जामताड़ा(JAMTARA):सीना छलनी हुआ वतन का, पर झुका न तिरंगा कभी -राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की इन अमर पंक्तियों को सच कर दिखाया शुक्रवार, 23 मई 2025 का दिन जामताड़ा के इतिहास को सुनहरे अक्षरों में दर्ज कर गया।
पहलगाम हमले के दौरान आतंकवादियों द्वारा भारतीय जवानों पर किए गए पाशविक हमले के प्रतिकार में सेना द्वारा सफलतापूर्वक ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया। इस शौर्यगाथा को समर्पित तिरंगा यात्रा ने सैकड़ों नहीं, हजारों धड़कनों को एक सुर में पिरो दिया। जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचा तिरंगा!* यात्रा *माटी की सौगंध है, देश नहीं झुकने दूँगा के भाव से ओतप्रोत रहा।
1. आयोजन का उद्देश्य:
लोककथा कहती है कि *लोहे को लोहा ही काटता है।
पहलगाम की कायराना हरकत का जवाब सेना ने बारूद से नहीं, बल्कि अपने अदम्य साहस से दिया।
*ऑपरेशन सिंदूर* ने आतंक के सीने पर खंजर चलाई, और देश भर में राष्ट्रभक्ति की लहर दौड़ गई। इसी लहर को जनांदोलन का रूप देने का बीड़ा जामताड़ा के भाजपा नेता तथा पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष वीर वीरेंद्र मंडल ने उठाया।
उनका संदेश साफ था— देशभक्ति को कार्य रूप मिलना ही सैनिकों के हित और कार्य रूप था। यह ऐतिहासिक तिरंगा यात्रा।
2. यात्रा का मार्ग: गाँधी मैदान से सुभाष चौक तक एक मुक्ति-पथ
“जहाँ चली कहाँ चली, कवि की कलम चल पड़ी; पथ में पिच्छल पाऊँ तो क्या, हौसला न रुक पड़ी।”
सुबह साढ़े आठ बजे समाज कल्याण समिति परिसर गाँधी मैदान में शंखनाद के साथ झंडारोहण हुआ।
क्षण भर में लहराता केसरिया, श्वेत और हरे रंग का समंदर वीर कुँवर सिंह चौक की ओर बढ़ा।
फिर स्टेशन रोड—जहाँ रेल सीटी ने लगता था ‘वंदे मातरम्’ की तान छेड़ दी —से यात्रा इंदिरा चौक पहुँची।
दुकानों के शटर खुलते गए, लोग दौड़कर बालकनी और छज्जों से फूलों की वर्षा करने लगे।
मुख्य बाज़ार की गलियाँ मानो गंगा तट बन गईं—हर चौमुखाने ‘भारत माता की जय’ का घोष।
अंततः सुभाष चौक की प्रतिमा पर तिरंगा सलामी को झुका; नेताजी को श्रद्धासुमन अर्पित करते ही हजारों गलों से नारों का स्वर एक संगीत सा बज उठा:
“शौर्य की गाथा जनगण को सुनानी है, तिरंगे की लाज निभानी है।”
—महाकवि मैथिलीशरण मिश्रा
3. सहभागिता: जाति-धर्म की दीवारें गिरीं, राष्ट्र एक सुर हुआ
पुरानी कहावत है—“एक और एक ग्यारह”।
जामताड़ा की इस रैली ने साबित कर दिया कि जब मकसद उच्च हो, तो गणना बेकार हो जाती है।
धर्म गुरुओं का समूह आगे-आगे चल रहा था—इमाम नसीर उद्दीन ने क़ुरआन की आयत पढ़कर देश के लिए दुआ की; पंडित अनंत शर्मा ने शंखध्वनि की; पादरी एन्ड्रू डैनियल ने भक्ति गीत छेड़ा।
अप्प दी रक्ख”—सिख फौजी बंधुओं की दलेल थी कि देश की रक्षा सबसे ऊँचा धर्म है।
4. वीरेंद्र मंडल का उद्बोधन: “लोकतंत्र की रीढ़ है जन भागीदारी”
जहाँ निगाह न ठहरती, वहाँ लक्ष्य ठहरता है*,” मंडल ने कहा।
“ऑपरेशन सिंदूर ने दिखा दिया कि हमारी सेना ‘बरफ के पर्वत से भी ठंडी, आग से भी गर्म’ है।
जवानों का मन बढ़ाने के लिए ज़रुरी है कि देशवासी रंग, भाषा, विचारधारा के ऊपर उठ कर तिरंगे तले आएँ—जैसे आज हम सब इकट्ठा हुए।”
उन्होंने घोषित किया कि शहीद परिवारों की सहायता के लिए स्थायी “वीर निधि” बनाई जाएगी, जहाँ यात्रा के दौरान ही ₹11 लाख से अधिक की राशि संग्रहित हुई।
5. जामताड़ा में दिखा जीवंत प्रांसगिकता
- दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है।”
पहलगाम का दर्द अब हमें किसी भी सुरक्षा-कमी से सबक सीखने का संदेश देता है। - पहाड़ के ऊपर नदी नहीं ठहरती।”
ठीक वैसे ही सैनिकों की वीरता किसी रुकावट को पहाड़ नहीं मानती; वे हर बाधा तोड़ कर गिरते पानी की तरह आगे बढ़ते हैं। - करत-करत अभ्यास के, जड़मति होई सुजान।”
निरंतर जन सचेतना से देशभक्ति सिर्फ भावना नहीं, दैनिक आचरण बनेगी।
6. महिला और युवा शक्ति: “बेटी बचाओ से बेटी गढ़ाओ तक”
ममता झा, विद्यालय प्रधानाध्यापिका, ने रैली के बीच एक संधान-गीत गाया—
“चीर जीवन का अंधियारा, तिरंगा लेकर आया है।”
लकड़ी से बनी एक चलती-फिरती खटीक पर दर्जनों छात्राएँ खुद कतार बना कर खड़ी थीं।
उनके स्लोगन: “कच्चे खीलोनो से न खेलो, देश सजाओ सपनों से।”
यही युवा-मन है जो कल तार-तार कैम्पस रैगिंग और गैजेट-लत से ऊब कर आज तिरंगे का तार बुन रहा था।
7. रिटायर्ड सैनिकों का भाव-साक्षात्कार
सूबेदार (रि.) बलदेव सिंह—कारगिल वीरता चक्र प्राप्त—की आँखें नम थीं:
“जामताड़ा जैसे शहर में राष्ट्रगान की एक-एक पंक्ति को बच्चे-बच्चे की जुबान पर सुन कर, लगे है कि मैंने जो रक्त बहाया था, वह व्यर्थ न गया।”
हवलदार (रि.) अबु सालेह—नालादेश सीमा के बेटे—ने कहा:
“मस्जिद-मंदिर सब पास-पास, तिरंगा सबसे ऊपर आज”—
यह वाक्य सोचन-योग्य दस्तावेज़ है, सिर्फ हैडलाइन नहीं।
8. प्रशासनिक दृष्टि: लॉ एंड ऑर्डर का संतुलन
“मन्त्रियों की नीति और साधु की सिद्धि, दोनों संतुलन पे टिके होते हैं।”
“राष्ट्रभक्ति का आवेग जनोत्सव बने, भीड़ भ्रांत न बने—यही प्राथमिकता है।”
9. आर्थिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य: “जहाँ राष्ट्र पर्व, वहाँ रोजगार भी हो”
बुक स्टॉल, झंडा स्टॉल, खादी बन्दर—सबकी बिक्री दो गुना हुई।
फूल विक्रेता राजकुमार का चेहरा खिला:
“हमारे गुलाब आज बम-गोले से मँहगे बिके, पर लगा जैसे माँ काली की आरती की लालिमा हो।”
**होटल ** के मालिक ने बताया कि एक दोपहर में सामान्य दिनों से तीन गुना ट्रे आर्डर हुए।
कहावत है— अतिथि देवो भव:”; और रैली ने अतिथियों को अनूठा सत्कार दिया।
10. मीडिया और डिजिटल तरंग: “हाथ में मोबाइल, दिल में देश”
—#OperationSindoor, #JamtaraTirangaWalk, #NationFirst—तीन घंटों में ट्रेंडिंग।
—फेसबुक लाइव पर 2.3 लाख रीएक्शन, 58 हज़ार शेयर।
—लोककथाओं का डेटा एज से मिलन हुआ; अभिव्यक्ति रंगीन GIF और रील बनी।
**“अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काज”—**लेकिन आज सोशल मीडिया नामक ‘अजगर’ भी देशभक्ति की चक्री घूमाने में लगा था।
11. तुलना और प्रेरणा: “एक चिंगारी हज़ारों को जला दे”
दुमका, देवघर, गिरिडीह में भी समान यात्राएँ निकालने की घोषणा हो गई।
झारखंड DGP ने ट्वीट किया—
जामताड़ा मॉडल, राष्ट्र एकीकरण का प्रेरक मॉडल।”
यानी *\ *जो सागर में जाएँ, वे नदी कहलाएँ”—*\ *पर इस नदी का विस्तार सागर जैसा है।
12. लोकमंथन: जन संपर्क से जन आकांक्षा तक
शाम चार बजे समाप्त यात्रा के बाद स्वैच्छिक लोकसंवाद का सत्र।
शिक्षक, वकील, ग्रामीण समिति प्रधान, सबके प्रश्न—‘क्या हम सिर्फ तिरंगा लहरा कर रुक जाएँ?’
उत्तर सर्वसम्मति से—नहीं।
जामताड़ा एक्शन फोरम – पाँच संकल्प
- सीमावर्ती स्कूलों में राष्ट्रीय सुरक्षा क्लब।
- हर महीने ‘एक पेड़ शहीदों के नाम’ अभियान।
- कॉमन वॉलंटियर डेटाबेस, जहाँ आपदा या युद्धकाल में रक्तदान, रसद, चिकित्सा सहायता दर्ज रहेगी।
- तिरंगा लाइब्रेरी’—युवा-पुस्तकालय जहाँ युद्ध-साहित्य उपलब्ध।
- वीरांगना स्व-सुरक्षा कोर्स—गर्ल्स कॉलेज में।
नौका मझधार में छोड़ी तो साहिल कौन ढूँढेगा”—
इसलिए योजनाओं को अंजाम तक पहुंचाना ही असली देशभक्ति।
13. साहित्यिक छटा: दिनकर, सुभद्राकुमारी, दुष्यंत सब एक मंच
कार्यक्रम के दौरान कविता पाठ और शहीदों की कविताओं का श्रवण।
सुभद्राकुमारी चौहान की ‘झाँसी की रानी’ का अंश—
खूब लड़ी मर्दानी*…”
*दुष्यंत कुमार* का गीत—
*कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए…” दर्शक-दीर्घा में तालियों का समुंदर। *लोकोक्ति—“जो मंतर करै सो चमत्कार देखै।”*
14. निष्कर्ष: “देशभक्ति केवल भावना नहीं, कर्तव्य है”
जामताड़ा की तिरंगा यात्रा ने साबित किया कि एकता में बल” सिर्फ पाठ्यपुस्तक का वाक्य नहीं, जीवत सत्ता है।
तीन घंटे की यह यात्रा 25000 कदमों का पदचिन्ह भर नहीं, बल्कि विचारों का दीर्घकालीन उद्घोष है—
“उठो, जागो, और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”
—स्वामी विवेकानंद
आज यहाँ तिरंगा गूँजा, कल हर गली, हर शहर गूँजे—
तभी ऑपरेशन सिंदूर की गर्जना सही अर्थों में “शौर्य और सम्मान” की संपूर्ण गाथा बनेगी।
“बूँद-बूँद से घड़ा भरता है”—
और जब घड़ा देशप्रेम से भर जाए, तो वह जलधारा संस्कृति को सिंचित करती है।
विशेष
देशभक्ति केवल भावना नहीं, कर्तव्य है”—इस मूल मंत्र को जामताड़ा की जनता ने ना केवल दोहराया, बल्कि जी लिया।
यदि भारत के हर जिले में इस जैसा उदाहरण शहद की तरह फैले, तो लोकतंत्र के चारों स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया—के ऊपर “जनता” का मजबूत स्तंभ तिरंगे जैसा अखण्ड खड़ा दिखेगा।
जाको राखे साँईं, मार सके न कोई”
और साँईं रूप देश की आस्था तब तक अभेद्य है, जब तक हर हाथ में तिरंगा और हर ह्रदय में देशप्रेम है।

