पत्रकार पर भड़क और अकड़ क्यों रहें हैं जयराम महतो….

पत्रकार पर भड़क और अकड़ क्यों रहें हैं जयराम महतो….

रांची(RANCHI) :-सियासत में खामोशियों का सिलसिला लंबा नहीं चलता. क्योंकि कोई माननीय की जुबान सिली नहीं रह सकती, क्योंकि यही तो इस सियासत की नजाकत और चलन हैं. यहां नफ़सात कम कड़वाहट सत्ता की खातिर ज्यादा काम आती हैं.अभी -अभी चुने जयराम महतो एक युवा नेता हैं, उनके खड़े होने से भाजपा का सपना सत्ता साधने का कांच के माफिक चकनाचूर हो गया. जब विधायक जयराम नहीं चुने गए थे, तो उनके तेवर और तल्ख़ी उनकी भाषा में परवान पर रहती थी. अब विधानसभा के लिए जनता ने उन्हें चुना लेकिन उनके तेवर अभी भी कम नहीं हैं. विधानसभा में उन्होंने एक विपक्ष का विधायक कैसे सवाल करता है और कैसे सरकार को मुद्दों और मसलों पर जगाता और खिचाई करता है. ये जिम्मेदारी तो बहुत हद तक उन्होंने निभाई. क्योंकि लोकतंत्र में एक विपक्ष का मजबूत होना बहुत जरुरी है. छात्रों के मसले, झारखण्ड के शाहिदों और मैया सम्मान योजना पर जयराम ने अपनी बात रखी और नसीहत भी दी और सच मायने में अपना फ़र्ज अदा किया.वीडियो में ये भी देखा गया कि जयराम ज़ब पहली बार विधानसभा के दर पर पहुंचे तो नंगे पाव और अपना शिश भी झुकाया और सम्मान दिया. ये उनकी तरफ से लोकतंत्र के प्रति आस्था और प्रेम की नजीर थी. जिसकी तारीफ भी हो रही है और असल में होनी भी चाहिए.

क्योंकि अंत में हम सभी एक लोकतान्त्रिक देश में रहते है और जहाँ जनता का शासन है.जिसे लोकशाही भी कहते है.लेकिन, यही जयराम महतो का दूसरा चेहरा लोकतंत्र के प्रति कुछ अलग दिखता है, जब एक पत्रकार पर चिल्लाते है यानि लोकतंत्र के चौथे खम्बे पर भड़कते, अकड़ते और उंगली दिखाकर चेहरा लाल करते हैं. सवाल है जब आप लोकतंत्र की बात करते है और इसके मंदिर पर सर झुकाते है तो उसी लोकतंत्र के चौथे खम्भे पर ऐसी बेअदबी और बेरुखी क्यों? क्या एक पत्रकार पर एक माननीय द्वारा ऐसी हनक, गुस्सा और गुमान वाली भाषा बोलनी चाहिए? क्या ऐसी भाषा का इस्तेमाल वाकई सही है? जयराम महतो ने ये भी कहां की चुनाव के दरमियान आपने मेरा इंटरव्यू नहीं लिया. प्रश्न है अगर उस पत्रकार ने उनका इंटरव्यू नहीं लिया तो आप उसके साथ ऐसा सलूक और बात करेंगे. जबकि दूसरा पहलू ये भी है कि इसी लोकतंत्र के चौथे स्तभ ने आपकी बात आम जन तक पहुंचाई. आपकी सोच और विचार को बताया और आपका महिमामंडन भी किया? सवालों की एक लम्बी झड़ी है, जिसे बोला और उठाया जाए तो जयराम महतो की ये धमक और चिल्लाहट कही से भी सही नहीं कही जाएगी. जयराम महतो हमेशा अपनी भाषण शैली के लिए चर्चित रहें है, उनकी इस रुख को उनकी पार्टी के ही सदस्य रहें संजय मेहता ने भी आपत्ति जताई थी और सवाल खड़े किये थे. पार्टी से खुद को किनारे भी कर लिया था.यही जयराम महतो कभी दामोदर में डुबाने, तो किसी नाजिर को पटक कर मारने की बात करते है तो किसी अफसर के सामने मेज पर बोतल मार देते हैं. सुलगता हुआ सवाल यही है कि क्या ऐसी भाषा बोलनी और हरकत करनी चाहिए?

जयराम महतो झारखण्ड के जमीनी मसलों को उठाते है और सरकार के खिलाफ उनका प्रहार जबरदस्त रहता है, उनकी ये बाते और प्रश्न जायज रहते है. इससे इंकार नहीं किया जा सकते, बल्कि हर कोई इत्तेफ़ाक़ रखेगा.लेकिन, हर जगह अकड़ और हनक में बोलना और किससे क्या और कैसे बात कर रहें है इसका ख्याल रखना भी जरुरी है. इसके साथ ही अपनी बात को बोलकर भी गलती नहीं मानना कही न कही एक गुमान और खुद को सर्वपरी समझना ही दर्शाता है.हमे ये याद रखना चाहिए देश का हरेक नागरिक -जन इस सविधान, कानून और लोकतंत्र के दायरे में ही आते है. इससे बाहर कोई नहीं हैं. तो फिर इसके नाते भी हमे अपनी शालीनता और अदब बरकरार रखनी चाहिए, न कि आप ने जो कह दिया वही सही है, बाकि सब बकवास और बेतुका है.

NEWSANPके लिए रांची से शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *