पटना (PATNA): ये डॉक्टर हैं पटना के डॉ. अरुण कुमार , इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान ( IGIMS), पटना के पूर्व डायरेक्टर। अब जन सुराज के नेता बनकर बिहार में बदलाव के लिए डॉक्टरों को गोलबंद कर रहे हैं।
इनकी कहानी बड़ी रोचक है। ये 2004 से 2015 तक IGIMS में कार्यरत रहे। इस दौरान यूजीसी से इनका डायरेक्टर के रूप में चयन हुआ। पदभार ग्रहण करने के लिए इन्हें बड़ी जद्दोजहद करनी पडी। क्योंकि IGIMS की एक लॉबी इन्हें ज्वाइन नहीं करने देना चाहती थी। इनके आने से उनका गोरखधंधा मंदा होने का खतरा था।
खैर कुछ अच्छे लोगों की मदद से डॉ. अरुण ने डायरेक्टर की कुर्सी सम्हाल ली। IGIMS को पेशेंट फ्रेंडली बनाने के प्रयास में जुट गए। अपना निजी मोबाइल नंबर पूरे अस्पताल में टंगवा दिया कि किसी को कोई दिक्कत हो तो वो सीधे डायरेक्टर से संपर्क करे। फिर तो उनके मोबाइल की घंटी बंद होने का नाम ही नहीं ले। वे सबकी सुनते और समस्या का निदान निकालते।
इससे वहां का धंधा बंद हो गया। डॉक्टरों को पूरी मुस्तैदी से ड्यूटी आवर पूरा करना होता था। जो लाइन पर नहीं आए उन्हें दंडित किया। अभी जो वहां के मुख्य कर्ता बने हुए हैं, वे एक बार इनकी चपेट में आ गए तो उन्हें सस्पेंड कर दिया।
फिर तो इनके खिलाफ अभियान शुरू कर दिया गया। चारों तरफ आवेदन जाने लगे। नतीजा निगरानी केस होते गए। एक एक कर कुल 34 केस हुए।
डॉ. अरुण ने IGIMS कैंपस से अतिक्रमण हटवा कर उसकी घेरा बंदी करवाई। इस दौरान उनपर सीजीएम, पटना के यहां लुट और डकैती के 18 नामजद केस दर्ज कराए गए। ये सभी केस अतिक्रमणकारियों द्वारा किए गए, ताकि अभियान रुक जाए।कई प्रभावशाली लोगों ने अस्पताल की जमीन पर पक्के मकान तक बना लिए थे।
डॉ. अरुण किसी दबाव में नहीं आए और जमीन को अतिक्रमणमुक्त कराकर उसकी घेराबंदी करवा दी। उसी जमीन पर आज मेडिकल कालेज चल रहा है।
जब डॉ. अरुण धंधा करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ अभियान छेड़े हुए थे उस समय डॉक्टरों के किसी संगठन ने उनका साथ नहीं दिया। पूरी लड़ाई उन्होंने अकेले लड़ी। और जीते।
हालांकि बाद में उन्हें वहां से हटना पड़ा। लेकिन उन्होंने दिखा दिया कि एक अकेला चना भी भांड फोड़ सकता है।
डॉक्टर अरुण अपने अभियान में सफल हों, इसकी कामना करता हूं।
NEWSANP के लिए पटना से ब्यूरो रिपोर्ट

