जामताड़ा जिला परिषद : 2010 से अब तक का राजनीतिक सफर — सत्ता, अविश्वास और सीख की रामकथा…

जामताड़ा जिला परिषद : 2010 से अब तक का राजनीतिक सफर — सत्ता, अविश्वास और सीख की रामकथा…

जामताड़ा(JAMTADA): जामताड़ा जिला परिषद की राजनीति बीते पंद्रह वर्षों में केवल विकास योजनाओं या प्रशासनिक निर्णयों तक सीमित नहीं रही। बल्कि यह सत्ता के चरित्र, जनादेश की कसौटी और जनप्रतिनिधियों के आचरण की परीक्षा भूमि बन चुकी है। वर्ष 2010 से लेकर आज तक का यह सफर किसी साधारण राजनीतिक यात्रा से अधिक। एक ऐसी कथा प्रतीत होती है, जिसमें “सत्ता सिंहासन” पाते ही कई पात्रों का स्वभाव बदलता दिखा — ठीक वैसे ही जैसे रामायण में सत्ता और धर्म के बीच की रेखा बार-बार खींची गई है।

जब-जब भाजपा पृष्ठभूमि से अध्यक्ष बनीं, अपेक्षाएँ अधूरी रहीं

जामताड़ा जिला परिषद के इतिहास पर यदि निष्पक्ष दृष्टि डाली जाए। तो एक तथ्य बार-बार उभर कर सामने आता है —
जब-जब भाजपा पृष्ठभूमि से जिला परिषद अध्यक्ष बनीं, तब-तब मतदाताओं की अपेक्षाएँ अधूरी रह गईं।

भाजपा की सुकुमुनी हांसदा हों या हाल की राधा रानी, दोनों ही उदाहरण इस कथन की पुष्टि करते हैं। सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने से पहले जिन मुद्दों पर आक्रामकता दिखाई गई। जिन जनसरोकारों को लेकर आंदोलनात्मक राजनीति हुई — कुर्सी मिलते ही वही मुद्दे फाइलों में दबते चले गए।

रामायण में कहा गया है —
राजा भव सदा धर्मात्मा, प्रजा सुखी तबहि भव।”
अर्थात राजा का धर्मपरायण होना ही प्रजा के सुख का कारण बनता है।
लेकिन जामताड़ा में भाजपा समर्थित अध्यक्षों के कार्यकाल में यह भाव व्यवहार में कम और भाषणों में अधिक दिखा।

सत्ता मिलते ही बदला रहन-सहन, भाषा और व्यवहार

स्थानीय राजनीति में यह बात अब किसी से छिपी नहीं रही कि भाजपा समर्थित जनप्रतिनिधियों का रहन-सहन, बोलचाल और व्यवहार सत्ता मिलते ही बदलता रहा है
संगठन से दूरी, कार्यकर्ताओं से संवाद की कमी और जनता से औपचारिकता — यह क्रम लगभग हर बार दोहराया गया।

जनप्रतिनिधि बनने के बाद जन का प्रतिनिधि बनने के बजाय,
जात-पात का प्रतिनिधि” बनने की होड़ दिखाई देने लगती है —
यानी सत्ता के गलियारों में दिखना, अधिकारियों के साथ तस्वीरें और मंचों पर उपस्थिति, जबकि गांव-टोला-मोहल्ला पीछे छूट जाता है।

कमोबेश यही स्थिति जिला परिषद के साथ-साथ नाला और जामताड़ा विधानसभा क्षेत्रों में भी देखने को मिली है। जनता सवाल पूछती है। जो जवाब सत्ता की दीवारों से टकराकर लौट आते हैं।

राधा रानी : सुकुमुनी हांसदा के बाद दूसरा उदाहरण

2024 में भाजपा की राधा रानी का जिला परिषद अध्यक्ष बनना पार्टी के लिए अवसर था। यह अवसर भी भरोसे में नहीं बदल सका।
लिहाजा उनके खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव और उसका लगभग सर्वसम्मति से पारित होना यह दर्शाता है कि परिषद के भीतर ही नेतृत्व पर भरोसा नहीं बचा था।

यह ठीक वैसा ही दृश्य है। जैसा रामायण में रावण के दरबार में दिखाई देता है —
जहां सत्ता तो है। लेकिन विश्वास नहीं। शक्ति तो है, ‌लेकिन समर्थन नहीं।

कांग्रेस की वापसी : दीपिका बेसरा के रूप में नया अध्याय

राधा रानी के हटने के बाद जिला परिषद अध्यक्ष पद पर कांग्रेस की दीपिका बेसरा प्रवल दावेदार हैं। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है।
यह संदेश है कि कांग्रेस अपनी पिछली असफलताओं से सबक लेती दिखाई दे रही है

विरोध के बावजूद कांग्रेस का समर्थक आधार बढ़ता गया है।
एक ओर जहां भाजपा की भरी झोली फटकर बिखरती दिख रही है।
वहीं कांग्रेस की झोली में जनाधार बार-बार जुड़ता नजर आ रहा है।

यह स्थिति रामायण के उस प्रसंग की याद दिलाती है। जहां विभीषण सच्चाई के साथ खड़ा होकर अंततः स्वीकार्यता प्राप्त करता है —
धर्म के साथ खड़ा व्यक्ति भले अकेला हो, लेकिन अंततः वही स्थायी होता है।”

व्यंग्य भी जरूरी है…

जामताड़ा की राजनीति पर व्यंग्य करें तो इतना कहना गलत नहीं होगा कि
कुछ नेता चुनाव के समय हनुमान बन जाते हैं —
हर गली-मोहल्ले में छलांग, हर मंच पर गदा,
लेकिन सत्ता मिलते ही कुंभकर्णी नींद में चले जाते हैं।

जनता तब सवाल पूछती है —
“हमने प्रतिनिधि चुना था या प्रतिनिधित्व का भ्रम?”

अविश्वास भी लोकतंत्र का हिस्सा

जामताड़ा जिला परिषद की यह पूरी यात्रा यह बताती है कि
अविश्वास कोई विघटन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की चेतावनी है।

जहां भाजपा समर्थित नेतृत्व बार-बार उस घंटी को नजरअंदाज करता रहा,
वहीं कांग्रेस ने उसे सुनने और समझने की कोशिश की है।

अब देखना यह है कि दीपिका बेसरा फिर से अध्यक्ष बनेगी। जिनके नेतृत्व में कांग्रेस इस विश्वास को कितना निभा पायगी,
क्योंकि रामायण भी यही सिखाती है —
सत्ता नहीं, चरित्र स्थायी होता है।”

जामताड़ा की जनता आज भी उसी चरित्र की तलाश में है।

NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

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