भारतीय क्रिकेट में अक्सर यह सवाल पूछा जाता रहा है — “क्या होता अगर अमोल मजूमदार को टेस्ट क्रिकेट खेलने का मौका मिलता?”
लेकिन मजूमदार ने ऐसे सवालों के साथ ही अपने करियर को जिया। अब, जब वह भारतीय महिला क्रिकेट टीम के कोच के रूप में सफलता की नई कहानी लिख चुके हैं, तो यह अध्याय मानो उस अधूरे सफ़र का खूबसूरत अंत बन गया है।
1990 के दशक में मुंबई के घरेलू क्रिकेट के दिग्गज रहे मजूमदार उन चुनिंदा बल्लेबाजों में थे जिन्हें राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण जैसी पीढ़ी के आने के कारण टेस्ट टीम में जगह नहीं मिली। दिलचस्प बात यह भी है कि अपने स्कूल के दिनों में वह सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली की ऐतिहासिक साझेदारी के गवाह भी नहीं बन पाए थे।परंतु वक्त का पहिया घूम चुका है।
हाल ही में हरमनप्रीत कौर द्वारा नादिन डी क्लार्क का कैच लपकते ही, मजूमदार के भीतर का वह पुराना खालीपन मानो भर गया। भारतीय महिला टीम के कोच के रूप में उन्होंने वह पल देखा, जिसे वह “नई सुबह” कहते हैं।
मजूमदार ने टीम की एकजुटता और अनुशासन को सफलता का मूल बताया। उन्होंने कहा,“पिछले दो साल टीम के साथ बिताना गर्व की बात रही। खिलाड़ियों की प्रतिबद्धता और मानसिक दृढ़ता ने यह उपलब्धि संभव की। मेरा काम सिर्फ उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन देना था।”
सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया और फाइनल में दक्षिण अफ्रीका पर ऐतिहासिक जीत को उन्होंने सिर्फ महिला क्रिकेट नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के लिए मील का पत्थर बताया।
उनके शब्दों में —“यह जीत वही असर डालेगी जो 1983 की विश्व कप विजय ने भारतीय क्रिकेट पर डाला था। यह नई पीढ़ी को प्रेरणा देगी।”
कभी ‘क्या होता अगर’ की छाया में रहे अमोल मजूमदार, अब ‘क्या हो सकता है’ का चेहरा बन चुके हैं।
NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

