फागुन पूर्णिमा पर रंग-अबीर से सजा ‘औघरदानी महादेव’ का दरबार , उमड़ा आस्था का सैलाब…

फागुन पूर्णिमा पर रंग-अबीर से सजा ‘औघरदानी महादेव’ का दरबार , उमड़ा आस्था का सैलाब…

जामताड़ा/मिहिजाम(JAMTADA): फागुन पूर्णिमा केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं। भारतीय सनातन परंपरा में आनंद, समर्पण और आध्यात्मिक उल्लास का भी पावन पर्व है। इसी दिन होलिका दहन के साथ असत्य पर सत्य की विजय का संदेश दिया जाता है । अगले दिन रंगोत्सव के माध्यम से समाज में प्रेम, सौहार्द और समरसता का संचार होता है। शिवभक्तों के लिए यह तिथि विशेष महत्व रखता है। क्योंकि फागुन का महीना स्वयं भगवान शिव को अति प्रिय माना गया है।

इसी पावन अवसर पर मिहिजाम स्थित चितरंजन स्टेशन रोड शिवालय में ‘ओघरदानी महादेव’ का अद्भुत एवं भावपूर्ण श्रृंगार किया गया। रंग-अबीर, गुलाल और गुलाब की पंखुड़ियों से सजे शिवालय का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण और आस्था का केंद्र बन गया।

रंगों में झलकी आलौकिक शिवमयी छटा

मंदिर प्रांगण में स्थापित विशेष आकृति के मध्य भाग को पीले अबीर से इस प्रकार सजाया गया कि दूर से देखने पर भगवान शिव की आकृति का दर्शन होता है। पीले, गुलाबी और लाल रंगों का संतुलित संयोजन भक्तों को एक दिव्य अनुभूति प्रदान कर रहा था।

शिवालय के गर्भगृह के समीप फर्श पर बनाई गई कलात्मक संरचना को चारों ओर से गुलाल की रेखाओं से सजाया गया। उसके मध्य में पीले अबीर का ऊँचा शिखरनुमा आकार निर्मित किया गया। जो शिवलिंग की प्रतीकात्मक छवि प्रस्तुत करता है। उसके चारों ओर गुलाब की पंखुड़ियों की माला-सी परिधि बनाकर उसे और अधिक आकर्षक स्वरूप दिया गया।

श्रद्धालुओं का कहना था कि यह दृश्य मानो स्वयं महादेव की साकार उपस्थिति का संकेत दे रहा हो।

पारंपरिक सजावट में आधुनिक सौंदर्यबोध

मंदिर की दीवारों और शेल्फ पर स्थापित देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को भी पीतवर्ण वस्त्रों और गुलाबी चुनरी से अलंकृत किया गया था। ऊपर से लटकी हुई गेंदे की मालाएं वातावरण में पवित्रता और उत्सव का आभास करा रही थीं।

सजावट में प्राकृतिक रंगों और पुष्पों का उपयोग किया गया, जिससे वातावरण में सुगंध और सात्त्विकता बनी रही। कहीं भी कृत्रिम चकाचौंध नहीं। सरल, सुसंस्कृत और भक्तिभाव से ओतप्रोत सज्जा ने उपस्थित श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

‘औघरदानी महादेव’ का आध्यात्मिक संदेश

स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार औघरदानी महादेव’ का भाव यह है कि भगवान शिव अपने भक्तों के घर-आंगन में स्वयं विराजमान हों। फागुन पूर्णिमा पर किया गया यह विशेष श्रृंगार उसी भाव का मूर्त रूप था—मानो महादेव स्वयं रंगों के माध्यम से भक्तों के बीच अवतरित हुए हों।

पीले अबीर से निर्मित शिव-आकृति का प्रतीकात्मक स्वरूप यह संदेश दे रहा था कि भगवान शिव केवल मंदिरों में नहीं। हर भक्तों के हृदय में निवास करते हैं।

भक्ति और उत्साह का संगम

सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का आगमन प्रारंभ हो गया था। महिलाएं थाल में अबीर-गुलाल और पुष्प लेकर पहुंचीं। वहीं युवाओं और बुजुर्गों ने भी महादेव के चरणों में रंग अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

भजन-कीर्तन और ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष से वातावरण गूंजायमान रहा। कई श्रद्धालुओं ने इसे वर्षों में देखी गई सबसे आकर्षक और भावपूर्ण सजावट बताया।

फागुन पूर्णिमा का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि पर चंद्रमा अपनी पूर्ण कला में होता है। जो मन और चेतना को शुद्ध करने का प्रतीक है। यह दिन भक्तों को अपने भीतर की नकारात्मकता को जलाकर प्रेम और सद्भाव के रंग में रंग जाने की प्रेरणा देता है।

शिवालय में रंग-अबीर का यह अलंकरण उसी सांस्कृतिक परंपरा का सजीव उदाहरण है। जहां भक्ति और उत्सव एक साथ दिखाई देते हैं।

समाज में समरसता का संदेश

मंदिर समिति के सदस्यों ने बताया कि इस आयोजन का उद्देश्य केवल सजावट नहीं। समाज में एकता और भाईचारे का संदेश देना है। फागुन पूर्णिमा का रंगोत्सव सभी भेदभावों को मिटाकर लोगों को एक सूत्र में बांधने का माध्यम बनता है।

इस अवसर पर विभिन्न वर्गों और आयु के लोगों ने मिलकर मंदिर को सजाया। जिससे सामूहिक सहभागिता और सहयोग की भावना भी प्रकट हुई।

दरअसल

चितरंजन स्टेशन रोड शिवालय में फागुन पूर्णिमा पर किया गया ‘औघरदानी महादेव’ का रंग-अबीर से श्रृंगार केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं। आस्था, कला और सामूहिकता का अद्भुत संगम था। पीले अबीर से उभरी शिव-आकृति ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति से भर दिया।

फागुन की पूर्णिमा पर रंगों में रचे-बसे इस शिवमय वातावरण ने यह सिद्ध कर दिया कि जब भक्ति और सौंदर्य एक साथ मिलते हैं। तब हर स्थान स्वयं तीर्थ बन जाता है।

NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

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