जन सुराज के 98% उम्मीदवारों की जमानत जब्त, 6,000 किमी पैदल यात्रा भी न आयी काम
बिहार(BIHAR):पटना बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने यह साबित कर दिया कि वोटरों के मिजाज को पढ़ना उतना आसान नहीं, खासकर जब बात बिहार की हो।
राजनीति का ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले प्रशांत किशोर, जिनके नाम 6 साल में 6 मुख्यमंत्री बनाने का रिकॉर्ड है, इस बार अपनी ही जमीन पर एक सीट भी नहीं निकाल पाए।
जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन 233 की जमानत जब्त हो गई — यानी करीब 98% उम्मीदवार चुनाव में खाता तक नहीं खोल पाए।
रोहतास, जो कि पीके का होम ज़ोन माना जाता है, वहां की सभी 7 सीटों पर जन सुराज उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।
6,000 किमी की पदयात्रा बनी ‘शून्य’
5 मई 2022 से 2 अक्टूबर 2024 तक प्रशांत किशोर ने 6,000 किमी की पदयात्रा की, लगभग 5,000 गांवों में गए, 5,000 से अधिक सभाएँ कीं और दावा किया कि पार्टी के 1 करोड़ से ज्यादा सदस्य हैं।
लेकिन वोटों में यह मेहनत तब्दील नहीं हो सकी, पार्टी 10 लाख वोट भी नहीं जुटा पाई।
पीके के बड़े दावे और बड़ी चूकें :
चुनाव प्रचार के दौरान पीके ने कई बड़े दावे किए थे—
JDU 25 से ज्यादा सीट नहीं जीतेगी
अगर नीतीश कुमार दोबारा मुख्यमंत्री बने तो राजनीति छोड़ दूंगा
लड़ाई NDA और जनसुराज के बीच है
लेकिन नतीजों ने इन सभी दावों को गलत साबित कर दिया।
एनडीए ने प्रचंड बहुमत जीतकर सरकार बना ली और पीके की पार्टी मुख्य मुकाबले से ही बाहर हो गई।
उम्मीदवार चयन ने डुबोई नैया
स्वच्छ राजनीति का दावा करने वाली जन सुराज ने टिकट बांटने में कई विवादास्पद निर्णय लिए।
ADR रिपोर्ट बताती है कि जन सुराज के 231 प्रत्याशियों में से 108 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
इससे पार्टी की ‘साफ राजनीति’ वाली छवि धूमिल हुई और ग्रामीण क्षेत्रों में भरोसा नहीं बन पाया।
जन सुराज की हार के 6 सबसे बड़े कारण
- महिलाओं से कनेक्ट न होना
एनडीए की योजनाओं ने महिला वोटरों को मजबूती से अपने पाले में रखा।
इसके उलट जन सुराज की शराबबंदी खत्म करने की बात महिलाओं को रास नहीं आई।
- ग्रामीण वोटरों में पहचान की कमी
बिहार की 90% आबादी ग्रामीण है, लेकिन जन सुराज का प्रचार शहरी और डिजिटल तक सीमित रहा।
गांवों में पार्टी का सिंबल, चेहरा और संगठन—सब अनजान।
- बूथ संगठन की कमजोरी
कई जगह BLA तक नहीं मिले, कई उम्मीदवार अंतिम समय पर निष्क्रिय हो गए।
टिकट वितरण में पैराशूट उम्मीदवारों ने स्थानीय असंतोष बढ़ाया।
- ‘बीजेपी की बी-टीम’ की छवि
विपक्ष ने पीके को एनडीए का वोट-कटर बताया, जिससे संदेह बढ़ा और वोटर दूर हुए।
- सोशल मीडिया पर अत्यधिक निर्भरता
डिजिटल दुनिया की ‘हाइप’ गांवों में वोट में नहीं बदल सकी।
इन्फ्लुएंसर्स की चमक वास्तविक जमीन पर फीकी पड़ गई।
- शराबबंदी हटाने का वादा भी लोगों को नहीं लुभा पाया
प्रशांत किशोर ने कहा था कि अगर उनकी सरकार बनती है तो बिहार में लागू शराबबंदी को 1 घंटे के अंदर खत्म कर देंगे, लेकिन यह बड़ा वादा भी बिहार की जनता को आकर्षित नहीं कर सका।
खासकर महिलाओं में इस वादे का नकारात्मक असर पड़ा, क्योंकि शराबबंदी ने उन्हें घर-परिवार में राहत दी थी और वे इस मुद्दे पर एनडीए के साथ मजबूती से जुड़ी रहीं।
क्या अब पीके राजनीति छोड़ देंगे?
पीके ने कहा था कि अगर नीतीश कुमार दोबारा मुख्यमंत्री बने तो वे राजनीति छोड़ देंगे।
अब जबकि नतीजे साफ हैं और एनडीए भारी बहुमत से लौटा है, अब सबकी नजर पीके के वादे पर है।
NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

