रांची(RANCHI): सियासत की बिसात पर एक सितारा झारखण्ड चुनाव में झिलमिला रहा. उसकी बातों को सुनने के लिए लोगों का हुज़ूम उमड़ पड़ता है. झारखण्ड का आम आवाम बड़ी तस्सली और उम्मीद भरी निगाहों से देखता है. इसके पीछे वजह और कुछ नहीं बल्कि आम लोग बस अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने की ख्वाहिश पाले हुए हुए. इनमे ज्यादातर लोग वो है, जो झारखण्ड बनने के बाद, आज भी हाशिए पर और उनकी उम्मीदें शायद कहीं न कहीं आज भी पूरी नहीं बल्कि अधूरी ही दिखती है, जो बेजार और सूनी ही दिखलाई पड़ती है.हमारे इस लेख में जयराम महतो की बात हो रही है.
जो विधानसभा चुनाव में एक सनसनी बने हुए है और उनकी पार्टी केची छाप यानि JLKM काफ़ी सुर्खियां बटोर रही है.जयराम दो जगह से चुनाव लड़ रहें है एक डुमरी और दूसरा बेरमो विधानसभा. इन दोनों जगहों पर उनके चुनाव लड़ने पर कई प्रश्न तो उभर रहें है, कि आखिर दो जगह से चुनाव लड़ने की असली वजह क्या है? एकतरफ उनके समर्थन में भीड़ भी उनको मिलती दिखलाई पड़ती है. आखिर ये हवा है या हकीकत ये तो चुनाव के बाद ही मालूम पड़ेगा.बेरमो में मौज़ूदा विधायक और कांग्रेस उम्मीदवार कुमार जयमंगल सिंह और बीजेपी प्रत्याशी रविंद्र पाण्डेय के खिलाफ उनके तेवर तल्ख़ हैं.
उनका सरेआम कहना हैं की अगर आप झारखंडी हैं तो इन्हें वोट न दें, क्योंकि ये दोनों एक गया और दूसरे औरंगाबाद से आए हैं. बेशक वोट उन्हें (जयराम ) न दें, अपना वोट नोटा में दे दें.सवाल यही है कि आखिर ये कैसी बात जयराम बोल रहें है. क्या उनकी ये बात नफरत को दर्शाती है?. और उनका ऐसा कहना उचित, वाज़िब और प्रासंगिक चुनाव में दिखलाई पड़ती है?सवाल आम मतदाताओं के बीच यही पसरा हैं की क्या ये चुनाव बाहरी बनाम भीतरी की लड़ाई का अखड़ा बन गया हैं? क्या ये चुनाव किसी दल, नेता, विकास, रोजगार से ऊपर उठकर बाहरी -भीतरी का मुद्दा सबसे अहम हो गया हैं. क्या इस बाहरी -भीतरी का खेल इस विकास और पिछड़ेपन के असल मुद्दे से भी बड़ा और विकराल है? हालंकि जयराम इसे बाहरी -भीतरी की बात न मानकर झारखण्ड की अस्मिता और गर्व से जोड़ते हैं.ये याद रखने की बात हैं और समझने की बात हैं कि आज झारखण्ड अपने वजूद में आने के 25 वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी में हैं.इस दरमियान पहले के चुनावों में भी इस तरह के बाहरी -भीतरी के मसले नेताओं ने खूब उछाले और बयार बनायी . लेकिन, क्या हश्र हुआ? और झारखण्ड के आम आवाम के बीच ये बाते कितनी टिकी और असरकारी साबित हुई . इसका सीधा स जवाब ये है कि झारखण्ड की जनता ने इसे साफ तौर से नकार दिया. लड़ने -बाँटने की तमाम साजिशों और कोशिशों को किनारे कर दिया.
आज आम आवाम इन बातों से ठगा ही महसूस करता है.जयराम महतो अपने भाषणों में खासकर इन चीज़ों का जिक्र करते है. लेकिन, उनकी बातों पर अमल जनता कितना करेगी ये तो चुनाव के परिणाम ही बातएंगे.क्योंकि लोकतंत्र और लोकशाही की असली मालिक तो जनता ही होती है.ये हमे याद रखना चाहिए, बड़े अरमानों से झारखण्ड का निर्माण हुआ और इसके लिए कइयों ने कुर्बानियां दी. लेकिन सवाल यही है कि क्या ये अरमान अलग राज्य बनने के बाद पूरे हुए. और जिन नेताओं ने लोगों से वादा किया था. उसे पूरा किया. हकीकत ये है कि इन ढाई दशक में झारखण्ड का सियासी परिदृश्य ही बदल गया. लेकिन, जितनी सियासी हिचकोले यहां के सियासतदा ने दिए और जो बदनामी इस खूबसूरत प्रदेश के माथे पर चस्पा की. शायद इसे बताने की जरुरत हो, झारखण्ड को तो लूटखंड का नाम दे दिया गया. आज भी भ्रष्टाचार के चलते कितने नेता और मुलाजिम सलाखों के पीछे हैं.तक़रीबन पच्चीस वर्षो बाद तो अब तो एक नई पीढ़ी सांस ले रही है. जयराम महतो भी उन्हीं में से एक है. प्रश्न यही है कि जयराम आखिर कितना खरे उम्मीदों पर उतरेंगे?. उनकी बाते वक़्त के साथ कितनी जमीन पर उतरती हैं.खैर अभी तो लोकसभा के बाद ये विधानसभा चुनाव उनके सियासी आगाज का दूसरा इम्तिहान है . जहां इसे पार करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती है.
जयराम की बातों में लाग -लपेट तो नहीं दिखता, जमीनी और इत्तेफ़ाक़ भरी बाते होती है.यह कहे उनकी बातों में दम दिखता है. सवाल यही है वे सियासत की इस तनी हुई रस्सी पर कितनी दूर चलेंगे, क्योंकि यहां तो हर पल खतरा है. दूसरी बात ये भी है कि फिलहाल उनकी पार्टी JLKM के अकेले खेवनहार यानि वन मेन आर्मी जयराम ही दिखते हैं. ऐसे में इसे लंबे समय तक कैसे संभाल पाते हैं ये भी देखने वाली बात होगी.क्योंकि सारा दारोमदार उनकी पार्टी का उनके कंधों पर ही अभी दिखलाई पड़ता हैं.खैर असल और सुखद बात ये भी हैं कि इस चुनाव में परिणाम जो भी आए. जयराम को सियासत की इस अगर -मगर वाली डगर पर कैसे चला जाए ये तजुर्बा तो जरूर देगा. अभी उनके पास खोने के लिए तो कुछ नहीं दिखता.लेकिन, हां ये भी सच हैं कि यहां सभल कर चलने से ही सियासत के इस ट्रैक पर लम्बी रेस के घोड़े साबित होंगे.
NEWSANP के लिए रांची से शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट

