जामताड़ा(JAMTADA): कभी-कभी प्रशासनिक पद और मानवीय संवेदना एक ही क्षण में ऐसे मिल जाते हैं कि वह दृश्य स्वयं एक प्रेरक कथा बन जाता है। बुधवार, 28 जनवरी 2026 की संध्या लगभग 5:15 बजे ऐसा ही एक दृश्य फतेहपुर–खागा बॉर्डर पर देखने को मिला। जब विशेष कार्य से दुमका से लौट रहे जामताड़ा के पुलिस अधीक्षक ने सड़क किनारे एक गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को देखा—और बिना किसी औपचारिकता, बिना किसी विलंब के मानवता को अपना प्रथम कर्तव्य बनाया।
सड़क किनारे अचेत अवस्था में पड़े घायल व्यक्ति की पहचान पिंटू मरांडी के रूप में हुई। उसका दोनों पैर टूट चुका था और शरीर से खून बह रहा था। स्थानीय लोगों के अनुसार, एक डिजायर चारपहिया वाहन ने उसे जोरदार टक्कर मारी और चालक वाहन लेकर मौके से फरार हो गया। उस क्षण सड़क पर गुजरने वाले कई लोग थे। परंतु निर्णायक कदम पुलिस अधीक्षक ने ही उठाया।
जब पीड़ा ने पुकारा, तब वर्दी की हनक नहीं—संवेदना आगे आई’
घटना को देखते ही पुलिस अधीक्षक महोदय ने अपना वाहन रुकवाया और तत्काल एंबुलेंस बुलाने का निर्देश दिया। अपने अंगरक्षक प्रेम टोप्पो एवं वरुण दास के सहयोग से उन्होंने घायल को सुरक्षित स्थिति में रखवाया और बिना किसी औपचारिक देरी के उसे सदर अस्पताल जामताड़ा भिजवाया। ताकि उसे त्वरित और बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल सके।
यह वही क्षण था, जहां प्रशासनिक कुर्सी से उतरकर एक अधिकारी ‘मानव’ बनकर सामने खड़ा था। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की रश्मि रथी की पंक्तियाँ इस दृश्य पर स्वतः सजीव हो उठती हैं—
वह पुरुष नहीं, जो सहता जाता है,
जिसके भीतर ज्वाला सोई रहती है;
वह पुरुषार्थ, वह तेज, वही मानवता है,
जो पीड़ा देख रुक नहीं पाता है।”
सड़क सुरक्षा माह में ‘गुड समैरिटन’ की जीवंत मिसाल
उल्लेखनीय है कि जनवरी माह पूरे देश में सड़क सुरक्षा माह के रूप में मनाया जा रहा है। ऐसे समय में पुलिस अधीक्षक जामताड़ा द्वारा दिखाया गया यह मानवीय व्यवहार ‘गुड समैरिटन’ की भावना का सशक्त उदाहरण है। उन्होंने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि दुर्घटना स्थल पर घायल को देखकर आगे बढ़ जाना नहीं। बल्कि रुककर मदद करना ही सच्चा धर्म है।
यह घटना न केवल पुलिस की जिम्मेदारी का निर्वहन है। बल्कि समाज के लिए एक नैतिक संदेश भी है—कि वर्दी केवल कानून की प्रतीक नहीं, बल्कि करुणा, साहस और संवेदना की भी पहचान है।
मानवता का रथ, संवेदना का सारथी
आज जब अक्सर व्यवस्था को संवेदनहीन कह दिया जाता है, ऐसे समय में जामताड़ा के पुलिस अधीक्षक का यह कृत्य रश्मिरथी के उस ओजस्वी भाव को साकार करता है। जहां शक्ति का अर्थ दूसरों की रक्षा होता है। वे उस रथ के सारथी बनकर सामने आए। जिसकी धुरी कानून नहीं, बल्कि करुणा थी। जिसकी गति आदेश नहीं, बल्कि दया से संचालित थी।
फतेहपुर–खागा बॉर्डर पर घटित यह घटना जामताड़ा के इतिहास में एक छोटी खबर नहीं, बल्कि एक बड़ा संदेश है—कि जब सत्ता के हाथों में संवेदना हो, तब प्रशासन स्वयं विश्वास बन जाता है।
NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

