जामताड़ा(JAMTADA): मानव सभ्यता तब ही सुरक्षित रह सकती है। जब किसी भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत, जीवंत और संवेदनशील हो : —क्योंकि “जान है तो जहान है” जैसे मुहावरे यूं ही नहीं बने। लेकिन जामताड़ा सदर अस्पताल की स्थिति इस मूल सत्य को चुनौती देती नजर आ रही है। यह वही अस्पताल है जिसे जिले की स्वास्थ्य सेवा का मेरूदंड माना जाता है। किंतु उसकी बदहाली आज “ऊंट के मुंह में जीरा” जैसी व्यवस्था का परिचय दे रही है।
इसी कड़ी में रविवार को भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष सह भाजपा नेत्री बबीता झा ने अस्पताल का दौरा किया। जिसने स्वास्थ्य मंत्री की प्राथमिकताओं पर जहां यक्ष सवाल पूछे हैं। वहीं वर्तमान स्वास्थ्य नीतियों पर सरकार की जवाबदेही पर संदेह उठा दिया है।
बबीता ने अस्पताल की वास्तविकता को सड़क पर ला दिया है।
अस्पताल पहुंचते ही बबीता झा को वह दृश्य दिखाई दिया। जिसे देखकर कोई भी जनप्रतिनिधि चिंतित हो सकता है। गंदगी, दुर्गंध, डॉक्टरों की अनुपस्थिति, सफाई व्यवस्था की चरमराहट और मरीजों की लाचारी—ये सब उस स्वास्थ्य प्रणाली की पोल खोल रहे थे। जिसे राज्य सरकार दावा करती है कि वह “सरकार आपके द्वार” से लेकर “बेहतर स्वास्थ्य सेवा” तक का संकल्प लिए हुए है।
उन्होंने भर्ती मरीजों के बीच फल एवं आवश्यक सामग्री का वितरण किया। लेकिन साथ ही बेबाक स्वर में स्वास्थ्य मंत्री पर निशाना साधते हुए कहा—
यह कितनी विडंबना है कि जिस क्षेत्र से राज्य के स्वास्थ्य मंत्री आते हैं। उसी क्षेत्र का सदर अस्पताल सबसे बदहाल है।”
वेद-पुराण की दृष्टि मे वर्तमान स्वास्थ्य व्यवस्था
बबीता झा ने स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि स्वास्थ्य सेवा “धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष” में से ‘धर्म’ की श्रेणी में आती है।
वेदों में उल्लेख मिलता है कि
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”
अर्थात् शरीर ही सभी पुरुषार्थों की साधना का प्रथम साधन है।
जब शरीर की रक्षा करने वाला तंत्र ही बीमार हो जाए। तो समाज के रोगमुक्त होने की आशा कैसे की जा सकती है?
पुराणों में एक प्रसंग आता है कि देवताओं की शक्ति तब क्षीण हो गई थी । जब आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरि से मिलने वाला स्वास्थ्य-ज्ञान उपेक्षित होने लगा। आज जामताड़ा की स्थिति भी कुछ ऐसी ही दिखती है।ज्ञान, संसाधन और व्यवस्था मौजूद है। लेकिन उपेक्षा और प्रशासनिक सुस्ती ने सबको निष्प्रभावी बना दिया है।
खून की कमी से जूझती बुजुर्ग महिला—व्यवस्था मौन दर्शक
निरीक्षण के दौरान बबीता झा जिस बुजुर्ग महिला से मिलीं। उसने पूरे सिस्टम की असफलता को उजागर कर दिया।
20 नवंबर को खून की कमी के कारण भर्ती हुई इस महिला को अब तक रक्त उपलब्ध नहीं कराया गया।
न डॉक्टरों की स्पष्ट सलाह। न उपचार की रफ्तार और न मानवीय संवेदना—इन सबने यह स्पष्ट कर दिया है कि अस्पताल “राम भरोसे” चल रहा है।
स्वास्थ्य मंत्री पर सीधा हमला: “जिम्मेदारी से भागना बंद करें मंत्री”
बबीता झा ने कहा कि जामताड़ा सदर अस्पताल आज जिस हालत में है। वह राजकीय स्वास्थ्य ढांचे की पूरी तरह से विफलता को दर्शाता है।
उन्होंने कड़ा बयान देते हुए कहा—
सरकार की लापरवाही किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यदि स्थिति नहीं सुधरी। तो भाजपा सड़क से सदन तक संघर्ष करेगी।”
मरीजों की पीड़ा—न्याय की पुकार बना हुआ है
अस्पताल में मौजूद मरीजों और उनके परिजनों ने भी भाजपा नेत्री के समक्ष अपनी समस्याएँ खुलकर रखीं—
- डॉक्टरों की अनुपस्थिति
- दवाओं की कमी
- जांच सेवाओं की धीमी गति
- सफाई की बदहाली
- जरूरी उपचार तक में देरी
लोगों ने स्पष्ट कहा कि उन्हें अपेक्षित स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल रही है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है।
यहां की स्थिति पर सबसे उपयुक्त मुहावरा यही हो सकता है—
घर का भेदी लंका ढाए।”
स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिला का अस्पताल ही बदहाल हो। तो यह राज्य की स्वास्थ्य नीति को आंतरिक रूप से खोखला करने जैसा है।
इसका समाधान संवेदनशीलता से ही अपेक्षित
बबीता झा ने मरीजों को भरोसा दिलाया कि वह इस मुद्दे को पार्टी और सरकार स्तर पर मजबूती से उठाएंगी। ताकि जामताड़ा के लोगों को वह स्वास्थ्य सेवा मिल सके। जिसकी उन्हें संवैधानिक और मानवीय दोनों स्तर पर हक है।
मानव सभ्यता की सुरक्षा स्वस्थ, सशक्त और सुचारु स्वास्थ्य व्यवस्था पर ही टिकती है।
जामताड़ा सदर अस्पताल की वर्तमान स्थिति यह संदेश दे रही है कि यदि अब भी सुधार नहीं हुआ। तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है।
अब निर्णय सरकार के पाले में है—
क्या वह स्वास्थ्य तंत्र को पुनर्जीवित कर मानवता की रक्षा करेगी। या फिर बदहाली के इस अंधकार को और गहरा होने देगी?
NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

