
जामताड़ा(JAMTADA): कार्तिक पूर्णिमा की पावन संध्या पर गंगा तटों से लेकर हर शिवालय तक दीपों की ज्योति से जगमगाहट फैली है। देव दीपावली का अलौकिक महात्म्य अपने चरम पर है। इस वर्ष भी मिहिजाम स्टेशन रोड स्थित शिवालय और हनुमान मंदिर में देव दीपावली का दिव्य आयोजन श्रद्धा, संस्कृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम लेकर आया।
देव दीपावली का शास्त्रीय आधार — जब देवताओं ने किया था दीपदान
पुराणों में वर्णन है कि भगवान श्रीहरि विष्णु ने इस दिन त्रिपुरासुर का संहार करने वाले भगवान शिव की स्तुति की थी। स्कंद पुराण के अनुसार, त्रिपुरासुर नामक असुर ने तीन लोकों में आतंक फैला रखा था। तब भगवान शंकर ने कार्तिक पूर्णिमा की रात “त्रिपुर भेदन” कर ब्रह्मांड में धर्म की पुनः स्थापना की। उसी क्षण देवताओं ने दीप प्रज्वलित कर शिव की आराधना की और वह दिवस “देव दीपावली” कहलाया।
मिहिजाम शिवालय में देव दीपावली का अलौकिक नज़ारा
मिहिजाम स्टेशन रोड स्थित शिवालय परिषद मंदिर में इस अवसर पर भक्तों की अपार भीड़ उमड़ी। सायं होते ही मंदिर परिसर में दीपों की कतारें सजीं — हजारों दीपक जैसे भक्ति की भाषा बोल रहे हों। भगवान औढरदानी महादेव का दिव्य श्रृंगार सोने-चांदी के आभूषणों, पुष्पमालाओं और रुद्राक्षों से किया गया। गर्भगृह से निकलती धूप और दीप की सुगंध ने वातावरण को अलौकिक बना दिया।
मंदिर परिसर में झिलमिलाती दिव्य ज्योति का दर्शन श्रद्धालुओं के लिए किसी स्वप्नलोक से कम लहीं था। शिवलिंग पर गंगा जल की धारा प्रवाहित होती रही। वहीं भजन-कीर्तन की मधुर ध्वनि वातावरण में गूँजती रही — “हर हर महादेव, जय औढरदानी”।
गंगा, दीप और शिव — तीनों का संगम
शास्त्रों में गंगा को शिव की जटा में वास करने वाली कहा गया है। अतः कार्तिक पूर्णिमा के दिन जब दीपदान गंगा तट पर किया जाता है। तो उसका दार्शनिक अर्थ यह होता है — “ज्ञान का दीप अज्ञान के अंधकार को दूर करे। ” मिहिजाम शिवालय परिसर में भी श्रद्धालुओं ने यह मान्यता निभाते हुए शिवलिंग के चारों ओर दीपक जलाए और मनोकामना की।
ग्रंथों में देव दीपावली का महात्म्य
- स्कंद पुराण में लिखा है —
“त्रिपुरारिः प्रसन्नो यः, कार्तिके पूर्णिमे निशि। तस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते॥”
— अर्थात कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में त्रिपुरासुर का नाश करने वाले भगवान शिव के दर्शन से समस्त पापों का नाश होता है। - पद्म पुराण में कहा गया है कि देव दीपावली के दिन एक दीप जलाने से सहस्र दीपों का फल मिलता है।
- गरुड़ पुराण में वर्णन है कि इस दिन का दीपदान मृत्यु के भय से मुक्ति का मार्ग है।
भक्तिभाव से आलोकित हुआ शिवालय परिसर
शिवालय परिषद के पुजारी पंडित सुरेंद्र तिवारी ने बताया कि इस दिन किया गया दीपदान देवताओं को प्रसन्न करने वाला होता है। उन्होंने कहा — “भक्त जब हृदय में दीप जलाता है।तब वही सच्चा देव दीपावली का अर्थ है।”
भक्तों ने भगवान औढरदानी के समक्ष दूध, गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक किया। रात्रि आरती के समय मंदिर परिसर “हर हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा। चारों ओर दीपों का समुद्र फैला था। मानो धरती पर देवलोक उतर आया हो।
अध्यात्म और संस्कृति का संदेश
देव दीपावली केवल दीपों का उत्सव नहीं, बल्कि अहंकार पर आस्था की विजय का प्रतीक है। जैसे भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का विनाश कर देवताओं को भयमुक्त किया। वैसे ही यह पर्व मानव के भीतर के अंधकार को मिटाने का संदेश देता है।
अंतिम झलक — जब ज्योति बनी साधना
मिहिजाम शिवालय का वातावरण देर रात तक भक्तिमय बना रहा। दीपों की लौ, आरती की घंटियों की गूंज और भक्तों की आस्था की तरंगों ने इस पावन पर्व को अविस्मरणीय बना दिया। हर दीप जैसे कह रहा था —
अंधकार मिटे, शिव का प्रकाश फैले।”
देव दीपावली की यह अलौकिक रात मिहिजाम में श्रद्धा और संस्कृति की ज्योति बनकर सदा अमर हो गई।
NEWSANP के लिए जामताड़ा से आर पी सिंह की रिपोर्ट

