंह असली शक्ति केंद्र हैं।
और यही वह मोड़ था, जहाँ नीतीश कुमार को लगा—यह शक्ति संतुलन बिगड़ रहा है। नीतीश कुमार का स्वभाव यहाँ साफ दिखाई देता है। वे किसी को भी अपने बराबर खड़ा नहीं होने देते।
जो भी बहुत ऊँचा उड़ता है, उसे ज़मीन दिखा दी जाती है। आरसीपी सिंह इसके सबसे बड़े उदाहरण बने। लेकिन राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति तब आती है, जब वही व्यक्ति, जिसे आपने हटाया, वही व्यक्ति फिर से आपकी ज़रूरत बन जाए। आज निशांत कुमार की राजनीति को लेकर जो चर्चाएँ हैं, उसमें सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या निशांत कुमार बिहार की राजनीति की कठोरता को अकेले झेल पाएंगे? क्योंकि बिहार की राजनीति सिर्फ मंच और भाषण नहीं है। यह जाति, समीकरण, संगठन, विरोध और सत्ता का जाल है। और इस जाल में नए खिलाड़ी अक्सर उलझ जाते हैं। नीतीश कुमार यह जानते हैं। इसीलिए उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है, जो खुद आग में जल चुका हो। और यही आरसीपी सिंह की सबसे बड़ी योग्यता है।

क्या निशांत कुमार नीतीश बन पाएंगे ..?

निशांत कुमार अगर राजनीति में आते हैं, तो वे सिर्फ नीतीश कुमार के बेटे नहीं होंगे।
वे उस विरासत के वाहक होंगे, जिसे बिहार ने दो दशक तक देखा है। लेकिन सवाल यह है—
क्या निशांत कुमार अपनी पहचान बना पाएंगे, या वे सिर्फ एक “राजनीतिक उत्तराधिकारी” बनकर रह जाएंगे? इस सवाल का जवाब भविष्य देगा। लेकिन अगर बैरम ख़ान मॉडल लागू हुआ,
तो यह तय है कि बिहार की राजनीति में सत्ता का संक्रमण चुपचाप नहीं होगा—वह रणनीति, संरचना और संरक्षक के साथ होगा। क्योंकि जब राजनीति में पिता इतिहास होता है, और पुत्र भविष्य—तो बीच में हमेशा किसी बैरम ख़ान की ज़रूरत पड़ती है।

क्या नीतीश खुद का सामना कर पाएंगे..?

अब हम बात करेंगे उस टकराव की, जहाँ नीतीश कुमार की पूरी राजनीति खुद नीतीश कुमार से आमने-सामने खड़ी दिखती है…और यह भी जानेंगे कि क्या बिहार की राजनीति अब एक नए तरह के वंशवाद में प्रवेश कर चुकी है—जिसे नाम भले कुछ और दिया जाए, लेकिन आत्मा वही हो। नीतीश कुमार ने जिस राजनीति को गढ़ा, उसकी सबसे मजबूत दीवार थी—परिवारवाद से दूरी। लालू प्रसाद यादव पर सबसे तीखा हमला इसी मुद्दे पर हुआ । आज वही नीतीश कुमार उस मोड़ पर हैं, जहाँ सवाल उठ रहा है—क्या निशांत कुमार की एंट्री उस राजनीति का खंडन है, जिसे नीतीश कुमार ने वर्षों तक गढ़ा? या फिर यह एक मजबूरी है, जिसे सिद्धांतों से ऊपर रख दिया गया है? इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें नीतीश कुमार के डर को समझना होगा।
यह डर हार का नहीं है। यह डर सत्ता छिनने का भी नहीं है। यह डर है—विरासत बिखरने का। नीतीश कुमार जानते हैं कि जदयू आज वैसी पार्टी नहीं रही, जैसी 2010 के दौर में थी। संगठन कमजोर है। …कैडर थका हुआ है।……नेतृत्व पर निर्भरता सिर्फ एक चेहरे पर है।..और यह चेहरा अब अनंतकाल तक राजनीति नहीं कर सकता।..यही वह सच्चाई है, जिससे नीतीश कुमार भाग नहीं सकते।

क्या जदयू में झोल है ?

अब ज़रा जदयू के भीतर झाँकिए। पार्टी में कोई दूसरा ऐसा चेहरा नहीं है, जिस पर सर्वसम्मति बन सके। कोई दूसरा नेता ऐसा नहीं, जिसे नीतीश कुमार के बाद स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाए। ललन सिंह, उपेंद्र कुशवाहा, अरुण कुमार—सबके साथ या तो टकराव रहा, या फिर दूरी। इस खालीपन में निशांत कुमार का नाम अपने आप उभरता है। लेकिन नाम उभरना और नाम को स्वीकार कराया जाना—ये दोनों अलग-अलग लड़ाइयाँ हैं। और यहीं से “बैरम ख़ान मॉडल” की जरूरत पैदा होती है। क्योंकि अगर निशांत कुमार सफल हुए—तो नीतीश कुमार इतिहास में एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज होंगे, जिसने सत्ता छोड़ी, लेकिन व्यवस्था नहीं टूटने दी। और अगर असफल हुए तो यही फैसला नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल कहलाएगा। क्योंकि राजनीति में विरासत बनाना, सत्ता जीतने से कहीं ज्यादा कठिन होता है। बिहार की राजनीति अब चुनाव नहीं लड़ रही, वह इतिहास लिखने की कोशिश कर रही है।

यह देखना बाकी है कि
यह इतिहास अकबर की तरह स्वर्णिम होगा या फिर सत्ता के संघर्षों में खो जाएगा। क्योंकि जब राजनीति में…बैरम ख़ान की तलाश शुरू होती है,..तो समझ लीजिए—.सिंहासन बदलने वाला है।

NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

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