जामताड़ा(JAMTADA) 22 अप्रैल:भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने आज सुबह 8:07 बजे अपने X (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए एक ऐतिहासिक उदाहरण साझा किया है। उन्होंने पूर्व न्यायाधीश बहरुल इस्लाम की राजनीतिक और न्यायिक नियुक्तियों को लेकर कांग्रेस की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके इस पोस्ट ने सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त ट्रेंड कर रहा है।
पोस्ट में कांग्रेस पर निशाना:
- बहरुल इस्लाम की राजनीतिक शुरुआत:
- 1951 में कांग्रेस की सदस्यता।
- 1962 और 1968 में दो बार राज्यसभा सदस्य बनाया गया।
- राज्यसभा से सीधे न्यायपालिका में नियुक्ति:
- बिना इस्तीफा दिए 1972 में हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया।
- 1979 में असम हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने।
- सेवानिवृत्ति के बाद सुप्रीम कोर्ट में वापसी:
- जनवरी 1980 में रिटायर होने के बाद दिसंबर 1980 में सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिए गए।
- इंदिरा गांधी पर लगे सभी भ्रष्टाचार के मुकदमों को रद्द किया।
- फिर से कांग्रेस से राज्यसभा में वापसी:
- सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्ति के बाद 1983 में तीसरी बार कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सदस्य बना दिए गए।
निशिकांत दुबे का व्यंग्यात्मक सवाल:
“मैं कुछ नहीं बोलूँगा?
पोस्ट के अंत में डॉ. दुबे ने यह वाक्य जोड़कर यह इशारा किया कि तथ्यों को जनता के समक्ष रखना ही काफी है — इसके लिए किसी विशेष टिप्पणी की आवश्यकता नहीं।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया – आंकड़ों में प्रभाव:
- 358K व्यूज़ (3.58 लाख)
- 7,055 रीपोस्ट
- 373 (Quotes) – 17.5K लाइक
- 522 बुकमार्क
पोस्ट के कुछ ही घंटों में इसे लाखों बार देखा गया और हजारों लोगों ने इसे साझा किया। यह न केवल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना, बल्कि पत्रकार, वकील, और शिक्षाविद भी इस पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
प्रसंग का ऐतिहासिक महत्व:
बहरुल इस्लाम के कार्यकाल के सबसे उल्लेखनीय पहलुओं में से एक था —
1977 के बाद इंदिरा गांधी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का निस्तारण।
इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में उनके निर्णय ने तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम को बड़ी दिशा दी थी। कांग्रेस के इस ‘इनाम’ के तौर पर उन्हें राज्यसभा भेजे जाने को डॉ. दुबे ने “तुष्टिकरण और निष्ठा की राजनीति” करार दिया है।
राजनीतिक विश्लेषण:
डॉ. निशिकांत दुबे का यह पोस्ट ऐसे समय पर आया है जब कांग्रेस ‘संविधान बचाओ’ जैसे नारों के जरिए राजनीतिक माहौल बना रही है। दुबे ने इस ऐतिहासिक प्रकरण को सामने रखकर यह बताने की कोशिश की है कि कांग्रेस का ‘संविधान प्रेम’ वास्तव में स्वार्थ और सत्ता संतुलन की राजनीति रहा है।
निष्कर्ष:
डॉ. निशिकांत दुबे का यह पोस्ट न केवल एक राजनीतिक टिप्पणी है, बल्कि एक ऐतिहासिक संदर्भ के माध्यम से सत्ता के चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगाने की कोशिश भी है। इसे सोशल मीडिया पर मिल रही व्यापक प्रतिक्रिया भाजपा समर्थकों के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी एक विचारणीय दस्तावेज बना रही है।
NEWSANP के लिए धनबाद से आर पी सिंह की रिपोर्ट

