जमशेदपुर(JAMSHEDPUR): साल बीतते बीतते इंस्टा यूट्यूब के रीलबाज हुड़दंगियों ने झारखंड के उस लड़के का जीना हराम कर दिया, जो ’ले बेटा’ कह कर कीरीस का गाना सुनाता था। लोगों ने जब बीस बीस रुपए दे कर उससे गीत गवाना शुरू किया तो उसे भी अच्छा लगा था, पर सप्ताह होते होते वह इनसे बच कर भागने लगा। छिपने लगा, गालियां देने लगा, पैसे फेंकने लगा… उसकी अपनी दिनचर्या, जिसकी उसे आदत थी और जिसमें उसे मजा आता था, वह समाप्त हो गई।
अभी आप गुगल पर उसका नाम सर्च कीजिए तो उसके जेल जाने से लेकर मरने तक की खबरों से इंटरनेट भरा पड़ा है। यह कथित सोशल मीडिया के नैतिक पतन का प्रमाण है.
वह लड़का कोई सुरीला गायक हो, ऐसा तो बिल्कुल ही नहीं है। एक सामान्य युवक अपना काम करते करते जैसे सुर ताल की टांग तोड़ते हुए गाता गुनगुनाता रहता है, उसी तरह वह भी गाता है। जमशेदपुर की सामान्य बातचीत में प्रयोग होने वाले कुछ शब्द जैसे ’ले बेटा’, अबे, ’होंडू’ दूसरे लोगों को अपरिचित होने के कारण तनिक आकर्षक लगते हैं। इन्हीं शब्दों के कारण उसकी भी एक वीडियो चल गई। फिर क्या था, फंस गया बेचारा…
उस बच्चे का आनंद अपने दोस्तों में, अपने काम में है। ठीक वैसे ही, जैसे किसी का खेलने कूदने में, किसी का पढ़ते रहने में तो किसी का रील देखने में होता है। वह उसी में प्रसन्न था। फिर व्यू के लोभी उसके ऊपर टूट पड़े। उसे बीस बीस रुपए दे कर गवाने लगे। लेकिन कितना? वह दिन भर में कितनी बार गाएगा, कितनी देर तक गाएगा? उसके सारे गीत खत्म हो गए, पर रिकॉर्ड करने वाले यूट्यूबर्स खत्म नहीं हुए… अब वह जाल में फंसे पक्षी की तरह छटपटा रहा है।
पिछले दो तीन सालों में वायरल हुए लोगों की दशा देख लीजिए, आपको लगेगा कि सोशल मीडिया में वायरल होना व्यक्ति के सत्यानाश का ही कारण बन रहा है। रानू मंडल, मोनालिसा, आईआईटी बाबा, वह ढाबे वाला बूढ़ा व्यक्ति और अब यह लड़का धूम… इन सब का जीना दूभर हो गया। लोगों को लगता है कि वायरल होने से इनका लाभ हुआ, पर ये सभी अपनी मूल प्रवृति के विपरीत जीने को विवश हुए, फिर असहज हो कर उल्टी सीधी हरकतें की और अंत में उसी जनता से गाली खाई…
गोविंदा की एक फिल्म थी ’जिस देश में गंगा रहता है’। गांव देहात में पले एक भोले भाले लड़के ’गंगा’ को एक दिन बताया जाता है कि वह शहर के एक बड़े उद्योगपति का बेटा है और अब उसे अपने माता पिता के साथ शहर में रहना होगा। गंगा गांव की दरिद्र झोपडी से निकल कर शहर के महल में जाता तो है, पर बस नहीं पाता। ऐसा नहीं कि उसे वहां प्रेम नहीं मिलता, पर उसका आनंद तो उसी गांव में होता है। उसे उस चकाचौंध से ऊब होती है और वह वापस लौटने के लिए गिड़गिड़ाने लगता है।
व्यक्ति संपन्न हो या दरिद्र, उसकी अपनी जीवन शैली है। जिस तरह एक बड़ा उद्योगपति, या मल्टीनेशनल कंपनी का कोई अधिकारी सुदूर देहात में नहीं रह पाता, वैसे ही अपने मोहल्ले के साथियों में मस्त रहने वाला कोई भोला युवक चकाचौंध में नहीं टिक पाएगा। धन, प्रसिद्धि, सम्मान सभी को प्यारा लगता है, पर यदि इसके चक्कर में अपनी स्वतंत्रता त्याग देनी पड़े तो अधिकांश लोग पीछे हटने लगते हैं। धूम भी पीछे हट रहा है, पर व्यू के लोभी उसे छोड़ नहीं रहे…
NEWSANP के लिए जमशेदपुर से ब्यूरो रिपोर्ट

