बिहार बीजेपी में राजपूत उपेक्षा पर उठते गंभीर सवाल…

बिहार बीजेपी में राजपूत उपेक्षा पर उठते गंभीर सवाल…

पटना(PATNA): बिहार विधानसभा की नई तस्वीर सामाजिक और जातीय प्रतिनिधित्व के लिहाज से कई सवाल खड़े कर रही है , इस बार विधानसभा में 25 कुर्मी, 23 कुशवाहा, 26 बनिया, 23 भूमिहार, तीन कायस्थ और अन्य पिछड़ी जातियों के 13 विधायक चुने गए हैं। वहीं 10 मुसलमान विधायक भी सदन में पहुंचे हैं, जिनमें एआईएमआईएम के पांच, राजद के तीन, कांग्रेस के दो और जदयू का एक विधायक शामिल है।इन तमाम आंकड़ों के बीच सबसे चौंकाने वाली संख्या है—32 राजपूत विधायक, यह किसी भी जाति की सबसे बड़ी संख्या है। खास बात यह है कि ये सभी एनडीए कोटे से हैं और इनमें भी सबसे ज्यादा विधायक बीजेपी के हैं। इसके बावजूद सत्ता और संगठन में राजपूत समाज की मौजूदगी लगभग शून्य नजर आ रही है।

ना कोई डिप्टी सीएम,
ना विधानसभा अध्यक्ष,
ना प्रदेश अध्यक्ष..और NDA से 5 सांसद होने के बावजूद बिहार से एक भी राजपूत नेता को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है।

यह स्थिति अब महज संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी राजनीतिक उपेक्षा के तौर पर देखी जाने लगी है , अगर विधायक और सांसदों की संख्या को प्रतिनिधित्व का पैमाना माना जाए, तो राजपूत समाज सबसे आगे है। लेकिन जब बात सत्ता के केंद्रों—मंत्रिमंडल, संगठन और संवैधानिक पदों—की आती है, तो यही समाज सबसे ज्यादा हाशिये पर दिखाई देता है, केंद्रीय राजनीति में कभी बिहार बीजेपी के मजबूत स्तंभ माने जाने वाले राधा मोहन सिंह, राजीव प्रताप रूड़ी और जनार्दन सिंह सिग्रीवाल जैसे नेताओं की लगातार उपेक्षा भी इसी ओर इशारा कर रही है,

प्रदेश स्तर पर तस्वीर और भी असहज है, लगातार जीत दर्ज करने वाले वरिष्ठ विधायक रामप्रवेशराय और अशोकसिंह का टिकट काट दिया गया, लेकिन आज तक पार्टी के भीतर इस पर कोई ठोस जवाब सामने नहीं आया.. इसी तरह पांच बार के विधायक बनियापुर के केदार सिंह न तो सरकार में नजर आते हैं और न ही संगठन में ,वहीं तरैया के साफ-सुथरी छवि वाले जनक सिंह भी पूरी तरह हाशिये पर डाल दिए गए हैं ,

नीरज कुमार बबलू, ,संतोष सिंह राजू सिंह जैसे नेताओं का कद अचानक क्यों छोटा कर दिया गया ..?यह सवाल भी पार्टी के भीतर ही नहीं बाहर भी पूछा जा रहा है , यह सिर्फ कुछ नेताओं का मामला नहीं है, बल्कि एक पूरे सामाजिक समूह के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल बनता जा रहा है।

32 विधायक होने के बावजूद अगर किसी समाज को सत्ता और संगठन दोनों से बाहर रखा जाए, तो यह साफ तौर पर गंभीर असंतोष को जन्म देने वाली स्थिति है।

बीजेपी सामाजिक संतुलन और प्रतिनिधित्व की बात करती रही है, लेकिन बिहार में राजपूतों के मामले में तस्वीर उलटी दिख रही है—संख्या में सबसे आगे, लेकिन सत्ता में सबसे पीछे..

राजनीतिक गलियारों में अब यह सवाल खुलकर उठने लगा है कि क्या यह सब महज संयोग है या फिर बिहार बीजेपी में राजपूत नेतृत्व को व्यवस्थित तरीके से साइडलाइन करने की रणनीति?
अगर यही स्थिति बनी रही, तो यह मुद्दा आने वाले समय में सिर्फ संगठन के भीतर ही नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति में भी बड़ा रूप ले सकता है..

NEWS ANP के लिए पटना से ब्यूरो रिपोर्ट

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