झारखंड(JHARKHAND): पाकुड़ के होली बाजार में इस बार गुलाल सिर्फ रंग भरने के लिए नहीं, बल्कि एक नई कहानी, मेहनत और उम्मीद लेकर आया है। यह कहानी है गांव की उन दीदियों की, जो अपने हाथों से हर्बल गुलाल बनाकर न सिर्फ होली को खास बना रही हैं, बल्कि अपनी जिंदगी को भी रंगीन कर रही हैं।
गांव की दीदियों की मेहनत, बाजार में नई पहचान
सुबह के पहले सूरज की किरण जब हाटपाड़ा और गाँधी चौक के बाजार में फैलती है, तब दीदियों के हाथों से बनी गुलाल की खुशबू हवा में घुल जाती है। ये गुलाल ‘पलाश’ ब्रांड के नाम से बाजार में उपलब्ध हैं। गांव की दीदियों ने ट्रेनिंग लेकर गुलाल बनाना सीखा और अब उनके हाथों का जादू हर रंग में दिखाई देता है। हरे रंग के लिए पालक, गुलाबी के लिए चुकंदर, पीले और नारंगी रंग के लिए पलाश और हल्दी, और नीले रंग के लिए सिंद्धार सहित फूल-पत्तियां इस्तेमाल की जाती हैं। गुलाल में प्राकृतिक एसेंस मिलाकर इसे खुशबूदार भी बनाया गया है। “पहले हम बस घर की जरूरत के लिए गुलाल बनाते थे, अब हमारे हाथों का गुलाल बाजार में बिकता है और इससे हमारी आमदनी भी बढ़ी है,” कहती हैं सखी मंडल की दीदी सीमा देवी।
हर गुलाल में छुपा है आत्मनिर्भर बनने का सपना
5 से 10 क्विंटल गुलाल इस बार बाजार में आएगा और इसकी कमाई सीधा दीदियों के बीच बांटी जाएगी। यह सिर्फ रंग भरने वाला गुलाल नहीं है, बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण का जरिया भी है। सीमा देवी बताती हैं, “हमारे पास पहले ज्यादा विकल्प नहीं थे, लेकिन पलाश ब्रांड ने हमें मौका दिया। अब हम अपनी मेहनत का फल खुद देख पाती हैं। होली सिर्फ त्योहार नहीं, हमारे लिए खुशियों और सम्मान का समय भी है।”
होली के रंग और दीदियों की मेहनत का संगम
हाटपाड़ा और गाँधी चौक में लगाए गए स्टॉल्स पर लोग हर्बल गुलाल खरीदने आ रहे हैं। रंगों की तरह लोगों के चेहरे भी खिल उठते हैं। प्राकृतिक गुलाल सिर्फ रंग ही नहीं देता, बल्कि पारंपरिक संस्कृति और स्थानीय महिलाओं की मेहनत की कहानी भी फैलाता है। इस होली, पाकुड़ का बाजार सिर्फ रंगों से नहीं, दीदियों के हाथों बनी मेहनत और उम्मीदों से भी गुलजार है। हर गुलाल में गांव की उन महिलाओं की मेहनत, उनकी आत्मनिर्भरता और नए सपनों की खुशबू छुपी है।
NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

