किसान के खलिहान से संसद के शिखर तक : उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की संविधाननिष्ठ यात्रा”…

किसान के खलिहान से संसद के शिखर तक : उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की संविधाननिष्ठ यात्रा”…

एक किसान पुत्र से भारत के उपराष्ट्रपति तक : जगदीप धनखड़ की यात्रा
1. बाल्यकाल और प्रारंभिक शिक्षा (1951–1963)
जन्म: 18 मई 1951 | स्थान: किठाना गाँव, झुंझुनू, राजस्थान धनखड़ का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े, उन्होंने अपने जीवन के पहले मूल्य – ईमानदारी, परिश्रम और स्वाभिमान – अपने माता-पिता से सीखे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही सरकारी विद्यालय में हुई, जहाँ उन्होंने साधनों की सीमितता में भी ज्ञान प्राप्ति की लालसा नहीं छोड़ी।

2. सैनिक स्कूल में अनुशासन की शिक्षा (1963–1969)
विद्यालय: सैनिक स्कूल, चित्तौड़गढ़
अपनी बाल प्रतिभा और दृढ़ निश्चय के कारण उनका चयन चित्तौड़गढ़ सैनिक स्कूल में हुआ। यहीं से उनके व्यक्तित्व में अनुशासन, नेतृत्व और देशभक्ति की नींव पड़ी।
सैनिक स्कूल का कठोर प्रशिक्षण और सामूहिक जीवन ने उन्हें संघर्षों से जूझने, निर्णय लेने और देश को सर्वोपरि मानने का गुण दिया।

3. विधिक शिक्षा और वकालत का आरंभ (1970–1989)
कॉलेज: राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
डिग्री: विधि स्नातक (LL.B.)
धनखड़ जी ने कानून में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और शीघ्र ही वकालत के क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गए।
वह राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बने और राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे।
उनकी पहचान एक ऐसे वकील के रूप में बनी, जो संविधान की गहराई, न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और विधि की मर्यादा को समझता है।

4. संसद में पदार्पण और केंद्रीय मंत्री पद (1989–1991)
राजनीतिक प्रवेश: जनता दल के टिकट पर झुंझुनू से सांसद निर्वाचित
पद: संसदीय कार्य मंत्री (प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल में)
उनकी वाकपटुता, संवैधानिक समझ और प्रशासनिक क्षमता के चलते वे संसद में एक प्रभावशाली सांसद के रूप में उभरे।
केवल दो वर्षों के भीतर ही उन्हें संसदीय कार्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया।
इस कालखंड ने उन्हें सरकार की कार्यप्रणाली, विधायिका की मर्यादा और कार्यपालिका की सीमाओं की गहन जानकारी दी।

5. अंतरराष्ट्रीय विधिक मंच और पुनः विधि में सक्रियता (1992–2019)
पद: सदस्य, इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन, पेरिस (3 वर्ष)
इस अवधि में वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते रहे।
पेरिस स्थित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में सदस्य रहते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली, भारत के विधिक दृष्टिकोण, और संवैधानिक मूल्यों का सफलतापूर्वक प्रतिनिधित्व किया।
वहीं वे भारत में पुनः विधि, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विषयों में सक्रिय रहे, और भाजपा के कानून मामलों के राष्ट्रीय संयोजक जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहे।

6. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में कार्यकाल (2019–2022)
राज्यपाल पद: पश्चिम बंगाल
राज्यपाल के रूप में उन्होंने संविधान की रक्षा करते हुए ममता बनर्जी सरकार से तीखी लेकिन वैधानिक टकराहटें झेलीं।
एक बार AM-PM की तकनीकी गलती से रात 2 बजे कैबिनेट बैठक बुला ली, लेकिन इस प्रकरण ने यह भी सिद्ध किया कि वे नियमों और समयबद्ध कार्यवाही में कितने गंभीर हैं।
उनका कार्यकाल संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा और केंद्रीय व राज्य सरकार के संबंधों को दिशा देने वाला रहा।

7. उपराष्ट्रपति पद और संवैधानिक चेतना (2022–वर्तमान)
पद: भारत के 14वें उपराष्ट्रपति (2022 से)
पदेन: राज्यसभा के सभापति
TMC जैसी विपक्षी पार्टी द्वारा भी विरोध न करना, उनके व्यक्तित्व की गरिमा और निष्पक्ष छवि को दर्शाता है।उपराष्ट्रपति के रूप में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली, न्यायपालिका की जवाबदेही और संविधान की सर्वोच्चता जैसे विषयों पर कई बार मुखर होकर टिप्पणी की।
जब वे यह पूछते हैं –“जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से बरामद करोड़ों की नक़दी के बावजूद एक महीने में FIR क्यों नहीं हुई?” * – तो यह एक आम नेता की नहीं, बल्कि एक संवैधानिक प्रहरी की आवाज़ होती है।

8. विचारधारा और वैचारिक प्रतिबद्धता
वे भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद, संविधान और लोकतांत्रिक संतुलन के प्रबल समर्थक हैं।
उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि है – चाहे न्यायपालिका हो या विधायिका, कोई भी संस्था संविधान के ऊपर नहीं
उनका यह वाक्यांश –
“देश को नुकसान पहुँचाने वाला सुप्रीम कोर्ट ही क्यों न हो, उसे भी वह देख लेगा”
उनके निर्भीक और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तित्व का परिचायक है।

निष्कर्ष: अनुभव, अधिकार और उत्तरदायित्व का संतुलन जगदीप धनखड़ केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि संविधान, न्याय व्यवस्था और राष्ट्र निर्माण की त्रयी के संयोजक हैं।उनकी बातों में अनुभव है, उनके सवालों में गहराई है, और उनके निर्णयों में देशहित की सर्वोच्च प्राथमिकता

आज जब वे संविधान की मूल भावना और न्यायपालिका की पारदर्शिता की बात करते हैं, तो वह केवल आलोचना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी की आवाज़ होती है।उन्हें हल्के में लेना, भारत की संवैधानिक चेतना को न समझना होगा।

NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *