पटना (बिहार) : भिखारी ठाकुर भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाते हैं। तत्कालीन बिहार-झारखंड के महान लोक कलाकार हैं। आज उनका जन्मदिन है। भोजपुरी भाषा से प्यार करने वाले हर शख्स को आज भिखारी ठाकुर याद आ रहे हैं। आइए उनसे जुड़े कुछ तथ्यों से होते हैं रूबरू-
यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि भिखारी ठाकुर का कलाकार मन आखिर जागा कैसे? वाक्या कुछ यूं है- किशोरावस्था में ही उनका विवाह मतुरना के साथ हो गया था। लुक-छिपकर वह नाच देखने चले जाते थे। नृत्य-मंडलियों में छोटी-मोटी भूमिकाएं भी अदा करने लगे थे। लेकिन मां-बाप को यह कतई पसंद न था। एक रोज गांव से भागकर वह खड़गपुर जा पहुंचे। इधर-उधर का काम करने लगे। मेदिनीपुर जिले की रामलीला और जगन्नाथपुरी की रथयात्रा देख-देखकर उनके भीतर का सोया कलाकार फिर से जाग उठा।
तीस वर्ष में विदेसिया की रचना की
भिखारी ठाकुर जब गांव लौटे तो कलात्मक प्रतिभा और धार्मिक भावनाओं से पूरी तरह लैस थे। परिवार के विरोध के बावजूद नृत्य मंडली का गठन कर वह शोहरत की बुलंदियों को छूने लगे। तीस वर्ष की उम्र में उन्होंने विदेसिया की रचना की। फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। जन-जन की जुबान पर बस एक ही नाम गूंजने लगा- भिखारी ठाकुर!
आज ही दिन हुआ था जन्म
उत्तर बिहार के छपरा शहर से लगभग दस किलोमीटर पूर्व में चिरान नामक स्थान के पास कुतुबपुर गांव में भिखारी ठाकुर का जन्म पौष मास शुक्ल पंचमी संवत् 1944 तद्नुसार 18 दिसंबर, 1887 (सोमवार) को दोपहर बारह बजे शिवकली देवी और दलसिंगार ठाकुर के घर हुआ था। यह गांव कभी भोजपुर (शाहाबाद) जिले में था, पर गंगा की कटान को झेलता सारण (छपरा) जिले में आ गया है। इसी गांव के पूर्वी छोर पर स्थित है भिखारी ठाकुर का पुश्तैनी घर।
केवल रामचरित मानस पढ़ लेते थे
मां-बाप की ज्येष्ठ संतान भिखारी ठाकुर ने नौ वर्ष की अवस्था में पढ़ाई शुरू की। एक वर्ष तक तो कुछ भी न सीख सके। साथ में छोटे भाई थे बहोर ठाकुर। बाद में गुरु भगवान से उन्होंने ककहरा सीखा और स्कूली शिक्षा अक्षर-ज्ञान तक ही सीमित रही। बस, किसी तरह रामचरित मानस पढ़ लेते थे।
कैथी लिपि में लिखते थे।
लेखन की मौलिक प्रतिभा उनमें जन्मजात थी। एक तरह से वह शिक्षा के मामले में कबीर दास की तरह ही थे।
1938 से 1962 के बीच तीन दर्जन पुस्तकें छपीं
वर्ष 1938 से 1962 के बीच भिखारी ठाकुर की लगभग तीन दर्जन पुस्तिकाएं छपीं। इन किताबों को लोग फुटपाथों से खरीदकर खूब पढ़ते थे। न्यूज़ फास्ट। अधिकतर किताबें दूधनाथ प्रेस, सलकिया (हावड़ा) और कचौड़ी गली (वाराणसी) से प्रकाशित हुई थीं। नाटकों व रूपकों में बहरा बहार (विदेसिया), कलियुग प्रेम (पियवा नसइल), गंगा-स्नान, बेटी वियोग (बेटी बेचवा), भाई विरोध, पुत्र-वधू, विधवा-विलाप, राधेश्याम बहार, ननद-भौजाई, गबरघिचोर उनकी मुख्य किताबें हैं।
संजीव ने भिखारी ठाकुर पर लिखा है उपन्यास
समालोचक महेश्वराचार्य ने उन्हें 1964 में जनकवि कह कर संबोधित किया था। इसी तरह कथाकार संजीव ने भिखारी ठाकुर की जीवन यात्रा पर ‘सूत्रधार’ उपन्यास की रचना की है। यह उपन्यास पढ़कर कोई भी भिखारी ठाकुर की पूरी जिंंदगी को समझ सकता है। इसमें कई ऐसे प्रसंग की चर्चा है जिन्हें पढ़कर आप रो पड़ेंगे।
राहुल सांस्कृत्यायन ने कहा था भोजपुरी का शेक्सपियर
धोती, कुर्ता, मिरजई, सिर पर साफा और पैर में जूता पहनने के शौकीन भिखारी ठाकुर गुड़ खाने के बहुत शौकीन थे। 10 जुलाई, 1971 (शनिवार) को 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी को भोजपुरी का शेक्सपियर और अनगढ़ हीरा कहा था। जगदीशचंद्र माथुर ने उन्हें भरतमुनि की परंपरा का (प्रथम) लोक नाटककार कहा था।
झारखंड के लोग भी भिखारी ठाकुर के दीवाने
चूंकि झारखंड पहले बिहार राज्य का ही हिस्सा था, इसलिए भिखारी ठाकुर का यह इलाका रहा है। झारखंड के कई जिलों में वह आ चुके हैं, खासकर बिहार से सटे हुए जिलों में। भिखारी ठाकुर भले ही अब हमारे बीच देह सहित नहीं मौजूद हों, उनकी रचनाएं अब भी यहां के लोग रुचि लेकर पढ़ते हैं। उनके नाटकों का मंचन आए दिन झारखंड में होता रहता है। यहां के रंगकर्मी और कलाकार उनके नाटकों और गीतों के दीवाने हैं। झारखंड में जब कभी भी भोजपुरी भाषी लोगों के बीच साहित्यिक चर्चाएं होती हैं, वह भिखारी ठाकुर को याद किए बिना संपन्न नहीं होती हैं।
NEWS ANP के लिए बयूरो रिपोर्ट..

