जामताड़ा(JAMTADA): एक समय था जब जामताड़ा का नाम शांत कस्बों में लिया जाता था। आज तस्वीर बदली हुई है। पुलिस अधीक्षक राजकुमार मेहता के नेतृत्व में जिले की सड़कों से लेकर गलियों तक सुरक्षा का ऐसा घेरा खड़ा किया गया है। जो पहली नजर में भरोसा जगाता है। दिन-रात गश्त करती पुलिस, अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस महिला और पुरुष टाइगर मोबाइल और लाल-नीली बत्ती के साथ गूंजता सायरन—ये सब मानो यह संदेश देते हैं कि कानून व्यवस्था पूरी तरह मुस्तैद है।
इस सक्रियता का असर भी दिखा है। कई जटिल आपराधिक मामलों की परतें खुली हैं, अपराधियों तक पुलिस पहुंची है और आम नागरिकों के मन में यह भरोसा बना है कि पुलिस सतर्क है। शाम ढलते ही सायरन की आवाज सुनकर लोगों को लगता है कि कोई तो है जो निगरानी कर रहा है।
लेकिन इसी सुरक्षा कवच के भीतर कुछ अनसुलझे सवाल भी पल रहे हैं। हकीकत यह है कि तमाम प्रयासों के बावजूद अपराध पूरी तरह थमा नहीं है। दर्जनों ऐसे मामले हैं, जो आज भी पुलिस फाइलों में चुनौती बनकर मौजूद हैं। सीमित संसाधन, मानवबल और बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच पुलिस प्रशासन को कई बार व्यवहारिक समझौते करने पड़ते हैं। और जब ऐसा होता है। तो उसका असर सीधे समाज पर पड़ता है—कभी डर के रूप में, कभी अविश्वास के रूप में।
इन्हीं हालातों के बीच जामताड़ा में हाल के दिनों में एक नई व्यवस्था ने लोगों की नींद उड़ा दी है। मध्यरात्रि में सड़कों पर गूंजती लंबी सिटी, अंधेरे में सड़क पर पटकते डंडे की आवाज और अचानक दिखते विदेशी गार्ड—इन सबने सुरक्षा के बजाय आशंका का माहौल पैदा कर दिया है। कई लोगों का कहना है कि यह आवाजें सुरक्षा का संकेत कम और अनहोनी का पूर्वाभास ज्यादा लगती हैं।
लोगों की स्मृति में अभी भी वे घटनाएं ताजा हैं, जब जिले के सीमावर्ती इलाकों में इसी तरह की गार्ड व्यवस्था के दौरान गंभीर वारदातें हुई थीं। उन घटनाओं की गुत्थी आज तक पूरी तरह नहीं सुलझ सकी। ऐसे में वही प्रयोग दोहराया जाना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है—क्या प्रशासन अतीत से सबक नहीं ले रहा, या फिर किसी मजबूरी में यह रास्ता चुना गया है?
स्थानीय चर्चाओं में एक और पहलू उभरकर सामने आ रहा है। इन विदेशी गार्डों की पृष्ठभूमि, प्रशिक्षण और जवाबदेही को लेकर स्पष्ट जानकारी का अभाव है। लोगों को यह व्यवस्था जामताड़ा की सामाजिक प्रकृति से मेल नहीं खाती दिखती। एक शांत जिले में, जहां स्थानीय लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं, वहां अचानक बाहरी सुरक्षा योजना संस्कृति का प्रवेश असहजता पैदा कर रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या झारखंड और स्वयं जामताड़ा में ऐसे लोग नहीं हैं, जिन्हें इस तरह की रात्रि सुरक्षा में लगाया जा सके? क्या स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ते हुए सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत नहीं किया जा सकता था? इन सवालों के जवाब फिलहाल हवा में तैर रहे हैं।
इस पूरे विमर्श में नेपाली नागरिकों की वर्तमान परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रोजगार की तलाश में भारत आने वाले अनेक नेपाली युवा निजी सुरक्षा एजेंसियों से जुड़कर अलग-अलग राज्यों में काम कर रहे हैं। यह उनकी आर्थिक मजबूरी और क्षेत्रीय वास्तविकता है। इस सच्चाई को संवेदनशीलता के साथ समझना जरूरी है। लेकिन साथ ही यह भी उतना ही जरूरी है कि सुरक्षा जैसी गंभीर व्यवस्था में स्थानीय समाज की भावना, भरोसा और अनुभवों को प्राथमिकता दी जाए।
जामताड़ा के लोग सुरक्षा के विरोधी नहीं हैं। वे चाहते हैं कि अपराध पर लगाम लगे, कानून का डर बने और पुलिस मजबूत हो। लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि सुरक्षा व्यवस्था भरोसे पर आधारित हो, भय पर नहीं। विदेशी गार्डों की भूमिका, उनके अधिकार, प्रशिक्षण और जवाबदेही को लेकर यदि स्पष्ट नीति और पारदर्शिता नहीं लाई गई, तो सुरक्षा के नाम पर पैदा हुआ डर प्रशासन के लिए ही चुनौती बन सकता है।
अब सवाल सिर्फ सुरक्षा का नहीं, संदेश का भी है—क्या जामताड़ा को सुरक्षित दिखाना है, या सचमुच सुरक्षित बनाना है? यही सवाल आज हर गूंजती सिटी और हर पटकते डंडे के साथ लोगों के मन में उठ रहा है।
NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

