स्थान: जनजातीय संध्या डिग्री महाविद्यालय, मिहिजाम (जामताड़ा, झारखंड)
तिथि: मंगलवार, अप्रैल 2025
आयोजक: हिंदी विभाग, जनजातीय संध्या डिग्री महाविद्यालय
विषय: आधुनिक हिंदी साहित्य में नारी अस्मिता
जामताड़ा(JAMTADA):1. आयोजन की पृष्ठभूमि : क्यों उठी नारी अस्मिता पर बात?
भारत में नारी विमर्श एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुका है। साहित्य जगत ने समय-समय पर नारी के भीतर छिपी चेतना, संघर्ष और अस्तित्व की पुकार को अभिव्यक्त किया है। इसी विमर्श को और अधिक व्यापकता देने के उद्देश्य से हिंदी विभाग ने यह संगोष्ठी आयोजित की — जो केवल एक शैक्षणिक आयोजन न होकर समाज के मौन प्रश्नों को शब्द देने का माध्यम बना।
2. विषयवस्तु की संवेदनशीलता और आज की प्रासंगिकता
‘आधुनिक हिंदी साहित्य में नारी अस्मिता’ विषय ने आज के समय में और अधिक महत्व पा लिया है। बदलते समाज में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन उनके आत्मसम्मान और पहचान को लेकर उठते प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं। यही कारण है कि संगोष्ठी ने श्रोताओं को न केवल विचार के लिए, बल्कि आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित किया।
3. अध्यक्षीय भूमिका में प्राचार्य प्रो. कृष्ण मोहन शाह
कॉलेज के प्राचार्य प्रो. कृष्ण मोहन शाह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अपने वक्तव्य में कहा—
“नारी केवल एक परिवार की धुरी नहीं, वह समाज की चेतना है। साहित्य में नारी की उपस्थिति हमेशा गरिमा और सृजन की प्रतीक रही है। आज आवश्यकता है कि हम इस चेतना को केवल पृष्ठों में नहीं, व्यवहार में उतारें।”
4. डॉ. उत्तम कुमार सिन्हा का विश्लेषणात्मक व्याख्यान
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता कॉलेज के पूर्व सहायक प्राध्यापक डॉ. उत्तम कुमार सिन्हा ने नारी अस्मिता के विभिन्न पक्षों पर गंभीर चर्चा की। उनके विचार बौद्धिकता के साथ-साथ भावनात्मक गहराई से ओतप्रोत रहे।
प्रमुख बिंदु उनके वक्तव्य से:
- स्त्री को आत्मबोध की आवश्यकता है: “जब तक स्त्री स्वयं अपने मूल्य को नहीं पहचानेगी, समाज उसका मूल्यांकन अधूरा करता रहेगा।”
- साहित्य में स्त्री की गरिमा: “सभी महान काव्य और कथाओं में स्त्री को सम्मान दिया गया है—पर व्यावहारिक जीवन में हमने उसे दोयम दर्जा क्यों दिया?”
- इतिहास में नारी की पीड़ा:
“द्रौपदी, कुंती, अहिल्या—ये केवल पात्र नहीं, नारी अस्मिता की पीड़ा की जीवित गाथाएँ हैं। इन स्त्रियों को अपने अस्तित्व की प्रमाणिकता सिद्ध करनी पड़ी।” - कामायनी की श्रद्धा:
“जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ में नारी को केवल सौंदर्य नहीं, श्रद्धा और बौद्धिक सृजन का प्रतीक माना गया। यह दृष्टि आज के साहित्य में भी आवश्यक है।” - परित्यक्त नारी की पीड़ा:
“एक पत्नी के लिए सबसे त्रासद बात यह है कि उसका पति उसे अनदेखा कर दे। स्त्री तब सबसे अधिक टूटती है जब वह प्रेम में उपेक्षित होती है।” - श्रृंगार नहीं, शक्ति है नारी:
“स्त्रियाँ केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं, वे पुरुषों के जीवन में ऊर्जा और दिशा देने वाली शक्ति हैं।”
5. छात्राओं की भागीदारी : युवा दृष्टिकोण की झलक
इस संगोष्ठी की विशेषता रही छात्राओं की सहभागिता। कई छात्राओं ने अपने विचार प्रस्तुत किए जिनमें वर्तमान समाज में महिलाओं की भूमिका, चुनौतियाँ और आत्मसम्मान की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।
मुख्य बातें छात्राओं के वक्तव्यों से:
- “हमें साहित्य में पढ़ाई गई नारी से अधिक व्यवहारिक जीवन में जीने वाली नारी की गरिमा को पहचानना चाहिए।”
- “सच्चा सशक्तिकरण तब होगा जब हम बिना संघर्ष के सम्मान पाने लगें।”
- “स्त्री की सबसे बड़ी लड़ाई अपने घर की दीवारों से होती है।”
6. मंच संचालन और विभागीय सहभागिता
कार्यक्रम का सफल संचालन हिंदी विभाग की सहायक अध्यापिका शबनम खातून ने किया। उनकी भाषा की सहजता और भावनात्मक संतुलन ने मंच को गरिमा प्रदान की। उन्होंने कहा—
“नारी अस्मिता केवल विमर्श नहीं, वह व्यवहार में अपनाने योग्य विचारधारा है।”
उपस्थित विभागीय और शैक्षणिक हस्तियाँ:
- हिंदी विभागाध्यक्ष: प्रो. जयश्री
- NEC कोऑर्डिनेटर: डॉ. राकेश रंजन
- शिक्षकगण: सतीश शर्मा, रंजीत यादव, शंभू सिंह, बी. पी. गुप्ता
- शिक्षिकाएँ: पूनम कुमारी, अमिता सिंह, पुष्पा टोप्पो, किरण बनवाल
- अन्य गणमान्य: रामप्रकाश दास समेत दर्जनों शैक्षणिक और सामाजिक हस्तियाँ
7. संगोष्ठी के निहितार्थ : सिर्फ विमर्श नहीं, समाधान की दिशा
इस आयोजन से यह स्पष्ट संदेश गया कि नारी अस्मिता का प्रश्न केवल महिला सशक्तिकरण का नहीं, संपूर्ण मानव समाज के विकास का आधार है। संगोष्ठी केवल बौद्धिक विमर्श तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक वैचारिक आंदोलन की तरह स्त्री के स्वाभिमान की पुनः स्थापना का आह्वान करती दिखी।
8. निष्कर्ष : नारी अस्मिता का विमर्श क्यों बना आवश्यक?
- समाज में बढ़ती स्त्री भागीदारी को नई दृष्टि देना जरूरी है।
- साहित्य और समाज के बीच पुल बने ऐसे आयोजन।
- युवा पीढ़ी के लिए यह मंच आत्मबोध और वैचारिक स्पष्टता का अवसर बना।
9. मिहिजाम की बौद्धिक चेतना को नया आयाम
इस संगोष्ठी ने मिहिजाम जैसे छोटे शहर को राष्ट्रव्यापी स्त्री विमर्श से जोड़ने का कार्य किया। यहाँ से उठी आवाजें केवल एक मंच तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे भारतीय समाज की गूंजती चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं।
NEWSANP के लिए जामताड़ा से आर पी सिंह की रिपोर्ट

