झारखंड पुलिस का इकबाल बुलंद, बाबूलाल मरांडी के भाई-बेटे के ह’त्यारे सहित तीन खूंखार की कहानी खत्म…

झारखंड पुलिस का इकबाल बुलंद, बाबूलाल मरांडी के भाई-बेटे के ह’त्यारे सहित तीन खूंखार की कहानी खत्म…

राँची(RANCHI): झारखंड के DGP अनुराग गुप्ता से नक्सलियों, स्प्लिंटर और अपराधियों की कमर की रीढ़ तोड़ देने की खुली छूट मिलने के बाद से IG ऑपरेशन माइकल राज की देखरेख में झारखंड पुलिस का इकबाल बुलंद है। नक्सलियों के मूवमेंट को लेकर मिली खबर पर हजारीबाग के गोरहर के जंगलों में घुसी फोर्स के जांबाज जवानों ने आज अपना दम दिखाया। जंगल में हुए एनकाउंटर में सुरक्षाबलों ने तीन शीर्ष नक्सलियों को मार गिराया है। मारे गये नक्सलियों में एक करोड़ का इनामी भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय समिति का सदस्य प्रवेश दा उर्फ सहदेव सोरेन, 25 लाख रुपये का इनामी सैक सदस्य रघुनाथ हेम्ब्रम उर्फ शिबु मांझी और 10 लाख रुपये का इनामी जोनल सदस्य बिरसेन गंझु उर्फ खेलावन गंझु शामिल है। इनके मारे जाके बाद सर्च ऑपरेशन के दरम्यान फोर्स को जंगल से तीन एके-47, एक-47 की 63 पीस जिंदा गोलियां,छह पीस भरा हुआ मैगजीन, तीन पीस मैगजीन पाउच, एक टैब, इलक्ट्रानिक उपकरण, कैश, माओवादी का पर्चा, छह पीस सिरिंज / इंजेक्शन, ग्रेनेड का स्पीलीन्टर, स्प्रिंग और लीवर इत्यादि मिले हैं। सभी सामानों को जब्त कर लिया गया है। DGP अनुराग गुप्ता ने हजारीबाग में प्रेस कांफ्रेस कर बताया कि इन तीनों नक्सलियों के खात्मे के बाद लुगु पहाड़, झुमरा और पारसनाथ इलाका अब पूरी तरह नक्सल मुक्त हो चुका है और बाकी क्षेत्रों को भी जल्द नक्सल प्रभाव से मुक्त किया जायेगा। प्रेस कांफ्रेंस के दौरान IG STF अनूप बरथरे, IG CRPF साकेत सिंह, IG अभियान माइकल राज और हजारीबाग पुलिस कप्तान अंजनी अंजन मौजूद रहे।

एक करोड़ का इनामी सहदेव सोरेन : चिलखारी नरसंहार में बाबूलाल के भाई और बेटे समेत 20 लोगों की नृशंस हत्या कर मचा दिया था कोहराम
झारखंड की धरती ने आखिरकार उस खूंखार माओवादी का अंत देख लिया, जिसने एक समय पूरे राज्य को दहशत में डाल रखा था और जिसने पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के भाई मुनुलाल मरांडी और बेटे समेत 20 लोगों की निर्मम हत्या कर पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया था। वह था… प्रवेश दा उर्फ सहदेव सोरेन, जिसकी मुड़ी पर 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। साल 2007 में गिरिडीह जिले के चिलखारी गांव में हुई वारदात आज भी झारखंड की राजनीति और समाज की यादों में काले दिन के तौर पर दर्ज है। बाबूलाल मरांडी के छोटे भाई मुनुलाल मरांडी और बेटे समेत 20 ग्रामीणों को गोलियों से भून डाला गया। यह हत्याकांड न सिर्फ झारखंड बल्कि पूरे देश के लिए झकझोर देने वाला था।इनता ही नहीं उसके खिलाफ अलग-अलग थानों की पुलिस फाइल में 30 संगीन मामले दर्ज हैं। उनमें से कुछ चर्चित घटनएं हैं…

2004-05 में गिरिडीह के पचम्बा में होमगार्ड कैम्प पर नक्सलियों ने धावा बोला। एक ही बार में 183 रायफल लूट ली गईं। यह झारखंड में नक्सलियों की सबसे बड़ी हथियार लूट की वारदात मानी जाती है।
2006 में बिहार के बांका में सेखर थाना पर हमला कर नक्सलियों ने हथियार लूट लिए। यह घटना पुलिस तंत्र को सीधी चुनौती थी।
2007 में गिरिडीह का चिलखारी नरसंहार को अंजाम दिया, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के छोटे भाई मुनुलाल मरांडी और बेटे समेत 20 ग्रामीणों की हत्या कर दी गई। इस घटना ने पूरे राज्य को हिला दिया और नक्सली आतंक की जड़ें और गहरी हो गईं।
2008 में मुंगेर के ऋषिकुंड में नक्सलियों ने पर्यटक स्थल पर हमला कर 4 सैप जवानों की हत्या कर दी और हथियार लूट लिए। आम जनता के बीच खौफ और ज्यादा बढ़ गया।
2011 में लखीसराय में पुलिस पार्टी पर घात लगाकर बड़ा हमला किया गया। इसमें 10 पुलिसकर्मी शहीद हुए और करीब 35 हथियार लूट लिए गए।
2013 की 30 नवंबर को मुंगेर में 30 नवंबर को जमालपुर और रतनपुर के बीच इंटरसिटी ट्रेन को निशाना बनाया गया। तीन सरकारी रेल पुलिसकर्मी मौके पर ही मारे गए।
2014 की 10 अप्रैल को मुंगेर के गंगटामें नक्सलियों ने एम्बुश लगाकर हमला किया। इसमें 131 बटालियन के 2 जवान शहीद हुए और 9 घायल हुए।
2018 की 17 सितंबर को जमुई के बरहट में नक्सलियों ने एसएसबी जवान सिकंदर यादव को पुलिस मुखबिरी के शक में गोली मार दी।
2021 की 23 दिसंबर को मुंगेर के अजिमगंज पंचायत में नव निर्वाचित मुखिया परमानंद टुड्डू की सड़क पर हत्या कर दी गई।
आज, जब उसी कुख्यात हमलावर का खात्मा हुआ है, तो इसे सुरक्षा बलों की ऐतिहासिक जीत माना जा रहा है।

25 लाख का इनामी रघुनाथ हेम्ब्रम : सुरक्षाबलों की गाड़ियां विस्फोट कर उड़ाने में था माहिर
एनकाउंटर में मारे गए दूसरे नक्सली का नाम है रघुनाथ हेम्ब्रम। रघुनाथ को नक्सली दुनिया में शिबु मांझी, निर्भय, बिरसेन और चंचल नामों से भी जाना जाता था। झारखंड सरकार ने उसकी मुड़ी पर 25 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। रघुनाथ गिरिडीह जिले के डुमरी थाना क्षेत्र के जरिडीह गांव का रहने वाला था। वह साल 1993 में माओवादी संगठन में शामिल हुआ था और बोकारो, हजारीबाग और गिरिडीह में उसका आतंक था। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, उसके खिलाफ 58 मामले दर्ज थे। उनमें से कुछ चर्चित घटनाएं हैं…

1998 में आम चुनाव के दौरान झुमरा पहाड़ पर बीएसएफ की गाड़ी को विस्फोट से उड़ाया गया, जिसमें कई जवान शहीद हुए।
उसी साल बोकारो के चतरो चट्टी में पुलिस शिविर को उड़ा दिया गया।
1998 में ही गिरिडीह जिले के विष्णुगढ़ थाना क्षेत्र के गोदनीटांड़ गांव में सात लोगों की हत्या की।
2000 के विधानसभा चुनाव के समय बहने जंगल में पुलिस की गाड़ी को निशाना बनाया, जिसमें एक जवान शहीद हुआ।
1 जून 2006 को चाईबासा जिले के किरूबुरू इलाके में पुलिस की गाड़ी पर बड़ा हमला किया गया, जिसमें 12 पुलिसकर्मी शहीद हुए।
रघुनाथ हेम्ब्रम लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बना हुआ था। उसके मारे जाने से पुलिस को बड़ी सफलता मिली है और माओवादी संगठन को गहरा झटका लगा है।

एनकाउंटर में मारे गए दूसरे नक्सली का नाम है बिरसेन गंझु। बिरसेन गंझु को लोग खेलावन गंझु, रामखेलावन और छोटा बिरसेन के नाम से भी जानते थे। झारखंड सरकार ने उसकी मुड़ी पर 10 लाख रुपये का ईनाम रखा था। वह माओवादी संगठन भाकपा (माओवादी) के जोनल सदस्य था। उनके पिता का नाम सोमर गंझु उर्फ गुरुजी, उर्फ भंडोरी गंझु है, जो झारखंड के हजारीबाग जिले के केरेडारी थाना क्षेत्र के बकचुंबा गांव के रहने वाले हैं। बिरसेन गंझु झारखंड के बोकारो, हजारीबाग और गिरिडीह जिले में काफी एक्टिव था। उसने अपना नक्सली सफर साल 1995-96 में MCCI (माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया) संगठन से शुरू किया था। बाद में यह संगठन भाकपा (माओवादी) में विलय हो गया और तब से वे इसी संगठन से जुड़ा रहा। उसके खिलाफ पुलिस फाइल में अब तक 36 आपराधिक मामले दर्ज हैं। उनमें से कुछ चर्चित घटनाएं हैं…

साल 2015 – जब वह सारंडा से लौट रहा था, तब तैमारा घाटी में पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई।
02 जनवरी 2019-20 – राजडेरवा में पुलिस के साथ मुठभेड़ में शामिल।
मार्च-अप्रैल 2019-20 – फिर से राजडेरवा में मुठभेड़ हुई, जिसमें एक सीआरपीएफ जवान गोली लगने से घायल हुआ था।
जून-जुलाई 2022 – डाकासहढ़ीम में पुलिस से भिड़ंत में शामिल।
24 जनवरी 2022 – धमधख्या इलाके में पुलिस से मुठभेड़ की घटना का हिस्सा रहा।

लगभग दो दशकों तक चली इस खूनी टाइमलाइन में दर्जनों जवान, निर्दोष ग्रामीण और जनप्रतिनिधि मारे गए। यह वही इतिहास है, जिसका अंत 15 सितंबर 2025 को हजारीबाग में प्रवेश दा और उसके दो साथियों के खात्मे के साथ हुआ। प्रवेश दा और उसके साथियों के खात्मे के साथ नक्सलियों की वह पीढ़ी भी खत्म हो गई, जिसने कभी पूरे झारखंड-बिहार की धरती को खून और बारूद से रंग दिया था। अब, जब बंदूकें खामोश हो चुकी हैं, तो लोगों की आंखों में डर की जगह उम्मीद दिख रही है।

NEWSANP के लिए रांची से ब्यूरो रिपोर्ट

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